हिज़्ब 59 जुज़ 30 का भाग है। इसमें मुसहफ़ के 10 पृष्ठों पर 276 आयतें हैं।
05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया
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عَمَّ يَتَسَآءَلُونَ ﴿1﴾
ये लोग आपस में किस चीज़ का हाल पूछते हैं
عَنِ ٱلنَّبَإِ ٱلْعَظِيمِ ﴿2﴾
एक बड़ी ख़बर का हाल
ٱلَّذِى هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ ﴿3﴾
जिसमें लोग एख्तेलाफ कर रहे हैं
كَلَّا سَيَعْلَمُونَ ﴿4﴾
देखो उन्हें अनक़रीब ही मालूम हो जाएगा
ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ ﴿5﴾
फिर इन्हें अनक़रीब ही ज़रूर मालूम हो जाएगा
أَلَمْ نَجْعَلِ ٱلْأَرْضَ مِهَـٰدًۭا ﴿6﴾
क्या हमने ज़मीन को बिछौना
وَٱلْجِبَالَ أَوْتَادًۭا ﴿7﴾
और पहाड़ों को (ज़मीन) की मेख़े नहीं बनाया
وَخَلَقْنَـٰكُمْ أَزْوَٰجًۭا ﴿8﴾
और हमने तुम लोगों को जोड़ा जोड़ा पैदा किया
وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًۭا ﴿9﴾
और तुम्हारी नींद को आराम (का बाइस) क़रार दिया
وَجَعَلْنَا ٱلَّيْلَ لِبَاسًۭا ﴿10﴾
और रात को परदा बनाया
وَجَعَلْنَا ٱلنَّهَارَ مَعَاشًۭا ﴿11﴾
और हम ही ने दिन को (कसब) मआश (का वक्त) बनाया
وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًۭا شِدَادًۭا ﴿12﴾
और तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आसमान) बनाए
وَجَعَلْنَا سِرَاجًۭا وَهَّاجًۭا ﴿13﴾
और हम ही ने (सूरज) को रौशन चिराग़ बनाया
وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلْمُعْصِرَٰتِ مَآءًۭ ثَجَّاجًۭا ﴿14﴾
और हम ही ने बादलों से मूसलाधार पानी बरसाया
لِّنُخْرِجَ بِهِۦ حَبًّۭا وَنَبَاتًۭا ﴿15﴾
ताकि उसके ज़रिए से दाने और सबज़ी
وَجَنَّـٰتٍ أَلْفَافًا ﴿16﴾
और घने घने बाग़ पैदा करें
إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ كَانَ مِيقَـٰتًۭا ﴿17﴾
बेशक फैसले का दिन मुक़र्रर है
يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًۭا ﴿18﴾
जिस दिन सूर फूँका जाएगा और तुम लोग गिरोह गिरोह हाज़िर होगे
وَفُتِحَتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ أَبْوَٰبًۭا ﴿19﴾
और आसमान खोल दिए जाएँगे
وَسُيِّرَتِ ٱلْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا ﴿20﴾
तो (उसमें) दरवाज़े हो जाएँगे और पहाड़ (अपनी जगह से) चलाए जाएँगे तो रेत होकर रह जाएँगे
إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًۭا ﴿21﴾
बेशक जहन्नुम घात में है
لِّلطَّـٰغِينَ مَـَٔابًۭا ﴿22﴾
सरकशों का (वही) ठिकाना है
لَّـٰبِثِينَ فِيهَآ أَحْقَابًۭا ﴿23﴾
उसमें मुद्दतों पड़े झींकते रहेंगें
لَّا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًۭا وَلَا شَرَابًا ﴿24﴾
न वहाँ ठन्डक का मज़ा चखेंगे और न खौलते हुए पानी
إِلَّا حَمِيمًۭا وَغَسَّاقًۭا ﴿25﴾
और बहती हुई पीप के सिवा कुछ पीने को मिलेगा
جَزَآءًۭ وِفَاقًا ﴿26﴾
(ये उनकी कारस्तानियों का) पूरा पूरा बदला है
إِنَّهُمْ كَانُوا۟ لَا يَرْجُونَ حِسَابًۭا ﴿27﴾
बेशक ये लोग आख़ेरत के हिसाब की उम्मीद ही न रखते थे
وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا كِذَّابًۭا ﴿28﴾
और इन लोगो हमारी आयतों को बुरी तरह झुठलाया
وَكُلَّ شَىْءٍ أَحْصَيْنَـٰهُ كِتَـٰبًۭا ﴿29﴾
और हमने हर चीज़ को लिख कर मनज़बत कर रखा है
فَذُوقُوا۟ فَلَن نَّزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا ﴿30﴾
तो अब तुम मज़ा चखो हमतो तुम पर अज़ाब ही बढ़ाते जाएँगे
إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ مَفَازًا ﴿31﴾
बेशक परहेज़गारों के लिए बड़ी कामयाबी है
حَدَآئِقَ وَأَعْنَـٰبًۭا ﴿32﴾
(यानि बेहश्त के) बाग़ और अंगूर
وَكَوَاعِبَ أَتْرَابًۭا ﴿33﴾
और वह औरतें जिनकी उठती हुई जवानियाँ
وَكَأْسًۭا دِهَاقًۭا ﴿34﴾
और बाहम हमजोलियाँ हैं और शराब के लबरेज़ साग़र
لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًۭا وَلَا كِذَّٰبًۭا ﴿35﴾
और शराब के लबरेज़ साग़र वहाँ न बेहूदा बात सुनेंगे और न झूठ
جَزَآءًۭ مِّن رَّبِّكَ عَطَآءً حِسَابًۭا ﴿36﴾
