होम > धर्म और मान्यताएँ > ईसाई धर्म : इस्लाम की नज़र में > क़ुरआन क्यों कहता है कि ईसा को सूली पर नहीं चढ़ाया गया ?
इनकार की आयत (4:157), उसकी इस्लामी पढ़ाई, फ़िदा-ए-सलीब वाला ईसाई मुक़ाम, और तारीख़ी बहस की हालत, दोनों तरफ़ बिना ग़लत तस्वीर के।
क़ुरआन बयान करता है कि जिन लोगों ने ईसा को क़त्ल करने का दावा किया, उनके बारे में "न उन्होंने उसे क़त्ल किया और न उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि उनके लिए (किसी को मसीह का) सदृश बना दिया गया" फरमाया, और कि अल्लाह ने उन्हें अपनी तरफ़ उठा लिया (क़ुरआन 4:157-158)। इस्लाम के मुताबिक़ सूली वाक़िया नहीं हुई : किसी दूसरे को ईसा जैसा बना दिया गया, और अल्लाह ने अपने रसूल को नजात दी।
यह ईसाई धर्म से सबसे साफ़ तारीख़ी इख़्तिलाफ़ों में से इक है, जो ख़लासे को सलीब पर क़ायम रखता है (1 कुरिन्थियों 15:3) ;
इस्लाम के लिए कोई दूसरे का बोझ नहीं उठाता (क़ुरआन 6:164)।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन बनी इसराईल से उनके दावे के बारे में कहता है : "न उन्होंने उसे क़त्ल किया और न उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि उनके लिए (किसी को मसीह का) सदृश बना दिया गया" "अल्लाह ने उसे अपनी ओर उठा लिया" (क़ुरआन 4:157-158)
आयत तीन बातें क़ायम करती है : सूली वाक़िया नहीं हुई ; एक शक्ल ने गवाहों को धोखा दिया ; ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह की तरफ़ उठा लिए गए।
क्लासिकी तफ़ासीर बयान करती हैं कि अल्लाह ने इक इंसान को ईसा जैसा बना दिया, जबकि ईसा उठा लिए गए थे, और वही उनकी जगह पकड़ा गया। उस इंसान की शनाख़्त पर उलमा ने कई पढ़ाइयाँ पेश कीं बिना उन्हें ईमान की दस्तूर-उल-अमल बनाए : इस्लामी यक़ीनी ईसा की सूली के इनकार पर है, उस शख़्स की शनाख़्त पर नहीं जो उस शक्ल में पकड़ा गया। उनका ज़िंदा उठा लिया जाना मुसलमानों के ईमान में उनकी आख़िरी ज़माने की आमद की वजह बयान करता है (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा) : आसमान में ज़िंदा रसूल अपनी ज़मीनी ज़िंदगी मुकम्ल करने को दोबारा आ सकता है।
तवफ़्फ़ा ("मैं तुझे मौत दूँगा", क़ुरआन 3:55) का मअनी भी क्लासिकी मुफ़स्सिरीन ने बहस किया : रूह का कब्ज़ा (मौत) फिर उरूज, या ऐसी हालत जिससे ईसा उठा लिए गए ; दोनों पढ़ाइयों में वह सलीब पर नहीं मरते, और ईसा हिसाब के दिन कहेंगे : "जब तूने मुझे उठा लिया, तो तू ही उनपर निरीक्षक था" (क़ुरआन 5:117)।
सलीब ईसाई ख़लासे का मरकज़ है : "मसीह हमारे गुनाहों के लिए मरा, जैसा किताबों में लिखा है" (1 कुरिन्थियों 15:3)। कैथोलिक चर्च का कैटेकिज़्म मसीह की मौत को इकलौती क़ुरबानी पेश करता है जो इंसानियत को फ़िदा करती है।
सूली को ग़लत ठहराना, ईसाइयों की नज़र में, उनके ईमान के दिल को छूना है ;
इस्लाम इसे क़बूल करता है : उसके लिए किसी मासूम के ख़ून से फ़िदा मौजूद नहीं, क्योंकि "कोई किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा" (क़ुरआन 6:164)।
मग़फ़िरत सीधे अल्लाह से तौबे से मिलती है, जैसे वह माफ़ करता है जो उसकी तरफ़ लौटता है (क़ुरआन 39:53)।
पुरानी सरचश्में (टैसिटस, यूसेफ़ुस के ज़िक्र) पोंस पिलातुस के दौर में ईसा नाम के इक इंसान की फ़ांसी सुनाती हैं, और तारीख़ की किताबें यही दोहराती हैं। इस्लामी सुर में तीन तफ़सीलें : पहली, ग़म का क़िस्सा इंजीलों में ख़ुद मुख़्तलिफ़ है (सूली का वक़्त : मरकुस 15:25 में "तीसरा पहर", यूहन्ना 19:14 में "छठे पहर के क़रीब" ; आख़िरी बातें सिनॉप्टिक इंजीलों और यूहन्ना में अलग-अलग), जो इक मुज़दवजा क़िस्सा दिखाती है, क्रॉनिकल नहीं।
दूसरी, बदली का ख़याल सातवीं सदी की इजाद नहीं : दूसरी सदी के बैसिलिदाईं जैसे पुराने फ़िरक़े सिखाते थे कि किसी और को उसकी जगह सूली पर चढ़ाया गया, जैसा इरेनियस (हेरेसियों के ख़िलाफ़) सुनाता है।
तीसरी, और सबसे बड़ी : मुसलमान को इस बात की ज़रूरत नहीं कि मुआर्रिख़ उसके ईमान की तस्दीक़ करें। उसके लिए क़ुरआन अल्लाह का कलाम है, जो हर मुज़दवजे से बेहतर जानता है कि क्या हुआ। ईमान सरचश्मों की बहुमत से नहीं होता।
अमल में यह सब कुछ बदलता है : विरासत में मिलने वाला कोई मूल पाप नहीं जिसकी फ़िदा दी जाए, कोई ज़रूरी क़ुरबानी नहीं, कोई वसीता नहीं। हर बच्चा पाक होकर पैदा होता है, अपने अपने अमाल का जवाबदेह है, और उस अल्लाह की तरफ़ लौटता है जो सीधे माफ़ करता है (क़ुरआन 39:53)। सलीब इस्लाम का मरकज़ नहीं : अल्लाह की रहमत और तौहीद हैं।
हाँ। क़ुरआन 4:157 साफ़ है और ईमान का हिस्सा है : जैसा सुनाया जाता है वैसी सूली वाक़िया नहीं हुई, और ईसा (अलैहिस्सलाम) ज़िंदा हालत में अल्लाह की तरफ़ उठा लिए गए।
क़ुरआन उसका नाम नहीं लेता। क्लासिकी तफ़ासीर कई पढ़ाइयाँ पेश करती हैं (उनका इक दुश्मन उनका सदृश बना दिया गया, इक रज़ा-मंद), बिना किसी इज्मा के। इस्लामी यक़ीनी इनकार पर है, दूसरे इंसान की शनाख़्त पर नहीं।
पुरानी सरचश्में पोंस पिलातुस के दौर में ईसा नाम के इक इंसान की फ़ांसी का ज़िक्र करती हैं, मगर ग़म का क़िस्सा इंजीलों में ख़ुद मुख़्तलिफ़ है (सूली का वक़्त, आख़िरी बातें), और पुराने फ़िरक़े (जैसे दूसरी सदी के बैसिलिदाईं, इरेनियस के हवाले से) बदली की तालीम पहले से देते थे। मुसलमान अपना यक़ीन क़ुरआन पर रखता है, तारीख़ी मुज़दवजों पर नहीं।