रुकू 469 सूरह Al-Waqia (आयत 1 से 38) से है। इसमें 38 आयतें हैं और यह जुज़ 27 में है।
05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया
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إِذَا وَقَعَتِ ٱلْوَاقِعَةُ ﴿1﴾
जब क़यामत बरपा होगी और उसके वाक़िया होने में ज़रा झूट नहीं
لَيْسَ لِوَقْعَتِهَا كَاذِبَةٌ ﴿2﴾
(उस वक्त लोगों में फ़र्क ज़ाहिर होगा)
خَافِضَةٌۭ رَّافِعَةٌ ﴿3﴾
कि किसी को पस्त करेगी किसी को बुलन्द
إِذَا رُجَّتِ ٱلْأَرْضُ رَجًّۭا ﴿4﴾
जब ज़मीन बड़े ज़ोरों में हिलने लगेगी
وَبُسَّتِ ٱلْجِبَالُ بَسًّۭا ﴿5﴾
और पहाड़ (टकरा कर) बिल्कुल चूर चूर हो जाएँगे
فَكَانَتْ هَبَآءًۭ مُّنۢبَثًّۭا ﴿6﴾
फिर ज़र्रे बन कर उड़ने लगेंगे
وَكُنتُمْ أَزْوَٰجًۭا ثَلَـٰثَةًۭ ﴿7﴾
और तुम लोग तीन किस्म हो जाओगे
فَأَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ ﴿8﴾
तो दाहिने हाथ (में आमाल नामा लेने) वाले (वाह) दाहिने हाथ वाले क्या (चैन में) हैं
وَأَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ ﴿9﴾
और बाएं हाथ (में आमाल नामा लेने) वाले (अफ़सोस) बाएं हाथ वाले क्या (मुसीबत में) हैं
وَٱلسَّـٰبِقُونَ ٱلسَّـٰبِقُونَ ﴿10﴾
और जो आगे बढ़ जाने वाले हैं (वाह क्या कहना) वह आगे ही बढ़ने वाले थे
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلْمُقَرَّبُونَ ﴿11﴾
यही लोग (ख़ुदा के) मुक़र्रिब हैं
فِى جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ ﴿12﴾
आराम व आसाइश के बाग़ों में बहुत से
ثُلَّةٌۭ مِّنَ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿13﴾
तो अगले लोगों में से होंगे
وَقَلِيلٌۭ مِّنَ ٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿14﴾
और कुछ थोडे से पिछले लोगों में से मोती
عَلَىٰ سُرُرٍۢ مَّوْضُونَةٍۢ ﴿15﴾
और याक़ूत से जड़े हुए सोने के तारों से बने हुए
مُّتَّكِـِٔينَ عَلَيْهَا مُتَقَـٰبِلِينَ ﴿16﴾
तख्ते पर एक दूसरे के सामने तकिए लगाए (बैठे) होंगे
يَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَٰنٌۭ مُّخَلَّدُونَ ﴿17﴾
नौजवान लड़के जो (बेहिश्त में) हमेशा (लड़के ही बने) रहेंगे
بِأَكْوَابٍۢ وَأَبَارِيقَ وَكَأْسٍۢ مِّن مَّعِينٍۢ ﴿18﴾
(शरबत वग़ैरह के) सागर और चमकदार टोंटीदार कंटर और शफ्फ़ाफ़ शराब के जाम लिए हुए उनके पास चक्कर लगाते होंगे
لَّا يُصَدَّعُونَ عَنْهَا وَلَا يُنزِفُونَ ﴿19﴾
जिसके (पीने) से न तो उनको (ख़ुमार से) दर्दसर होगा और न वह बदहवास मदहोश होंगे
وَفَـٰكِهَةٍۢ مِّمَّا يَتَخَيَّرُونَ ﴿20﴾
और जिस क़िस्म के मेवे पसन्द करें
وَلَحْمِ طَيْرٍۢ مِّمَّا يَشْتَهُونَ ﴿21﴾
और जिस क़िस्म के परिन्दे का गोश्त उनका जी चाहे (सब मौजूद है)
وَحُورٌ عِينٌۭ ﴿22﴾
और बड़ी बड़ी ऑंखों वाली हूरें
كَأَمْثَـٰلِ ٱللُّؤْلُؤِ ٱلْمَكْنُونِ ﴿23﴾
जैसे एहतेयात से रखे हुए मोती
جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿24﴾
ये बदला है उनके (नेक) आमाल का
لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًۭا وَلَا تَأْثِيمًا ﴿25﴾
वहाँ न तो बेहूदा बात सुनेंगे और न गुनाह की बात
إِلَّا قِيلًۭا سَلَـٰمًۭا سَلَـٰمًۭا ﴿26﴾
(फहश) बस उनका कलाम सलाम ही सलाम होगा
وَأَصْحَـٰبُ ٱلْيَمِينِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْيَمِينِ ﴿27﴾
और दाहिने हाथ वाले (वाह) दाहिने हाथ वालों का क्या कहना है
فِى سِدْرٍۢ مَّخْضُودٍۢ ﴿28﴾
बे काँटे की बेरो और लदे गुथे हुए
وَطَلْحٍۢ مَّنضُودٍۢ ﴿29﴾
केलों और लम्बी लम्बी छाँव
وَظِلٍّۢ مَّمْدُودٍۢ ﴿30﴾
और झरनो के पानी
وَمَآءٍۢ مَّسْكُوبٍۢ ﴿31﴾
और अनारों
وَفَـٰكِهَةٍۢ كَثِيرَةٍۢ ﴿32﴾
मेवो में होंगें
لَّا مَقْطُوعَةٍۢ وَلَا مَمْنُوعَةٍۢ ﴿33﴾
जो न कभी खत्म होंगे और न उनकी कोई रोक टोक
وَفُرُشٍۢ مَّرْفُوعَةٍ ﴿34﴾
और ऊँचे ऊँचे (नरम गद्दो के) फ़र्शों में (मज़े करते) होंगे
إِنَّآ أَنشَأْنَـٰهُنَّ إِنشَآءًۭ ﴿35﴾
(उनको) वह हूरें मिलेंगी जिसको हमने नित नया पैदा किया है
فَجَعَلْنَـٰهُنَّ أَبْكَارًا ﴿36﴾
तो हमने उन्हें कुँवारियाँ प्यारी प्यारी हमजोलियाँ बनाया
عُرُبًا أَتْرَابًۭا ﴿37﴾
(ये सब सामान)
لِّأَصْحَـٰبِ ٱلْيَمِينِ ﴿38﴾
दाहिने हाथ (में नामए आमाल लेने) वालों के वास्ते है