(ये) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से काफ़ी इनाम और सिला है
رَّبِّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ٱلرَّحْمَـٰنِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًۭا ﴿37﴾
जो सारे आसमान और ज़मीन और जो इन दोनों के बीच में है सबका मालिक है बड़ा मेहरबान लोगों को उससे बात का पूरा न होगा
يَوْمَ يَقُومُ ٱلرُّوحُ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ صَفًّۭا ۖ لَّا يَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَقَالَ صَوَابًۭا ﴿38﴾
जिस दिन जिबरील और फरिश्ते (उसके सामने) पर बाँध कर खड़े होंगे (उस दिन) उससे कोई बात न कर सकेगा मगर जिसे ख़ुदा इजाज़त दे और वह ठिकाने की बात कहे
ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ مَـَٔابًا ﴿39﴾
वह दिन बरहक़ है तो जो शख़्श चाहे अपने परवरदिगार की बारगाह में (अपना) ठिकाना बनाए
إِنَّآ أَنذَرْنَـٰكُمْ عَذَابًۭا قَرِيبًۭا يَوْمَ يَنظُرُ ٱلْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ ٱلْكَافِرُ يَـٰلَيْتَنِى كُنتُ تُرَٰبًۢا ﴿40﴾
हमने तुम लोगों को अनक़रीब आने वाले अज़ाब से डरा दिया जिस दिन आदमी अपने हाथों पहले से भेजे हुए (आमाल) को देखेगा और काफ़िर कहेगा काश मैं ख़ाक हो जाता
وَٱلنَّـٰزِعَـٰتِ غَرْقًۭا ﴿1﴾
उन (फ़रिश्तों) की क़सम
وَٱلنَّـٰشِطَـٰتِ نَشْطًۭا ﴿2﴾
जो (कुफ्फ़ार की रूह) डूब कर सख्ती से खींच लेते हैं
وَٱلسَّـٰبِحَـٰتِ سَبْحًۭا ﴿3﴾
और उनकी क़सम जो (मोमिनीन की जान) आसानी से खोल देते हैं
فَٱلسَّـٰبِقَـٰتِ سَبْقًۭا ﴿4﴾
और उनकी क़सम जो (आसमान ज़मीन के दरमियान) पैरते फिरते हैं
فَٱلْمُدَبِّرَٰتِ أَمْرًۭا ﴿5﴾
फिर एक के आगे बढ़ते हैं
يَوْمَ تَرْجُفُ ٱلرَّاجِفَةُ ﴿6﴾
फिर (दुनिया के) इन्तज़ाम करते हैं (उनकी क़सम) कि क़यामत हो कर रहेगी
تَتْبَعُهَا ٱلرَّادِفَةُ ﴿7﴾
जिस दिन ज़मीन को भूचाल आएगा फिर उसके पीछे और ज़लज़ला आएगा
قُلُوبٌۭ يَوْمَئِذٍۢ وَاجِفَةٌ ﴿8﴾
उस दिन दिलों को धड़कन होगी
أَبْصَـٰرُهَا خَـٰشِعَةٌۭ ﴿9﴾
उनकी ऑंखें (निदामत से) झुकी हुई होंगी
يَقُولُونَ أَءِنَّا لَمَرْدُودُونَ فِى ٱلْحَافِرَةِ ﴿10﴾
कुफ्फ़ार कहते हैं कि क्या हम उलटे पाँव (ज़िन्दगी की तरफ़) फिर लौटेंगे
أَءِذَا كُنَّا عِظَـٰمًۭا نَّخِرَةًۭ ﴿11﴾
क्या जब हम खोखल हड्डियाँ हो जाएँगे
قَالُوا۟ تِلْكَ إِذًۭا كَرَّةٌ خَاسِرَةٌۭ ﴿12﴾
कहते हैं कि ये लौटना तो बड़ा नुक़सान देह है
فَإِنَّمَا هِىَ زَجْرَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ ﴿13﴾
वह (क़यामत) तो (गोया) बस एक सख्त चीख़ होगी
فَإِذَا هُم بِٱلسَّاهِرَةِ ﴿14﴾
और लोग शक़ बारगी एक मैदान (हश्र) में मौजूद होंगे
هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ مُوسَىٰٓ ﴿15﴾
(ऐ रसूल) क्या तुम्हारे पास मूसा का किस्सा भी पहुँचा है
إِذْ نَادَىٰهُ رَبُّهُۥ بِٱلْوَادِ ٱلْمُقَدَّسِ طُوًى ﴿16﴾
जब उनको परवरदिगार ने तूवा के मैदान में पुकारा
ٱذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ ﴿17﴾
कि फिरऔन के पास जाओ वह सरकश हो गया है
فَقُلْ هَل لَّكَ إِلَىٰٓ أَن تَزَكَّىٰ ﴿18﴾
(और उससे) कहो कि क्या तेरी ख्वाहिश है कि (कुफ्र से) पाक हो जाए
وَأَهْدِيَكَ إِلَىٰ رَبِّكَ فَتَخْشَىٰ ﴿19﴾
और मैं तुझे तेरे परवरदिगार की राह बता दूँ तो तुझको ख़ौफ (पैदा) हो
فَأَرَىٰهُ ٱلْـَٔايَةَ ٱلْكُبْرَىٰ ﴿20﴾
ग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया
فَكَذَّبَ وَعَصَىٰ ﴿21﴾
तो उसने झुठला दिया और न माना
ثُمَّ أَدْبَرَ يَسْعَىٰ ﴿22﴾
फिर पीठ फेर कर (ख़िलाफ़ की) तदबीर करने लगा
فَحَشَرَ فَنَادَىٰ ﴿23﴾
फिर (लोगों को) जमा किया और बुलन्द आवाज़ से चिल्लाया
فَقَالَ أَنَا۠ رَبُّكُمُ ٱلْأَعْلَىٰ ﴿24﴾
तो कहने लगा मैं तुम लोगों का सबसे बड़ा परवरदिगार हूँ
فَأَخَذَهُ ٱللَّهُ نَكَالَ ٱلْـَٔاخِرَةِ وَٱلْأُولَىٰٓ ﴿25﴾
तो ख़ुदा ने उसे दुनिया और आख़ेरत (दोनों) के अज़ाब में गिरफ्तार किया
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةًۭ لِّمَن يَخْشَىٰٓ ﴿26﴾
