क़ुरआन का रुकू 466 पढ़ें

रुकू 466 सूरह Ar-Rahman (आयत 1 से 25) से है। इसमें 25 आयतें हैं और यह जुज़ 27 में है।

28 अक्टूबर 2026 को 00h24 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में रुकू 466

25
आयतें
1
सूरह
27
जुज़
v.1 – v.25
आयतें

रुकू 466 में सूरह

الرحمن · जुज़ 27
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سورة الرحمن
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ٱلرَّحْمَـٰنُ ﴿1﴾

बड़ा मेहरबान (ख़ुदा)

عَلَّمَ ٱلْقُرْءَانَ ﴿2﴾

उसी ने क़ुरान की तालीम फरमाई

خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ ﴿3﴾

उसी ने इन्सान को पैदा किया

عَلَّمَهُ ٱلْبَيَانَ ﴿4﴾

उसी ने उनको (अपना मतलब) बयान करना सिखाया

ٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ بِحُسْبَانٍۢ ﴿5﴾

सूरज और चाँद एक मुक़र्रर हिसाब से चल रहे हैं

وَٱلنَّجْمُ وَٱلشَّجَرُ يَسْجُدَانِ ﴿6﴾

और बूटियाँ बेलें, और दरख्त (उसी को) सजदा करते हैं

وَٱلسَّمَآءَ رَفَعَهَا وَوَضَعَ ٱلْمِيزَانَ ﴿7﴾

और उसी ने आसमान बुलन्द किया और तराजू (इन्साफ) को क़ायम किया

أَلَّا تَطْغَوْا۟ فِى ٱلْمِيزَانِ ﴿8﴾

ताकि तुम लोग तराज़ू (से तौलने) में हद से तजाउज़ न करो

وَأَقِيمُوا۟ ٱلْوَزْنَ بِٱلْقِسْطِ وَلَا تُخْسِرُوا۟ ٱلْمِيزَانَ ﴿9﴾

और ईन्साफ के साथ ठीक तौलो और तौल कम न करो

وَٱلْأَرْضَ وَضَعَهَا لِلْأَنَامِ ﴿10﴾

और उसी ने लोगों के नफे क़े लिए ज़मीन बनायी

فِيهَا فَـٰكِهَةٌۭ وَٱلنَّخْلُ ذَاتُ ٱلْأَكْمَامِ ﴿11﴾

कि उसमें मेवे और खजूर के दरख्त हैं जिसके ख़ोशों में ग़िलाफ़ होते हैं

وَٱلْحَبُّ ذُو ٱلْعَصْفِ وَٱلرَّيْحَانُ ﴿12﴾

और अनाज जिसके साथ भुस होता है और ख़ुशबूदार फूल

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿13﴾

तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों को न मानोगे

خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ مِن صَلْصَـٰلٍۢ كَٱلْفَخَّارِ ﴿14﴾

उसी ने इन्सान को ठीकरे की तरह खन खनाती हुई मिटटी से पैदा किया

وَخَلَقَ ٱلْجَآنَّ مِن مَّارِجٍۢ مِّن نَّارٍۢ ﴿15﴾

और उसी ने जिन्नात को आग के शोले से पैदा किया

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿16﴾

तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों से मुकरोगे

رَبُّ ٱلْمَشْرِقَيْنِ وَرَبُّ ٱلْمَغْرِبَيْنِ ﴿17﴾

वही जाड़े गर्मी के दोनों मशरिकों का मालिक है और दोनों मग़रिबों का (भी) मालिक है

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿18﴾

तो (ऐ जिनों) और (आदमियों) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे

مَرَجَ ٱلْبَحْرَيْنِ يَلْتَقِيَانِ ﴿19﴾

उसी ने दरिया बहाए जो बाहम मिल जाते हैं

بَيْنَهُمَا بَرْزَخٌۭ لَّا يَبْغِيَانِ ﴿20﴾

दो के दरमियान एक हद्दे फ़ासिल (आड़) है जिससे तजाउज़ नहीं कर सकते

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿21﴾

तो (ऐ जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

يَخْرُجُ مِنْهُمَا ٱللُّؤْلُؤُ وَٱلْمَرْجَانُ ﴿22﴾

इन दोनों दरियाओं से मोती और मूँगे निकलते हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿23﴾

(तो जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत को न मानोगे

وَلَهُ ٱلْجَوَارِ ٱلْمُنشَـَٔاتُ فِى ٱلْبَحْرِ كَٱلْأَعْلَـٰمِ ﴿24﴾

और जहाज़ जो दरिया में पहाड़ों की तरह ऊँचे खड़े रहते हैं उसी के हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿25﴾

तो (ऐ जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे

بسم الله الرحمن الرحيم गुरु 17 जुमादा अल-अव्वल
الخميس 17 جمادى الأولى
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11 दिनों में अमावस्या
الحمد لله अल्लाह की सारी प्रशंसा है

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद