क़ुरआन का हिज़्ब 60 पढ़ें

हिज़्ब 60 जुज़ 30 का भाग है। इसमें मुसहफ़ के 14 पृष्ठों पर 288 आयतें हैं।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

الأعلى · जुज़ 30
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हिज़्ब 60
سورة الطارق
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سَبِّحِ ٱسْمَ رَبِّكَ ٱلْأَعْلَى ﴿1﴾

ऐ रसूल अपने आलीशान परवरदिगार के नाम की तस्बीह करो

ٱلَّذِى خَلَقَ فَسَوَّىٰ ﴿2﴾

जिसने (हर चीज़ को) पैदा किया

وَٱلَّذِى قَدَّرَ فَهَدَىٰ ﴿3﴾

और दुरूस्त किया और जिसने (उसका) अन्दाज़ा मुक़र्रर किया फिर राह बतायी

وَٱلَّذِىٓ أَخْرَجَ ٱلْمَرْعَىٰ ﴿4﴾

और जिसने (हैवानात के लिए) चारा उगाया

فَجَعَلَهُۥ غُثَآءً أَحْوَىٰ ﴿5﴾

फिर ख़ुश्क उसे सियाह रंग का कूड़ा कर दिया

سَنُقْرِئُكَ فَلَا تَنسَىٰٓ ﴿6﴾

हम तुम्हें (ऐसा) पढ़ा देंगे कि कभी भूलो ही नहीं

إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلْجَهْرَ وَمَا يَخْفَىٰ ﴿7﴾

मगर जो ख़ुदा चाहे (मन्सूख़ कर दे) बेशक वह खुली बात को भी जानता है और छुपे हुए को भी