बेशक जो शख़्श (ख़ुदा से) डरे उसके लिए इस (किस्से) में इबरत है
ءَأَنتُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَمِ ٱلسَّمَآءُ ۚ بَنَىٰهَا ﴿27﴾
भला तुम्हारा पैदा करना ज्यादा मुश्किल है या आसमान का
رَفَعَ سَمْكَهَا فَسَوَّىٰهَا ﴿28﴾
कि उसी ने उसको बनाया उसकी छत को ख़ूब ऊँचा रखा
وَأَغْطَشَ لَيْلَهَا وَأَخْرَجَ ضُحَىٰهَا ﴿29﴾
फिर उसे दुरूस्त किया और उसकी रात को तारीक बनाया और (दिन को) उसकी धूप निकाली
وَٱلْأَرْضَ بَعْدَ ذَٰلِكَ دَحَىٰهَآ ﴿30﴾
और उसके बाद ज़मीन को फैलाया
أَخْرَجَ مِنْهَا مَآءَهَا وَمَرْعَىٰهَا ﴿31﴾
उसी में से उसका पानी और उसका चारा निकाला
وَٱلْجِبَالَ أَرْسَىٰهَا ﴿32﴾
और पहाड़ों को उसमें गाड़ दिया
مَتَـٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ ﴿33﴾
(ये सब सामान) तुम्हारे और तुम्हारे चारपायो के फ़ायदे के लिए है
فَإِذَا جَآءَتِ ٱلطَّآمَّةُ ٱلْكُبْرَىٰ ﴿34﴾
तो जब बड़ी सख्त मुसीबत (क़यामत) आ मौजूद होगी
يَوْمَ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَـٰنُ مَا سَعَىٰ ﴿35﴾
जिस दिन इन्सान अपने कामों को कुछ याद करेगा
وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِمَن يَرَىٰ ﴿36﴾
और जहन्नुम देखने वालों के सामने ज़ाहिर कर दी जाएगी
فَأَمَّا مَن طَغَىٰ ﴿37﴾
तो जिसने (दुनिया में) सर उठाया था
وَءَاثَرَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا ﴿38﴾
और दुनियावी ज़िन्दगी को तरजीह दी थी
فَإِنَّ ٱلْجَحِيمَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ ﴿39﴾
उसका ठिकाना तो यक़ीनन दोज़ख़ है
وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ وَنَهَى ٱلنَّفْسَ عَنِ ٱلْهَوَىٰ ﴿40﴾
मगर जो शख़्श अपने परवरदिगार के सामने खड़े होने से डरता और जी को नाजायज़ ख्वाहिशों से रोकता रहा
فَإِنَّ ٱلْجَنَّةَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ ﴿41﴾
तो उसका ठिकाना यक़ीनन बेहश्त है
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلسَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَىٰهَا ﴿42﴾
(ऐ रसूल) लोग तुम से क़यामत के बारे में पूछते हैं
فِيمَ أَنتَ مِن ذِكْرَىٰهَآ ﴿43﴾
कि उसका कहीं थल बेड़ा भी है
إِلَىٰ رَبِّكَ مُنتَهَىٰهَآ ﴿44﴾
तो तुम उसके ज़िक्र से किस फ़िक्र में हो
إِنَّمَآ أَنتَ مُنذِرُ مَن يَخْشَىٰهَا ﴿45﴾
उस (के इल्म) की इन्तेहा तुम्हारे परवरदिगार ही तक है तो तुम बस जो उससे डरे उसको डराने वाले हो
كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا عَشِيَّةً أَوْ ضُحَىٰهَا ﴿46﴾
जिस दिन वह लोग इसको देखेंगे तो (समझेंगे कि दुनिया में) बस एक शाम या सुबह ठहरे थे
عَبَسَ وَتَوَلَّىٰٓ ﴿1﴾
वह अपनी बात पर चीं ब जबीं हो गया
أَن جَآءَهُ ٱلْأَعْمَىٰ ﴿2﴾
और मुँह फेर बैठा कि उसके पास नाबीना आ गया
وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّهُۥ يَزَّكَّىٰٓ ﴿3﴾
और तुमको क्या मालूम यायद वह (तालीम से) पाकीज़गी हासिल करता
أَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنفَعَهُ ٱلذِّكْرَىٰٓ ﴿4﴾
या वह नसीहत सुनता तो नसीहत उसके काम आती
أَمَّا مَنِ ٱسْتَغْنَىٰ ﴿5﴾
तो जो कुछ परवाह नहीं करता
فَأَنتَ لَهُۥ تَصَدَّىٰ ﴿6﴾
उसके तो तुम दरपै हो जाते हो हालॉकि अगर वह न सुधरे
وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ ﴿7﴾
तो तुम ज़िम्मेदार नहीं
وَأَمَّا مَن جَآءَكَ يَسْعَىٰ ﴿8﴾
और जो तुम्हारे पास लपकता हुआ आता है
وَهُوَ يَخْشَىٰ ﴿9﴾
और (ख़ुदा से) डरता है
فَأَنتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ ﴿10﴾
तो तुम उससे बेरूख़ी करते हो
كَلَّآ إِنَّهَا تَذْكِرَةٌۭ ﴿11﴾
देखो ये (क़ुरान) तो सरासर नसीहत है
فَمَن شَآءَ ذَكَرَهُۥ ﴿12﴾
तो जो चाहे इसे याद रखे
فِى صُحُفٍۢ مُّكَرَّمَةٍۢ ﴿13﴾
(लौहे महफूज़ के) बहुत मोअज़ज़िज औराक़ में (लिखा हुआ) है
مَّرْفُوعَةٍۢ مُّطَهَّرَةٍۭ ﴿14﴾
बुलन्द मरतबा और पाक हैं
بِأَيْدِى سَفَرَةٍۢ ﴿15﴾
(ऐसे) लिखने वालों के हाथों में है
كِرَامٍۭ بَرَرَةٍۢ ﴿16﴾
जो बुज़ुर्ग नेकोकार हैं
قُتِلَ ٱلْإِنسَـٰنُ مَآ أَكْفَرَهُۥ ﴿17﴾
