होम > धर्म और मान्यताएँ > ईसाई धर्म : इस्लाम की नज़र में > ईसा या मुहम्मद ?
यह सवाल दो मुक़ाबिलों में से इक का इंतिख़ाब मानता है। इस्लाम का जवाब : कोई इंतिख़ाब नहीं, इक इत्तिसाल है। ईसा और मुहम्मद (उन दोनों पर सलाम हो) उसी पैग़ंबरी ज़ंजीरे के दो भाई हैं, इक ही पैग़ाम के बरदार : सिर्फ़ अल्लाह की इबादत।
दोनों में से कोई नहीं : दोनों, एक ही इत्तिसाल में।
क़ुरआन सब रसूलों पर ईमान का हुक्म देता है, "हम उनमें से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते" (क़ुरआन 2:136), और वह दीन जिसके वे बरदार हैं वही एक है : सिर्फ़ अल्लाह की इबादत (क़ुरआन 42:13)।
ईसा (अलैहिस्सलाम) ने मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) की ख़ुशख़बरी दी (क़ुरआन 61:6), मुहम्मद ईसा की इज़्ज़त करते हैं, उन पर ईमान ईमान-ए-मुसलमानी का हिस्सा है (बुख़ारी 3435), और पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने पैग़ंबरों के बारे में फरमाया कि वे "भाई हैं, उनकी माएँ मुख़्तलिफ़ हैं, मगर उनका दीन इक है" (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा)।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 4 मिनट पढ़ने का समय"ईसा या मुहम्मद ?" का सवाल ऐसे उठता है जैसे टीम का इंतिख़ाब हो : अच्छे को चुनो दूसरे को छोड़ो। इस्लाम सवाल को ख़ुद ठुकराता है। क़ुरआन अल्लाह पर और सब रसूलों पर ईमान का हुक्म देता है, "हम उनमें से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते" (क़ुरआन 2:136) : नूह़, इबराहीम (अलैहिस्सलाम), मूसा (अलैहिस्सलाम), ईसा (अलैहिस्सलाम), मुहम्मद (उन पर सलाम हो), इक ही ज़ंजीरा, इक ही दावत।
और क़ुरआन साफ़ करता है कि दीन तारीख़ के सरे से आख़िर तक इक है : "उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया है, जिसका आदेश उसने नूह़ को दिया और जिसकी वह़्य हमने आपकी ओर की, तथा जिसका आदेश हमने इबराहीम तथा मूसा और ईसा को दिया, यह कि इस धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ। बहुदेववादियों पर वह बात भारी है जिसकी ओर आप उन्हें बुलाते हैं। अल्लाह जिसे चाहता है, अपने लिए चुन लेता है और अपनी ओर मार्ग उसी को दिखाता है, जो उसकी ओर लौटता है।" (क़ुरआन 42:13)।
ईसा और मुहम्मद दो ख़ेमे नहीं : वे इक ही अमानत की दो कड़ियाँ हैं, एक ही घर के दो भाई। पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने यह मशहूर जुमले में फरमाया : "पैग़ंबर भाई हैं, उनकी माएँ मुख़्तलिफ़ हैं, मगर उनका दीन इक है" (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा)।
इत्तिसाल इक दीनी ख़याल नहीं : वह दोनों तरफ़ के नुस्ख़ों में लिखा है। क़ुरआन के मुताबिक़ ईसा ने अपने बाद आने वाले की ख़ुशख़बरी दी : "एक रसूल की शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो मेरे बाद आएगा, जिसका नाम अहमद है" (क़ुरआन 61:6)। मुहम्मद को, दूसरी तरफ़, ईसा से मोहब्बत और उन पर ईमान का हुक्म मिला : बग़ैर इस गवाही के कि ईसा "अल्लाह का बंदा और उसका रसूल" हैं कोई मुसलमान नहीं (बुख़ारी 3435), और शाब-ए-मेराज में दोनों हस्तियाँ आमने-सामने, भाई की तरह, मिलीं (बुख़ारी से मरवा)।
शहादा कहने वाला मुसलमान रोज़ ईसा की इज़्ज़त करता है, क्योंकि वह ख़ुलूस से उनकी पैग़ंबरी क़बूल करता है ; और उनकी आमद का मंतज़िर रहता है, क्योंकि उनका ज़िंदा उठा लिया जाना (क़ुरआन 4:158) आख़िरी ज़माने के उतरने की ख़ुशख़बरी देता है।