وَنُيَسِّرُكَ لِلْيُسْرَىٰ ﴿8﴾

और हम तुमको आसान तरीके की तौफ़ीक़ देंगे

فَذَكِّرْ إِن نَّفَعَتِ ٱلذِّكْرَىٰ ﴿9﴾

तो जहाँ तक समझाना मुफ़ीद हो समझते रहो

سَيَذَّكَّرُ مَن يَخْشَىٰ ﴿10﴾

जो खौफ रखता हो वह तो फौरी समझ जाएगा

وَيَتَجَنَّبُهَا ٱلْأَشْقَى ﴿11﴾

और बदबख्त उससे पहलू तही करेगा

ٱلَّذِى يَصْلَى ٱلنَّارَ ٱلْكُبْرَىٰ ﴿12﴾

जो (क़यामत में) बड़ी (तेज़) आग में दाख़िल होगा

ثُمَّ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ ﴿13﴾

फिर न वहाँ मरेगा ही न जीयेगा

قَدْ أَفْلَحَ مَن تَزَكَّىٰ ﴿14﴾

वह यक़ीनन मुराद दिली को पहुँचा जो (शिर्क से) पाक हो

وَذَكَرَ ٱسْمَ رَبِّهِۦ فَصَلَّىٰ ﴿15﴾

और अपने परवरदिगार का ज़िक्र करता और नमाज़ पढ़ता रहा

بَلْ تُؤْثِرُونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا ﴿16﴾

मगर तुम लोग दुनियावी ज़िन्दगी को तरजीह देते हो

وَٱلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰٓ ﴿17﴾

हालॉकि आख़ोरत कहीं बेहतर और देर पा है

إِنَّ هَـٰذَا لَفِى ٱلصُّحُفِ ٱلْأُولَىٰ ﴿18﴾

बेशक यही बात अगले सहीफ़ों

صُحُفِ إِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ ﴿19﴾

इबराहीम और मूसा के सहीफ़ों में भी है

هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ٱلْغَـٰشِيَةِ ﴿1﴾

भला तुमको ढाँप लेने वाली मुसीबत (क़यामत) का हाल मालुम हुआ है

وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍ خَـٰشِعَةٌ ﴿2﴾

उस दिन बहुत से चेहरे ज़लील रूसवा होंगे

عَامِلَةٌۭ نَّاصِبَةٌۭ ﴿3﴾

(तौक़ व जंज़ीर से) मयक्क़त करने वाले

تَصْلَىٰ نَارًا حَامِيَةًۭ ﴿4﴾

थके माँदे दहकती हुई आग में दाखिल होंगे

تُسْقَىٰ مِنْ عَيْنٍ ءَانِيَةٍۢ ﴿5﴾

उन्हें एक खौलते हुए चशमें का पानी पिलाया जाएगा

لَّيْسَ لَهُمْ طَعَامٌ إِلَّا مِن ضَرِيعٍۢ ﴿6﴾

ख़ारदार झाड़ी के सिवा उनके लिए कोई खाना नहीं

لَّا يُسْمِنُ وَلَا يُغْنِى مِن جُوعٍۢ ﴿7﴾

जो मोटाई पैदा करे न भूख में कुछ काम आएगा

وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ نَّاعِمَةٌۭ ﴿8﴾

(और) बहुत से चेहरे उस दिन तरो ताज़ा होंगे

لِّسَعْيِهَا رَاضِيَةٌۭ ﴿9﴾

अपनी कोशिश (के नतीजे) पर शादमान

فِى جَنَّةٍ عَالِيَةٍۢ ﴿10﴾

एक आलीशान बाग़ में

لَّا تَسْمَعُ فِيهَا لَـٰغِيَةًۭ ﴿11﴾

वहाँ कोई लग़ो बात सुनेंगे ही नहीं

فِيهَا عَيْنٌۭ جَارِيَةٌۭ ﴿12﴾

उसमें चश्में जारी होंगें

فِيهَا سُرُرٌۭ مَّرْفُوعَةٌۭ ﴿13﴾

उसमें ऊँचे ऊँचे तख्त बिछे होंगे

وَأَكْوَابٌۭ مَّوْضُوعَةٌۭ ﴿14﴾

और (उनके किनारे) गिलास रखे होंगे

وَنَمَارِقُ مَصْفُوفَةٌۭ ﴿15﴾

और गाँव तकिए क़तार की क़तार लगे होंगे

وَزَرَابِىُّ مَبْثُوثَةٌ ﴿16﴾

और नफ़ीस मसनदे बिछी हुई

أَفَلَا يَنظُرُونَ إِلَى ٱلْإِبِلِ كَيْفَ خُلِقَتْ ﴿17﴾

तो क्या ये लोग ऊँट की तरह ग़ौर नहीं करते कि कैसा अजीब पैदा किया गया है

وَإِلَى ٱلسَّمَآءِ كَيْفَ رُفِعَتْ ﴿18﴾

और आसमान की तरफ कि क्या बुलन्द बनाया गया है

وَإِلَى ٱلْجِبَالِ كَيْفَ نُصِبَتْ ﴿19﴾

और पहाड़ों की तरफ़ कि किस तरह खड़े किए गए हैं

وَإِلَى ٱلْأَرْضِ كَيْفَ سُطِحَتْ ﴿20﴾

और ज़मीन की तरफ कि किस तरह बिछायी गयी है

فَذَكِّرْ إِنَّمَآ أَنتَ مُذَكِّرٌۭ ﴿21﴾

तो तुम नसीहत करते रहो तुम तो बस नसीहत करने वाले हो

لَّسْتَ عَلَيْهِم بِمُصَيْطِرٍ ﴿22﴾

तुम कुछ उन पर दरोग़ा तो हो नहीं

إِلَّا مَن تَوَلَّىٰ وَكَفَرَ ﴿23﴾

हाँ जिसने मुँह फेर लिया

فَيُعَذِّبُهُ ٱللَّهُ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَكْبَرَ ﴿24﴾

और न माना तो ख़ुदा उसको बहुत बड़े अज़ाब की सज़ा देगा

إِنَّ إِلَيْنَآ إِيَابَهُمْ ﴿25﴾

बेशक उनको हमारी तरफ़ लौट कर आना है

ثُمَّ إِنَّ عَلَيْنَا حِسَابَهُم ﴿26﴾

फिर उनका हिसाब हमारे ज़िम्मे है

وَٱلْفَجْرِ ﴿1﴾

सुबह की क़सम

وَلَيَالٍ عَشْرٍۢ ﴿2﴾

और दस रातों की

وَٱلشَّفْعِ وَٱلْوَتْرِ ﴿3﴾

और ज़ुफ्त व ताक़ की

وَٱلَّيْلِ إِذَا يَسْرِ ﴿4﴾

और रात की जब आने लगे

هَلْ فِى ذَٰلِكَ قَسَمٌۭ لِّذِى حِجْرٍ ﴿5﴾

अक्लमन्द के वास्ते तो ज़रूर बड़ी क़सम है (कि कुफ्फ़ार पर ज़रूर अज़ाब होगा)

أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ ﴿6﴾

क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे आद के साथ क्या किया

إِرَمَ ذَاتِ ٱلْعِمَادِ ﴿7﴾

यानि इरम वाले दराज़ क़द

ٱلَّتِى لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِى ٱلْبِلَـٰدِ ﴿8﴾

जिनका मिसल तमाम (दुनिया के) शहरों में कोई पैदा ही नहीं किया गया

وَثَمُودَ ٱلَّذِينَ جَابُوا۟ ٱلصَّخْرَ بِٱلْوَادِ ﴿9﴾

और समूद के साथ (क्या किया) जो वादी (क़रा) में पत्थर तराश कर घर बनाते थे

وَفِرْعَوْنَ ذِى ٱلْأَوْتَادِ ﴿10﴾

और फिरऔन के साथ (क्या किया) जो (सज़ा के लिए) मेख़े रखता था

ٱلَّذِينَ طَغَوْا۟ فِى ٱلْبِلَـٰدِ ﴿11﴾

ये लोग मुख़तलिफ़ शहरों में सरकश हो रहे थे

فَأَكْثَرُوا۟ فِيهَا ٱلْفَسَادَ ﴿12﴾

और उनमें बहुत से फ़साद फैला रखे थे

فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ ﴿13﴾

तो तुम्हारे परवरदिगार ने उन पर अज़ाब का कोड़ा लगाया

إِنَّ رَبَّكَ لَبِٱلْمِرْصَادِ ﴿14﴾

बेशक तुम्हारा परवरदिगार ताक में है

فَأَمَّا ٱلْإِنسَـٰنُ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ رَبُّهُۥ فَأَكْرَمَهُۥ وَنَعَّمَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَكْرَمَنِ ﴿15﴾

लेकिन इन्सान जब उसको उसका परवरदिगार (इस तरह) आज़माता है कि उसको इज्ज़त व नेअमत देता है, तो कहता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे इज्ज़त दी है

وَأَمَّآ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَهَـٰنَنِ ﴿16﴾

मगर जब उसको (इस तरह) आज़माता है कि उस पर रोज़ी को तंग कर देता है बोल उठता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे ज़लील किया

كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ ٱلْيَتِيمَ ﴿17﴾

हरगिज़ नहीं बल्कि तुम लोग न यतीम की ख़ातिरदारी करते हो

وَلَا تَحَـٰٓضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ ﴿18﴾

और न मोहताज को खाना खिलाने की तरग़ीब देते हो

وَتَأْكُلُونَ ٱلتُّرَاثَ أَكْلًۭا لَّمًّۭا ﴿19﴾

और मीरारा के माल (हलाल व हराम) को समेट कर चख जाते हो

وَتُحِبُّونَ ٱلْمَالَ حُبًّۭا جَمًّۭا ﴿20﴾

और माल को बहुत ही अज़ीज़ रखते हो

كَلَّآ إِذَا دُكَّتِ ٱلْأَرْضُ دَكًّۭا دَكًّۭا ﴿21﴾

सुन रखो कि जब ज़मीन कूट कूट कर रेज़ा रेज़ा कर दी जाएगी

وَجَآءَ رَبُّكَ وَٱلْمَلَكُ صَفًّۭا صَفًّۭا ﴿22﴾

और तुम्हारे परवरदिगार का हुक्म और फ़रिश्ते कतार के कतार आ जाएँगे

وَجِا۟ىٓءَ يَوْمَئِذٍۭ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍۢ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَـٰنُ وَأَنَّىٰ لَهُ ٱلذِّكْرَىٰ ﴿23﴾

और उस दिन जहन्नुम सामने कर दी जाएगी उस दिन इन्सान चौंकेगा मगर अब चौंकना कहाँ (फ़ायदा देगा)

يَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى قَدَّمْتُ لِحَيَاتِى ﴿24﴾

(उस वक्त) क़हेगा कि काश मैने अपनी (इस) ज़िन्दगी के वास्ते कुछ पहले भेजा होता

فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُۥٓ أَحَدٌۭ ﴿25﴾

तो उस दिन ख़ुदा ऐसा अज़ाब करेगा कि किसी ने वैसा अज़ाब न किया होगा

وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُۥٓ أَحَدٌۭ ﴿26﴾

और न कोई उसके जकड़ने की तरह जकड़ेगा

يَـٰٓأَيَّتُهَا ٱلنَّفْسُ ٱلْمُطْمَئِنَّةُ ﴿27﴾

(और कुछ लोगों से कहेगा) ऐ इत्मेनान पाने वाली जान

ٱرْجِعِىٓ إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةًۭ مَّرْضِيَّةًۭ ﴿28﴾

अपने परवरदिगार की तरफ़ चल तू उससे ख़ुश वह तुझ से राज़ी

فَٱدْخُلِى فِى عِبَـٰدِى ﴿29﴾

तो मेरे (ख़ास) बन्दों में शामिल हो जा

وَٱدْخُلِى جَنَّتِى ﴿30﴾

और मेरे बेहिश्त में दाख़िल हो जा

لَآ أُقْسِمُ بِهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ ﴿1﴾

मुझे इस शहर (मक्का) की कसम

وَأَنتَ حِلٌّۢ بِهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ ﴿2﴾

और तुम इसी शहर में तो रहते हो

وَوَالِدٍۢ وَمَا وَلَدَ ﴿3﴾

और (तुम्हारे) बाप (आदम) और उसकी औलाद की क़सम

لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ فِى كَبَدٍ ﴿4﴾

हमने इन्सान को मशक्क़त में (रहने वाला) पैदा किया है

أَيَحْسَبُ أَن لَّن يَقْدِرَ عَلَيْهِ أَحَدٌۭ ﴿5﴾

क्या वह ये समझता है कि उस पर कोई काबू न पा सकेगा

يَقُولُ أَهْلَكْتُ مَالًۭا لُّبَدًا ﴿6﴾

वह कहता है कि मैने अलग़ारों माल उड़ा दिया

أَيَحْسَبُ أَن لَّمْ يَرَهُۥٓ أَحَدٌ ﴿7﴾

क्या वह ये ख्याल रखता है कि उसको किसी ने देखा ही नहीं

أَلَمْ نَجْعَل لَّهُۥ عَيْنَيْنِ ﴿8﴾

क्या हमने उसे दोनों ऑंखें और ज़बान

وَلِسَانًۭا وَشَفَتَيْنِ ﴿9﴾

और दोनों लब नहीं दिए (ज़रूर दिए)

وَهَدَيْنَـٰهُ ٱلنَّجْدَيْنِ ﴿10﴾

और उसको (अच्छी बुरी) दोनों राहें भी दिखा दीं

فَلَا ٱقْتَحَمَ ٱلْعَقَبَةَ ﴿11﴾

फिर वह घाटी पर से होकर (क्यों) नहीं गुज़रा

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْعَقَبَةُ ﴿12﴾

और तुमको क्या मालूम कि घाटी क्या है

فَكُّ رَقَبَةٍ ﴿13﴾

किसी (की) गर्दन का (गुलामी या कर्ज से) छुड़ाना

أَوْ إِطْعَـٰمٌۭ فِى يَوْمٍۢ ذِى مَسْغَبَةٍۢ ﴿14﴾

या भूख के दिन रिश्तेदार यतीम या ख़ाकसार

يَتِيمًۭا ذَا مَقْرَبَةٍ ﴿15﴾

मोहताज को

أَوْ مِسْكِينًۭا ذَا مَتْرَبَةٍۢ ﴿16﴾

खाना खिलाना

ثُمَّ كَانَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْمَرْحَمَةِ ﴿17﴾

फिर तो उन लोगों में (शामिल) हो जाता जो ईमान लाए और सब्र की नसीहत और तरस खाने की वसीयत करते रहे

أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ ﴿18﴾

यही लोग ख़ुश नसीब हैं

وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا هُمْ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ ﴿19﴾

और जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया है यही लोग बदबख्त हैं

عَلَيْهِمْ نَارٌۭ مُّؤْصَدَةٌۢ ﴿20﴾

कि उनको आग में डाल कर हर तरफ से बन्द कर दिया जाएगा

وَٱلشَّمْسِ وَضُحَىٰهَا ﴿1﴾

सूरज की क़सम और उसकी रौशनी की

وَٱلْقَمَرِ إِذَا تَلَىٰهَا ﴿2﴾

और चाँद की जब उसके पीछे निकले

وَٱلنَّهَارِ إِذَا جَلَّىٰهَا ﴿3﴾

और दिन की जब उसे चमका दे

وَٱلَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰهَا ﴿4﴾

और रात की जब उसे ढाँक ले

وَٱلسَّمَآءِ وَمَا بَنَىٰهَا ﴿5﴾

और आसमान की और जिसने उसे बनाया

وَٱلْأَرْضِ وَمَا طَحَىٰهَا ﴿6﴾

और ज़मीन की जिसने उसे बिछाया

وَنَفْسٍۢ وَمَا سَوَّىٰهَا ﴿7﴾

और जान की और जिसने उसे दुरूस्त किया

فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَىٰهَا ﴿8﴾

फिर उसकी बदकारी और परहेज़गारी को उसे समझा दिया

قَدْ أَفْلَحَ مَن زَكَّىٰهَا ﴿9﴾

(क़सम है) जिसने उस (जान) को (गनाह से) पाक रखा वह तो कामयाब हुआ

وَقَدْ خَابَ مَن دَسَّىٰهَا ﴿10﴾

और जिसने उसे (गुनाह करके) दबा दिया वह नामुराद रहा

كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِطَغْوَىٰهَآ ﴿11﴾

क़ौम मसूद ने अपनी सरकशी से (सालेह पैग़म्बर को) झुठलाया,

إِذِ ٱنۢبَعَثَ أَشْقَىٰهَا ﴿12﴾

जब उनमें का एक बड़ा बदबख्त उठ खड़ा हुआ

فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ ٱللَّهِ نَاقَةَ ٱللَّهِ وَسُقْيَـٰهَا ﴿13﴾

तो ख़ुदा के रसूल (सालेह) ने उनसे कहा कि ख़ुदा की ऊँटनी और उसके पानी पीने से तअर्रुज़ न करना

فَكَذَّبُوهُ فَعَقَرُوهَا فَدَمْدَمَ عَلَيْهِمْ رَبُّهُم بِذَنۢبِهِمْ فَسَوَّىٰهَا ﴿14﴾

मगर उन लोगों पैग़म्बर को झुठलाया और उसकी कूँचे काट डाली तो ख़ुदा ने उनके गुनाहों सबब से उन पर अज़ाब नाज़िल किया फिर (हलाक करके) बराबर कर दिया

وَلَا يَخَافُ عُقْبَـٰهَا ﴿15﴾

और उसको उनके बदले का कोई ख़ौफ तो है नहीं

وَٱلَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰ ﴿1﴾

रात की क़सम जब (सूरज को) छिपा ले

وَٱلنَّهَارِ إِذَا تَجَلَّىٰ ﴿2﴾

और दिन की क़सम जब ख़ूब रौशन हो

وَمَا خَلَقَ ٱلذَّكَرَ وَٱلْأُنثَىٰٓ ﴿3﴾

और उस (ज़ात) की जिसने नर व मादा को पैदा किया

إِنَّ سَعْيَكُمْ لَشَتَّىٰ ﴿4﴾

कि बेशक तुम्हारी कोशिश तरह तरह की है

فَأَمَّا مَنْ أَعْطَىٰ وَٱتَّقَىٰ ﴿5﴾

तो जिसने सख़ावत की और अच्छी बात (इस्लाम) की तस्दीक़ की

وَصَدَّقَ بِٱلْحُسْنَىٰ ﴿6﴾

तो हम उसके लिए राहत व आसानी

فَسَنُيَسِّرُهُۥ لِلْيُسْرَىٰ ﴿7﴾

(जन्नत) के असबाब मुहय्या कर देंगे

وَأَمَّا مَنۢ بَخِلَ وَٱسْتَغْنَىٰ ﴿8﴾

और जिसने बुख्ल किया, और बेपरवाई की

وَكَذَّبَ بِٱلْحُسْنَىٰ ﴿9﴾

और अच्छी बात को झुठलाया

فَسَنُيَسِّرُهُۥ لِلْعُسْرَىٰ ﴿10﴾

तो हम उसे सख्ती (जहन्नुम) में पहुँचा देंगे,

وَمَا يُغْنِى عَنْهُ مَالُهُۥٓ إِذَا تَرَدَّىٰٓ ﴿11﴾

और जब वह हलाक होगा तो उसका माल उसके कुछ भी काम न आएगा

إِنَّ عَلَيْنَا لَلْهُدَىٰ ﴿12﴾

हमें राह दिखा देना ज़रूर है

وَإِنَّ لَنَا لَلْـَٔاخِرَةَ وَٱلْأُولَىٰ ﴿13﴾

और आख़ेरत और दुनिया (दोनों) ख़ास हमारी चीज़े हैं

فَأَنذَرْتُكُمْ نَارًۭا تَلَظَّىٰ ﴿14﴾

तो हमने तुम्हें भड़कती हुई आग से डरा दिया

لَا يَصْلَىٰهَآ إِلَّا ٱلْأَشْقَى ﴿15﴾

उसमें बस वही दाख़िल होगा जो बड़ा बदबख्त है

ٱلَّذِى كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ ﴿16﴾

जिसने झुठलाया और मुँह फेर लिया और जो बड़ा परहेज़गार है

وَسَيُجَنَّبُهَا ٱلْأَتْقَى ﴿17﴾

वह उससे बचा लिया जाएगा

ٱلَّذِى يُؤْتِى مَالَهُۥ يَتَزَكَّىٰ ﴿18﴾

जो अपना माल (ख़ुदा की राह) में देता है ताकि पाक हो जाए

وَمَا لِأَحَدٍ عِندَهُۥ مِن نِّعْمَةٍۢ تُجْزَىٰٓ ﴿19﴾

और लुत्फ ये है कि किसी का उस पर कोई एहसान नहीं जिसका उसे बदला दिया जाता है

إِلَّا ٱبْتِغَآءَ وَجْهِ رَبِّهِ ٱلْأَعْلَىٰ ﴿20﴾

बल्कि (वह तो) सिर्फ अपने आलीशान परवरदिगार की ख़ुशनूदी हासिल करने के लिए (देता है)

وَلَسَوْفَ يَرْضَىٰ ﴿21﴾

और वह अनक़रीब भी ख़ुश हो जाएगा

وَٱلضُّحَىٰ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) पहर दिन चढ़े की क़सम

وَٱلَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ ﴿2﴾

और रात की जब (चीज़ों को) छुपा ले

مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ ﴿3﴾

कि तुम्हारा परवरदिगार न तुमको छोड़ बैठा और (न तुमसे) नाराज़ हुआ

وَلَلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ لَّكَ مِنَ ٱلْأُولَىٰ ﴿4﴾

और तुम्हारे वास्ते आख़ेरत दुनिया से यक़ीनी कहीं बेहतर है

وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰٓ ﴿5﴾

और तुम्हारा परवरदिगार अनक़रीब इस क़दर अता करेगा कि तुम ख़ुश हो जाओ

أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًۭا فَـَٔاوَىٰ ﴿6﴾

क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर (अबू तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी)

وَوَجَدَكَ ضَآلًّۭا فَهَدَىٰ ﴿7﴾

और तुमको एहकाम से नावाकिफ़ देखा तो मंज़िले मक़सूद तक पहुँचा दिया

وَوَجَدَكَ عَآئِلًۭا فَأَغْنَىٰ ﴿8﴾

और तुमको तंगदस्त देखकर ग़नी कर दिया

فَأَمَّا ٱلْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ ﴿9﴾

तो तुम भी यतीम पर सितम न करना

وَأَمَّا ٱلسَّآئِلَ فَلَا تَنْهَرْ ﴿10﴾

माँगने वाले को झिड़की न देना

وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ ﴿11﴾

और अपने परवरदिगार की नेअमतों का ज़िक्र करते रहना

أَلَمْ نَشْرَحْ لَكَ صَدْرَكَ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) क्या हमने तुम्हारा सीना इल्म से कुशादा नहीं कर दिया (जरूर किया)