इन्सान हलाक हो जाए वह क्या कैसा नाशुक्रा है
مِنْ أَىِّ شَىْءٍ خَلَقَهُۥ ﴿18﴾
(ख़ुदा ने) उसे किस चीज़ से पैदा किया
مِن نُّطْفَةٍ خَلَقَهُۥ فَقَدَّرَهُۥ ﴿19﴾
नुत्फे से उसे पैदा किया फिर उसका अन्दाज़ा मुक़र्रर किया
ثُمَّ ٱلسَّبِيلَ يَسَّرَهُۥ ﴿20﴾
फिर उसका रास्ता आसान कर दिया
ثُمَّ أَمَاتَهُۥ فَأَقْبَرَهُۥ ﴿21﴾
फिर उसे मौत दी फिर उसे कब्र में दफ़न कराया
ثُمَّ إِذَا شَآءَ أَنشَرَهُۥ ﴿22﴾
फिर जब चाहेगा उठा खड़ा करेगा
كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَآ أَمَرَهُۥ ﴿23﴾
सच तो यह है कि ख़ुदा ने जो हुक्म उसे दिया उसने उसको पूरा न किया
فَلْيَنظُرِ ٱلْإِنسَـٰنُ إِلَىٰ طَعَامِهِۦٓ ﴿24﴾
तो इन्सान को अपने घाटे ही तरफ ग़ौर करना चाहिए
أَنَّا صَبَبْنَا ٱلْمَآءَ صَبًّۭا ﴿25﴾
कि हम ही ने (बादल) से पानी बरसाया
ثُمَّ شَقَقْنَا ٱلْأَرْضَ شَقًّۭا ﴿26﴾
फिर हम ही ने ज़मीन (दरख्त उगाकर) चीरी फाड़ी
فَأَنۢبَتْنَا فِيهَا حَبًّۭا ﴿27﴾
फिर हमने उसमें अनाज उगाया
وَعِنَبًۭا وَقَضْبًۭا ﴿28﴾
और अंगूर और तरकारियाँ
وَزَيْتُونًۭا وَنَخْلًۭا ﴿29﴾
और ज़ैतून और खजूरें
وَحَدَآئِقَ غُلْبًۭا ﴿30﴾
और घने घने बाग़ और मेवे
وَفَـٰكِهَةًۭ وَأَبًّۭا ﴿31﴾
और चारा (ये सब कुछ) तुम्हारे और तुम्हारे
مَّتَـٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ ﴿32﴾
चारपायों के फायदे के लिए (बनाया)
فَإِذَا جَآءَتِ ٱلصَّآخَّةُ ﴿33﴾
तो जब कानों के परदे फाड़ने वाली (क़यामत) आ मौजूद होगी
يَوْمَ يَفِرُّ ٱلْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ ﴿34﴾
उस दिन आदमी अपने भाई
وَأُمِّهِۦ وَأَبِيهِ ﴿35﴾
और अपनी माँ और अपने बाप
وَصَـٰحِبَتِهِۦ وَبَنِيهِ ﴿36﴾
और अपने लड़के बालों से भागेगा
لِكُلِّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ يَوْمَئِذٍۢ شَأْنٌۭ يُغْنِيهِ ﴿37﴾
उस दिन हर शख़्श (अपनी नजात की) ऐसी फ़िक्र में होगा जो उसके (मशग़ूल होने के) लिए काफ़ी हों
وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ مُّسْفِرَةٌۭ ﴿38﴾
बहुत से चेहरे तो उस दिन चमकते होंगे
ضَاحِكَةٌۭ مُّسْتَبْشِرَةٌۭ ﴿39﴾
ख़न्दाँ शांदाँ (यही नेको कार हैं)
وَوُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌۭ ﴿40﴾
और बहुत से चेहरे ऐसे होंगे जिन पर गर्द पड़ी होगी
تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌ ﴿41﴾
उस पर सियाही छाई हुई होगी
أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْكَفَرَةُ ٱلْفَجَرَةُ ﴿42﴾
यही कुफ्फ़ार बदकार हैं
إِذَا ٱلشَّمْسُ كُوِّرَتْ ﴿1﴾
जिस वक्त आफ़ताब की चादर को लपेट लिया जाएगा
وَإِذَا ٱلنُّجُومُ ٱنكَدَرَتْ ﴿2﴾
और जिस वक्त तारे गिर पडेग़ें
وَإِذَا ٱلْجِبَالُ سُيِّرَتْ ﴿3﴾
और जब पहाड़ चलाए जाएंगें
وَإِذَا ٱلْعِشَارُ عُطِّلَتْ ﴿4﴾
और जब अनक़रीब जनने वाली ऊंटनियों बेकार कर दी जाएंगी
وَإِذَا ٱلْوُحُوشُ حُشِرَتْ ﴿5﴾
और जिस वक्त वहशी जानवर इकट्ठा किये जायेंगे
وَإِذَا ٱلْبِحَارُ سُجِّرَتْ ﴿6﴾
और जिस वक्त दरिया आग हो जायेंगे
وَإِذَا ٱلنُّفُوسُ زُوِّجَتْ ﴿7﴾
और जिस वक्त रुहें हवियों से मिला दी जाएंगी
وَإِذَا ٱلْمَوْءُۥدَةُ سُئِلَتْ ﴿8﴾
और जिस वक्त ज़िन्दा दर गोर लड़की से पूछा जाएगा
بِأَىِّ ذَنۢبٍۢ قُتِلَتْ ﴿9﴾
कि वह किस गुनाह के बदले मारी गयी
وَإِذَا ٱلصُّحُفُ نُشِرَتْ ﴿10﴾
और जिस वक्त (आमाल के) दफ्तर खोले जाएं
وَإِذَا ٱلسَّمَآءُ كُشِطَتْ ﴿11﴾
और जिस वक्त आसमान का छिलका उतारा जाएगा
وَإِذَا ٱلْجَحِيمُ سُعِّرَتْ ﴿12﴾
और जब दोज़ख़ (की आग) भड़कायी जाएगी
وَإِذَا ٱلْجَنَّةُ أُزْلِفَتْ ﴿13﴾
और जब बेहिश्त क़रीब कर दी जाएगी
عَلِمَتْ نَفْسٌۭ مَّآ أَحْضَرَتْ ﴿14﴾
तब हर शख़्श मालूम करेगा कि वह क्या (आमाल) लेकर आया
فَلَآ أُقْسِمُ بِٱلْخُنَّسِ ﴿15﴾
तो मुझे उन सितारों की क़सम जो चलते चलते पीछे हट जाते
ٱلْجَوَارِ ٱلْكُنَّسِ ﴿16﴾
और ग़ायब होते हैं
وَٱلَّيْلِ إِذَا عَسْعَسَ ﴿17﴾
और रात की क़सम जब ख़त्म होने को आए
وَٱلصُّبْحِ إِذَا تَنَفَّسَ ﴿18﴾
और सुबह की क़सम जब रौशन हो जाए
