क़ुरआन का रुकू 511 पढ़ें

रुकू 511 सूरह Al-Muddaththir (आयत 32 से 56) से है। इसमें 25 आयतें हैं और यह जुज़ 29 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में रुकू 511

25
आयतें
1
सूरह
29
जुज़
v.32 – v.56
आयतें

रुकू 511 में सूरह

المدثر · जुज़ 29
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पृष्ठ 576
रुकू 511
سورة المدثر
जुज़ 29 66.1% (285/431)
हिज़्ब 58 35.1% (79/225)

كَلَّا وَٱلْقَمَرِ ﴿32﴾

सुन रखो (हमें) चाँद की क़सम

وَٱلَّيْلِ إِذْ أَدْبَرَ ﴿33﴾

और रात की जब जाने लगे

وَٱلصُّبْحِ إِذَآ أَسْفَرَ ﴿34﴾

और सुबह की जब रौशन हो जाए

إِنَّهَا لَإِحْدَى ٱلْكُبَرِ ﴿35﴾

कि वह (जहन्नुम) भी एक बहुत बड़ी (आफ़त) है

نَذِيرًۭا لِّلْبَشَرِ ﴿36﴾

(और) लोगों के डराने वाली है

لِمَن شَآءَ مِنكُمْ أَن يَتَقَدَّمَ أَوْ يَتَأَخَّرَ ﴿37﴾

(सबके लिए नहीें बल्कि) तुममें से वह जो शख़्श (नेकी की तरफ़) आगे बढ़ना

كُلُّ نَفْسٍۭ بِمَا كَسَبَتْ رَهِينَةٌ ﴿38﴾

और (बुराई से) पीछे हटना चाहे हर शख़्श अपने आमाल के बदले गिर्द है

إِلَّآ أَصْحَـٰبَ ٱلْيَمِينِ ﴿39﴾

मगर दाहिने हाथ (में नामए अमल लेने) वाले

فِى جَنَّـٰتٍۢ يَتَسَآءَلُونَ ﴿40﴾

(बेहिश्त के) बाग़ों में गुनेहगारों से बाहम पूछ रहे होंगे

عَنِ ٱلْمُجْرِمِينَ ﴿41﴾

कि आख़िर तुम्हें दोज़ख़ में कौन सी चीज़ (घसीट) लायी

مَا سَلَكَكُمْ فِى سَقَرَ ﴿42﴾

वह लोग कहेंगे

قَالُوا۟ لَمْ نَكُ مِنَ ٱلْمُصَلِّينَ ﴿43﴾

कि हम न तो नमाज़ पढ़ा करते थे

وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ ٱلْمِسْكِينَ ﴿44﴾

और न मोहताजों को खाना खिलाते थे

وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ ٱلْخَآئِضِينَ ﴿45﴾

और अहले बातिल के साथ हम भी बड़े काम में घुस पड़ते थे

وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ ﴿46﴾

और रोज़ जज़ा को झुठलाया करते थे (और यूँ ही रहे)

حَتَّىٰٓ أَتَىٰنَا ٱلْيَقِينُ ﴿47﴾

यहाँ तक कि हमें मौत आ गयी

فَمَا تَنفَعُهُمْ شَفَـٰعَةُ ٱلشَّـٰفِعِينَ ﴿48﴾

तो (उस वक्त) उन्हें सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश कुछ काम न आएगी

فَمَا لَهُمْ عَنِ ٱلتَّذْكِرَةِ مُعْرِضِينَ ﴿49﴾

और उन्हें क्या हो गया है कि नसीहत से मुँह मोड़े हुए हैं

كَأَنَّهُمْ حُمُرٌۭ مُّسْتَنفِرَةٌۭ ﴿50﴾

गोया वह वहशी गधे हैं

فَرَّتْ مِن قَسْوَرَةٍۭ ﴿51﴾

कि येर से (दुम दबा कर) भागते हैं

بَلْ يُرِيدُ كُلُّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ أَن يُؤْتَىٰ صُحُفًۭا مُّنَشَّرَةًۭ ﴿52﴾

असल ये है कि उनमें से हर शख़्श इसका मुतमइनी है कि उसे खुली हुई (आसमानी) किताबें अता की जाएँ

كَلَّا ۖ بَل لَّا يَخَافُونَ ٱلْـَٔاخِرَةَ ﴿53﴾

ये तो हरगिज़ न होगा बल्कि ये तो आख़ेरत ही से नहीं डरते

كَلَّآ إِنَّهُۥ تَذْكِرَةٌۭ ﴿54﴾

हाँ हाँ बेशक ये (क़ुरान सरा सर) नसीहत है

فَمَن شَآءَ ذَكَرَهُۥ ﴿55﴾

तो जो चाहे उसे याद रखे

وَمَا يَذْكُرُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ ۚ هُوَ أَهْلُ ٱلتَّقْوَىٰ وَأَهْلُ ٱلْمَغْفِرَةِ ﴿56﴾

और ख़ुदा की मशीयत के बग़ैर ये लोग याद रखने वाले नहीं वही (बन्दों के) डराने के क़ाबिल और बख्यिश का मालिक है

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