मुहम्मद के पीछे चलना असल में उस रास्ते पर चलना है जिस पर ईसा लौटते हैं।
फ़र्क़ मौजूद हैं, और वह इख़्तिलाफ़ नहीं, तक़ामुल हैं। मक़सद : ईसा बनी इसराईल की तरफ़ भेजे गए (क़ुरआन 3:49), मुहम्मद पूरी इंसानियत की तरफ़ (क़ुरआन 34:28)।
शरीयत : ईसा ने तौरात की तस्दीक़ की और इंजील दिया गया (क़ुरआन 5:46) ;
मुहम्मद को आख़िरी शरीयत मिली जो ज़िंदगी के हर पहलू को घेरती है।
आख़िरी किरदार : ईसा लौटते हैं, और उनकी आमद ख़ुद इत्तिसाल में होती है, क्योंकि वह मुहम्मद की शरीयत के पीछे चलने, इक मुसलमान जमाअत के पीछे नमाज़ पढ़ने और अल्लाह के बंदे जैसी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए उतरेंगे (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा) : तारीख़ के आख़िरी मंज़र में भी छोटा भाई सील की इज़्ज़त करता है, और सील भाई की। इनमें से कुछ भी इक को दूसरे का मुक़ाबिल नहीं बनाता : यह इक ही क़िस्सा है, इक ही इलाही क़लम से लिखा हुआ, जिसके दो अलग-अलग बाब इन दोनों हस्तियों के हाथ में हैं।
मुसलमान के लिए सवाल पहले से हल है : वह दोनों से मोहब्बत करता है, दोनों पर ईमान रखता है, दोनों के पीछे चलता है, इत्तिसाल की तरतीब में : वह मुहम्मद के पीछे चलता है जिन्होंने ईसा की तस्दीक़ की, और ईसा के उस तालीम के पीछे चलता है जो उन्होंने सचमुच दी, अल्लाह की इकलौती इबादत (क़ुरआन 3:51)। ईसा को माबूद बनाना उनसे ज़्यादा मोहब्बत नहीं : उन्हें अनजाना करना है, जबकि वे हिसाब के दिन बयान करेंगे कि उन्होंने कभी अल्लाह के सिवा किसी की इबादत का हुक्म नहीं दिया (क़ुरआन 5:116-117)। उनकी असली इज़्ज़त यह है कि उनके पीछे वहाँ चला जाए जहाँ वे ले जाना चाहते हैं : सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़।
और उस ईसाई के लिए जो सोच रहा है कि उसे इंतिख़ाब करना चाहिए : क़ुरआन मुक़ाबले की बजाए मुश्तरका कलिमा पेश करता है, "आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे बीच और तुम्हारे बीच समान (बराबर) है; यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें और उसके साथ किसी चीज़ को साझी न बनाएँ" (क़ुरआन 3:64)।
इत्तिसाल बज़बत यहीं से शुरू होता है। आगे पढ़ने के लिए : इस्लाम में ईसा का पृष्ठ, बाइबिल में मुहम्मद की ख़ुशख़बरी का पृष्ठ, और मुसलमान कैसे बनें का सिलसिला यह क़दम उठाने के लिए।
इस्लाम ऐसा गिनती का दरजा क़ायम नहीं करता जिसे मुअज़्ज़म ठहराकर बहस की जाए : हर पैग़ंबर अपने मक़सद से बड़ा है, और मुसलमान सब से मोहब्बत करता है बिना फ़र्क़ के (क़ुरआन 2:136)। मुहम्मद (उन पर सलाम हो) आख़िरी और सील हैं, ईसा (अलैहिस्सलाम) सब से ज़्यादा मुअज़्ज़म हैं और आख़िरी ज़माने में दोबारा आएँगे : दोनों दरजे बग़ैर मुक़ाबले के साथ-साथ मौजूद हैं।
हाँ : मुसलमान के लिए ईसा (अलैहिस्सलाम) के पीछे चलना यह है कि उनकी उसी तालीम के पीछे चला जाए जो उन्होंने सचमुच दी, अल्लाह की इकलौती इबादत (क़ुरआन 3:51)। उन्हें माबूद बनाना उनसे गदारी होगी ; उनसे अल्लाह के बंदे और रसूल के तौर पर मोहब्बत करना उनकी इज़्ज़त है।
क्योंकि हर पिछला पैग़ाम इक क़ौम और इक वक़्त के लिए था, और किताबों में तब्दीलियाँ हुईं (क़ुरआन 2:79)। आख़िरी पैग़ाम हर इंसान के लिए है और महफ़ूज़ है : वह पिछलों की तस्दीक़ करता है और उन पर हुक्म चलाता है (क़ुरआन 5:48), जैसे आख़िरी वसीयत सब विरासतों की हिफ़ाज़त करती है।