إِنَّهُۥ لَقَوْلُ رَسُولٍۢ كَرِيمٍۢ ﴿19﴾
कि बेशक यें (क़ुरान) एक मुअज़िज़ फरिश्ता (जिबरील की ज़बान का पैग़ाम है
ذِى قُوَّةٍ عِندَ ذِى ٱلْعَرْشِ مَكِينٍۢ ﴿20﴾
जो बड़े क़वी अर्श के मालिक की बारगाह में बुलन्द रुतबा है
مُّطَاعٍۢ ثَمَّ أَمِينٍۢ ﴿21﴾
वहाँ (सब फरिश्तों का) सरदार अमानतदार है
وَمَا صَاحِبُكُم بِمَجْنُونٍۢ ﴿22﴾
और (मक्के वालों) तुम्हारे साथी मोहम्मद दीवाने नहीं हैं
وَلَقَدْ رَءَاهُ بِٱلْأُفُقِ ٱلْمُبِينِ ﴿23﴾
और बेशक उन्होनें जिबरील को (आसमान के) खुले (शरक़ी) किनारे पर देखा है
وَمَا هُوَ عَلَى ٱلْغَيْبِ بِضَنِينٍۢ ﴿24﴾
और वह ग़ैब की बातों के ज़ाहिर करने में बख़ील नहीं
وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَيْطَـٰنٍۢ رَّجِيمٍۢ ﴿25﴾
और न यह मरदूद शैतान का क़ौल है
فَأَيْنَ تَذْهَبُونَ ﴿26﴾
फिर तुम कहाँ जाते हो
إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ لِّلْعَـٰلَمِينَ ﴿27﴾
ये सारे जहॉन के लोगों के लिए बस नसीहत है
لِمَن شَآءَ مِنكُمْ أَن يَسْتَقِيمَ ﴿28﴾
(मगर) उसी के लिए जो तुममें सीधी राह चले
وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿29﴾
और तुम तो सारे जहॉन के पालने वाले ख़ुदा के चाहे बग़ैर कुछ भी चाह नहीं सकते
إِذَا ٱلسَّمَآءُ ٱنفَطَرَتْ ﴿1﴾
जब आसमान तर्ख़ जाएगा
وَإِذَا ٱلْكَوَاكِبُ ٱنتَثَرَتْ ﴿2﴾
और जब तारे झड़ पड़ेंगे
وَإِذَا ٱلْبِحَارُ فُجِّرَتْ ﴿3﴾
और जब दरिया बह (कर एक दूसरे से मिल) जाएँगे
وَإِذَا ٱلْقُبُورُ بُعْثِرَتْ ﴿4﴾
और जब कब्रें उखाड़ दी जाएँगी
عَلِمَتْ نَفْسٌۭ مَّا قَدَّمَتْ وَأَخَّرَتْ ﴿5﴾
तब हर शख़्श को मालूम हो जाएगा कि उसने आगे क्या भेजा था और पीछे क्या छोड़ा था
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْإِنسَـٰنُ مَا غَرَّكَ بِرَبِّكَ ٱلْكَرِيمِ ﴿6﴾
ऐ इन्सान तुम्हें अपने परवरदिगार के बारे में किस चीज़ ने धोका दिया
ٱلَّذِى خَلَقَكَ فَسَوَّىٰكَ فَعَدَلَكَ ﴿7﴾
जिसने तुझे पैदा किया तो तुझे दुरूस्त बनाया और मुनासिब आज़ा दिए
فِىٓ أَىِّ صُورَةٍۢ مَّا شَآءَ رَكَّبَكَ ﴿8﴾
और जिस सूरत में उसने चाहा तेरे जोड़ बन्द मिलाए
كَلَّا بَلْ تُكَذِّبُونَ بِٱلدِّينِ ﴿9﴾
हाँ बात ये है कि तुम लोग जज़ा (के दिन) को झुठलाते हो
وَإِنَّ عَلَيْكُمْ لَحَـٰفِظِينَ ﴿10﴾
हालॉकि तुम पर निगेहबान मुक़र्रर हैं
كِرَامًۭا كَـٰتِبِينَ ﴿11﴾
बुर्ज़ुग लोग (फरिश्ते सब बातों को) लिखने वाले (केरामन क़ातेबीन)
يَعْلَمُونَ مَا تَفْعَلُونَ ﴿12﴾
जो कुछ तुम करते हो वह सब जानते हैं
إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ لَفِى نَعِيمٍۢ ﴿13﴾
बेशक नेको कार (बेहिश्त की) नेअमतों में होंगे
وَإِنَّ ٱلْفُجَّارَ لَفِى جَحِيمٍۢ ﴿14﴾
और बदकार लोग यक़ीनन जहन्नुम में जज़ा के दिन
يَصْلَوْنَهَا يَوْمَ ٱلدِّينِ ﴿15﴾
उसी में झोंके जाएँगे
وَمَا هُمْ عَنْهَا بِغَآئِبِينَ ﴿16﴾
और वह लोग उससे छुप न सकेंगे
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا يَوْمُ ٱلدِّينِ ﴿17﴾
और तुम्हें क्या मालूम कि जज़ा का दिन क्या है
ثُمَّ مَآ أَدْرَىٰكَ مَا يَوْمُ ٱلدِّينِ ﴿18﴾
फिर तुम्हें क्या मालूम कि जज़ा का दिन क्या चीज़ है
يَوْمَ لَا تَمْلِكُ نَفْسٌۭ لِّنَفْسٍۢ شَيْـًۭٔا ۖ وَٱلْأَمْرُ يَوْمَئِذٍۢ لِّلَّهِ ﴿19﴾
उस दिन कोई शख़्श किसी शख़्श की भलाई न कर सकेगा और उस दिन हुक्म सिर्फ ख़ुदा ही का होगा
وَيْلٌۭ لِّلْمُطَفِّفِينَ ﴿1﴾
नाप तौल में कमी करने वालों की ख़राबी है
ٱلَّذِينَ إِذَا ٱكْتَالُوا۟ عَلَى ٱلنَّاسِ يَسْتَوْفُونَ ﴿2﴾
जो औरें से नाप कर लें तो पूरा पूरा लें
وَإِذَا كَالُوهُمْ أَو وَّزَنُوهُمْ يُخْسِرُونَ ﴿3﴾
और जब उनकी नाप या तौल कर दें तो कम कर दें
أَلَا يَظُنُّ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَنَّهُم مَّبْعُوثُونَ ﴿4﴾
क्या ये लोग इतना भी ख्याल नहीं करते
لِيَوْمٍ عَظِيمٍۢ ﴿5﴾
कि एक बड़े (सख्त) दिन (क़यामत) में उठाए जाएँगे
يَوْمَ يَقُومُ ٱلنَّاسُ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿6﴾
जिस दिन तमाम लोग सारे जहाँन के परवरदिगार के सामने खड़े होंगे
كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْفُجَّارِ لَفِى سِجِّينٍۢ ﴿7﴾
सुन रखो कि बदकारों के नाम ए अमाल सिज्जीन में हैं
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا سِجِّينٌۭ ﴿8﴾
तुमको क्या मालूम सिज्जीन क्या चीज़ है
كِتَـٰبٌۭ مَّرْقُومٌۭ ﴿9﴾
एक लिखा हुआ दफ़तर है जिसमें शयातीन के (आमाल दर्ज हैं)
وَيْلٌۭ يَوْمَئِذٍۢ لِّلْمُكَذِّبِينَ ﴿10﴾
उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है
ٱلَّذِينَ يُكَذِّبُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ ﴿11﴾
जो लोग रोजे ज़ज़ा को झुठलाते हैं
وَمَا يُكَذِّبُ بِهِۦٓ إِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ ﴿12﴾
हालॉकि उसको हद से निकल जाने वाले गुनाहगार के सिवा कोई नहीं झुठलाता
إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَـٰتُنَا قَالَ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿13﴾
जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो कहता है कि ये तो अगलों के अफसाने हैं
كَلَّا ۖ بَلْ ۜ رَانَ عَلَىٰ قُلُوبِهِم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ ﴿14﴾
नहीं नहीं बात ये है कि ये लोग जो आमाल (बद) करते हैं उनका उनके दिलों पर जंग बैठ गया है
كَلَّآ إِنَّهُمْ عَن رَّبِّهِمْ يَوْمَئِذٍۢ لَّمَحْجُوبُونَ ﴿15﴾
बेशक ये लोग उस दिन अपने परवरदिगार (की रहमत से) रोक दिए जाएँगे
ثُمَّ إِنَّهُمْ لَصَالُوا۟ ٱلْجَحِيمِ ﴿16﴾
फिर ये लोग ज़रूर जहन्नुम वासिल होंगे
ثُمَّ يُقَالُ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ ﴿17﴾
फिर उनसे कहा जाएगा कि ये वही चीज़ तो है जिसे तुम झुठलाया करते थे
كَلَّآ إِنَّ كِتَـٰبَ ٱلْأَبْرَارِ لَفِى عِلِّيِّينَ ﴿18﴾
ये भी सुन रखो कि नेको के नाम ए अमाल इल्लीयीन में होंगे
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا عِلِّيُّونَ ﴿19﴾
और तुमको क्या मालूम कि इल्लीयीन क्या है वह एक लिखा हुआ दफ़तर है
كِتَـٰبٌۭ مَّرْقُومٌۭ ﴿20﴾
जिसमें नेकों के आमाल दर्ज हैं
يَشْهَدُهُ ٱلْمُقَرَّبُونَ ﴿21﴾
उसके पास मुक़र्रिब (फ़रिश्ते) हाज़िर हैं
إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ لَفِى نَعِيمٍ ﴿22﴾
बेशक नेक लोग नेअमतों में होंगे
عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ ﴿23﴾
तख्तों पर बैठे नज़ारे करेंगे
تَعْرِفُ فِى وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ ٱلنَّعِيمِ ﴿24﴾
तुम उनके चेहरों ही से राहत की ताज़गी मालूम कर लोगे
يُسْقَوْنَ مِن رَّحِيقٍۢ مَّخْتُومٍ ﴿25﴾
उनको सर ब मोहर ख़ालिस शराब पिलायी जाएगी
خِتَـٰمُهُۥ مِسْكٌۭ ۚ وَفِى ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ ٱلْمُتَنَـٰفِسُونَ ﴿26﴾
जिसकी मोहर मिश्क की होगी और उसकी तरफ अलबत्ता शायक़ीन को रग़बत करनी चाहिए
وَمِزَاجُهُۥ مِن تَسْنِيمٍ ﴿27﴾
और उस (शराब) में तसनीम के पानी की आमेज़िश होगी
عَيْنًۭا يَشْرَبُ بِهَا ٱلْمُقَرَّبُونَ ﴿28﴾
वह एक चश्मा है जिसमें मुक़रेबीन पियेंगे
إِنَّ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ كَانُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يَضْحَكُونَ ﴿29﴾
बेशक जो गुनाहगार मोमिनों से हँसी किया करते थे
وَإِذَا مَرُّوا۟ بِهِمْ يَتَغَامَزُونَ ﴿30﴾
और जब उनके पास से गुज़रते तो उन पर चशमक करते थे
وَإِذَا ٱنقَلَبُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمُ ٱنقَلَبُوا۟ فَكِهِينَ ﴿31﴾
और जब अपने लड़के वालों की तरफ़ लौट कर आते थे तो इतराते हुए
وَإِذَا رَأَوْهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ لَضَآلُّونَ ﴿32﴾
और जब उन मोमिनीन को देखते तो कह बैठते थे कि ये तो यक़ीनी गुमराह हैं
وَمَآ أُرْسِلُوا۟ عَلَيْهِمْ حَـٰفِظِينَ ﴿33﴾
हालॉकि ये लोग उन पर कुछ निगराँ बना के तो भेजे नहीं गए थे
فَٱلْيَوْمَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنَ ٱلْكُفَّارِ يَضْحَكُونَ ﴿34﴾
तो आज (क़यामत में) ईमानदार लोग काफ़िरों से हँसी करेंगे
عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ ﴿35﴾
(और) तख्तों पर बैठे नज़ारे करेंगे
هَلْ ثُوِّبَ ٱلْكُفَّارُ مَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ ﴿36﴾
कि अब तो काफ़िरों को उनके किए का पूरा पूरा बदला मिल गया
إِذَا ٱلسَّمَآءُ ٱنشَقَّتْ ﴿1﴾
जब आसमान फट जाएगा
وَأَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْ ﴿2﴾
और अपने परवरदिगार का हुक्म बजा लाएगा और उसे वाजिब भी यही है
وَإِذَا ٱلْأَرْضُ مُدَّتْ ﴿3﴾
और जब ज़मीन (बराबर करके) तान दी जाएगी
وَأَلْقَتْ مَا فِيهَا وَتَخَلَّتْ ﴿4﴾
और जो कुछ उसमें है उगल देगी और बिल्कुल ख़ाली हो जाएगी
وَأَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْ ﴿5﴾
और अपने परवरदिगार का हुक्म बजा लाएगी
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْإِنسَـٰنُ إِنَّكَ كَادِحٌ إِلَىٰ رَبِّكَ كَدْحًۭا فَمُلَـٰقِيهِ ﴿6﴾
और उस पर लाज़िम भी यही है (तो क़यामत आ जाएगी) ऐ इन्सान तू अपने परवरदिगार की हुज़ूरी की कोशिश करता है
فَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِيَمِينِهِۦ ﴿7﴾
तो तू (एक न एक दिन) उसके सामने हाज़िर होगा फिर (उस दिन) जिसका नामाए आमाल उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा
فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًۭا يَسِيرًۭا ﴿8﴾
उससे तो हिसाब आसान तरीके से लिया जाएगा
وَيَنقَلِبُ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ مَسْرُورًۭا ﴿9﴾
और (फिर) वह अपने (मोमिनीन के) क़बीले की तरफ ख़ुश ख़ुश पलटेगा
وَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ وَرَآءَ ظَهْرِهِۦ ﴿10﴾
लेकिन जिस शख़्श को उसका नामए आमल उसकी पीठ के पीछे से दिया जाएगा
فَسَوْفَ يَدْعُوا۟ ثُبُورًۭا ﴿11﴾
वह तो मौत की दुआ करेगा
وَيَصْلَىٰ سَعِيرًا ﴿12﴾
और जहन्नुम वासिल होगा
إِنَّهُۥ كَانَ فِىٓ أَهْلِهِۦ مَسْرُورًا ﴿13﴾
ये शख़्श तो अपने लड़के बालों में मस्त रहता था
إِنَّهُۥ ظَنَّ أَن لَّن يَحُورَ ﴿14﴾
और समझता था कि कभी (ख़ुदा की तरफ) फिर कर जाएगा ही नहीं
بَلَىٰٓ إِنَّ رَبَّهُۥ كَانَ بِهِۦ بَصِيرًۭا ﴿15﴾
हाँ उसका परवरदिगार यक़ीनी उसको देख भाल कर रहा है
فَلَآ أُقْسِمُ بِٱلشَّفَقِ ﴿16﴾
तो मुझे शाम की मुर्ख़ी की क़सम
وَٱلَّيْلِ وَمَا وَسَقَ ﴿17﴾
और रात की और उन चीज़ों की जिन्हें ये ढाँक लेती है
وَٱلْقَمَرِ إِذَا ٱتَّسَقَ ﴿18﴾
और चाँद की जब पूरा हो जाए
لَتَرْكَبُنَّ طَبَقًا عَن طَبَقٍۢ ﴿19﴾
कि तुम लोग ज़रूर एक सख्ती के बाद दूसरी सख्ती में फँसोगे
فَمَا لَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ﴿20﴾
तो उन लोगों को क्या हो गया है कि ईमान नहीं ईमान नहीं लाते
وَإِذَا قُرِئَ عَلَيْهِمُ ٱلْقُرْءَانُ لَا يَسْجُدُونَ ۩ ﴿21﴾
और जब उनके सामने क़ुरान पढ़ा जाता है तो (ख़ुदा का) सजदा नहीं करते (21) (सजदा)
بَلِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يُكَذِّبُونَ ﴿22﴾
बल्कि काफ़िर लोग तो (और उसे) झुठलाते हैं
وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُوعُونَ ﴿23﴾
और जो बातें ये लोग अपने दिलों में छिपाते हैं ख़ुदा उसे ख़ूब जानता है
فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ ﴿24﴾
तो (ऐ रसूल) उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍۭ ﴿25﴾
मगर जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे अच्छे काम किए उनके लिए बेइन्तिहा अज्र (व सवाब है)
وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلْبُرُوجِ ﴿1﴾
बुर्ज़ों वाले आसमानों की क़सम
وَٱلْيَوْمِ ٱلْمَوْعُودِ ﴿2﴾
और उस दिन की जिसका वायदा किया गया है
وَشَاهِدٍۢ وَمَشْهُودٍۢ ﴿3﴾
और गवाह की और जिसकी गवाही दे जाएगी
قُتِلَ أَصْحَـٰبُ ٱلْأُخْدُودِ ﴿4﴾
उसकी (कि कुफ्फ़ार मक्का हलाक हुए) जिस तरह ख़न्दक़ वाले हलाक कर दिए गए
ٱلنَّارِ ذَاتِ ٱلْوَقُودِ ﴿5﴾
जो ख़न्दक़ें आग की थीं
إِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌۭ ﴿6﴾
जिसमें (उन्होंने मुसलमानों के लिए) ईंधन झोंक रखा था
وَهُمْ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌۭ ﴿7﴾
जब वह उन (ख़न्दक़ों) पर बैठे हुए और जो सुलूक ईमानदारों के साथ करते थे उसको सामने देख रहे थे
وَمَا نَقَمُوا۟ مِنْهُمْ إِلَّآ أَن يُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَمِيدِ ﴿8﴾
और उनको मोमिनीन की यही बात बुरी मालूम हुई कि वह लोग ख़ुदा पर ईमान लाए थे जो ज़बरदस्त और सज़ावार हम्द है
ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدٌ ﴿9﴾
वह (ख़ुदा) जिसकी सारे आसमान ज़मीन में बादशाहत है और ख़ुदा हर चीज़ से वाक़िफ़ है
إِنَّ ٱلَّذِينَ فَتَنُوا۟ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا۟ فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ ٱلْحَرِيقِ ﴿10﴾
बेशक जिन लोगों ने ईमानदार मर्दों और औरतों को तकलीफें दीं फिर तौबा न की उनके लिए जहन्नुम का अज़ाब तो है ही (इसके अलावा) जलने का भी अज़ाब होगा
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُمْ جَنَّـٰتٌۭ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْكَبِيرُ ﴿11﴾
बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे उनके लिए वह बाग़ात हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं यही तो बड़ी कामयाबी है
إِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَدِيدٌ ﴿12﴾
बेशक तुम्हारे परवरदिगार की पकड़ बहुत सख्त है
إِنَّهُۥ هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ ﴿13﴾
वही पहली दफ़ा पैदा करता है और वही दोबारा (क़यामत में ज़िन्दा) करेगा
وَهُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلْوَدُودُ ﴿14﴾
और वही बड़ा बख्शने वाला मोहब्बत करने वाला है
ذُو ٱلْعَرْشِ ٱلْمَجِيدُ ﴿15﴾
अर्श का मालिक बड़ा आलीशान है
فَعَّالٌۭ لِّمَا يُرِيدُ ﴿16﴾
जो चाहता है करता है
هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ٱلْجُنُودِ ﴿17﴾
क्या तुम्हारे पास लशकरों की ख़बर पहुँची है
فِرْعَوْنَ وَثَمُودَ ﴿18﴾
(यानि) फिरऔन व समूद की (ज़रूर पहुँची है)
بَلِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فِى تَكْذِيبٍۢ ﴿19﴾
मगर कुफ्फ़ार तो झुठलाने ही (की फ़िक्र) में हैं
وَٱللَّهُ مِن وَرَآئِهِم مُّحِيطٌۢ ﴿20﴾
और ख़ुदा उनको पीछे से घेरे हुए है (ये झुठलाने के क़ाबिल नहीं)
بَلْ هُوَ قُرْءَانٌۭ مَّجِيدٌۭ ﴿21﴾
बल्कि ये तो क़ुरान मजीद है
فِى لَوْحٍۢ مَّحْفُوظٍۭ ﴿22﴾
जो लौहे महफूज़ में लिखा हुआ है
وَٱلسَّمَآءِ وَٱلطَّارِقِ ﴿1﴾
आसमान और रात को आने वाले की क़सम
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلطَّارِقُ ﴿2﴾
और तुमको क्या मालूम रात को आने वाला क्या है
ٱلنَّجْمُ ٱلثَّاقِبُ ﴿3﴾
(वह) चमकता हुआ तारा है
إِن كُلُّ نَفْسٍۢ لَّمَّا عَلَيْهَا حَافِظٌۭ ﴿4﴾
(इस बात की क़सम) कि कोई शख़्श ऐसा नहीं जिस पर निगेहबान मुक़र्रर नहीं
فَلْيَنظُرِ ٱلْإِنسَـٰنُ مِمَّ خُلِقَ ﴿5﴾
तो इन्सान को देखना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा हुआ हैं
خُلِقَ مِن مَّآءٍۢ دَافِقٍۢ ﴿6﴾
वह उछलते हुए पानी (मनी) से पैदा हुआ है
يَخْرُجُ مِنۢ بَيْنِ ٱلصُّلْبِ وَٱلتَّرَآئِبِ ﴿7﴾
जो पीठ और सीने की हड्डियों के बीच में से निकलता है
إِنَّهُۥ عَلَىٰ رَجْعِهِۦ لَقَادِرٌۭ ﴿8﴾
बेशक ख़ुदा उसके दोबारा (पैदा) करने पर ज़रूर कुदरत रखता है
يَوْمَ تُبْلَى ٱلسَّرَآئِرُ ﴿9﴾
जिस दिन दिलों के भेद जाँचे जाएँगे
فَمَا لَهُۥ مِن قُوَّةٍۢ وَلَا نَاصِرٍۢ ﴿10﴾
तो (उस दिन) उसका न कुछ ज़ोर चलेगा और न कोई मददगार होगा
وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلرَّجْعِ ﴿11﴾
चक्कर (खाने) वाले आसमान की क़सम
وَٱلْأَرْضِ ذَاتِ ٱلصَّدْعِ ﴿12﴾
और फटने वाली (ज़मीन की क़सम)
إِنَّهُۥ لَقَوْلٌۭ فَصْلٌۭ ﴿13﴾
बेशक ये क़ुरान क़ौले फ़ैसल है
وَمَا هُوَ بِٱلْهَزْلِ ﴿14﴾
और लग़ो नहीं है
إِنَّهُمْ يَكِيدُونَ كَيْدًۭا ﴿15﴾
बेशक ये कुफ्फ़ार अपनी तदबीर कर रहे हैं
وَأَكِيدُ كَيْدًۭا ﴿16﴾
और मैं अपनी तद्बीर कर रहा हूँ
فَمَهِّلِ ٱلْكَـٰفِرِينَ أَمْهِلْهُمْ رُوَيْدًۢا ﴿17﴾
तो काफ़िरों को मोहलत दो बस उनको थोड़ी सी मोहलत दो