وَوَضَعْنَا عَنكَ وِزْرَكَ ﴿2﴾

और तुम पर से वह बोझ उतार दिया

ٱلَّذِىٓ أَنقَضَ ظَهْرَكَ ﴿3﴾

जिसने तुम्हारी कमर तोड़ रखी थी

وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ ﴿4﴾

और तुम्हारा ज़िक्र भी बुलन्द कर दिया

فَإِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًا ﴿5﴾

तो (हाँ) पस बेशक दुशवारी के साथ ही आसानी है

إِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًۭا ﴿6﴾

यक़ीनन दुश्वारी के साथ आसानी है

فَإِذَا فَرَغْتَ فَٱنصَبْ ﴿7﴾

तो जब तुम फारिग़ हो जाओ तो मुक़र्रर कर दो

وَإِلَىٰ رَبِّكَ فَٱرْغَب ﴿8﴾

और फिर अपने परवरदिगार की तरफ रग़बत करो

وَٱلتِّينِ وَٱلزَّيْتُونِ ﴿1﴾

इन्जीर और ज़ैतून की क़सम

وَطُورِ سِينِينَ ﴿2﴾

और तूर सीनीन की

وَهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ ٱلْأَمِينِ ﴿3﴾

और उस अमन वाले शहर (मक्का) की

لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ فِىٓ أَحْسَنِ تَقْوِيمٍۢ ﴿4﴾

कि हमने इन्सान बहुत अच्छे कैड़े का पैदा किया

ثُمَّ رَدَدْنَـٰهُ أَسْفَلَ سَـٰفِلِينَ ﴿5﴾

फिर हमने उसे (बूढ़ा करके रफ्ता रफ्ता) पस्त से पस्त हालत की तरफ फेर दिया

إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَلَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍۢ ﴿6﴾

मगर जो लोग ईमान लाए और अच्छे (अच्छे) काम करते रहे उनके लिए तो बे इन्तेहा अज्र व सवाब है

فَمَا يُكَذِّبُكَ بَعْدُ بِٱلدِّينِ ﴿7﴾

तो (ऐ रसूल) इन दलीलों के बाद तुमको (रोज़े) जज़ा के बारे में कौन झुठला सकता है

أَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَحْكَمِ ٱلْحَـٰكِمِينَ ﴿8﴾

क्या ख़ुदा सबसे बड़ा हाकिम नहीं है (हाँ ज़रूर है)

ٱقْرَأْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلَّذِى خَلَقَ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) अपने परवरदिगार का नाम लेकर पढ़ो जिसने हर (चीज़ को) पैदा किया

خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ مِنْ عَلَقٍ ﴿2﴾

उस ने इन्सान को जमे हुए ख़ून से पैदा किया पढ़ो

ٱقْرَأْ وَرَبُّكَ ٱلْأَكْرَمُ ﴿3﴾

और तुम्हारा परवरदिगार बड़ा क़रीम है

ٱلَّذِى عَلَّمَ بِٱلْقَلَمِ ﴿4﴾

जिसने क़लम के ज़रिए तालीम दी

عَلَّمَ ٱلْإِنسَـٰنَ مَا لَمْ يَعْلَمْ ﴿5﴾

उसीने इन्सान को वह बातें बतायीं जिनको वह कुछ जानता ही न था

كَلَّآ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لَيَطْغَىٰٓ ﴿6﴾

सुन रखो बेशक इन्सान जो अपने को ग़नी देखता है

أَن رَّءَاهُ ٱسْتَغْنَىٰٓ ﴿7﴾

तो सरकश हो जाता है

إِنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ ٱلرُّجْعَىٰٓ ﴿8﴾

बेशक तुम्हारे परवरदिगार की तरफ (सबको) पलटना है

أَرَءَيْتَ ٱلَّذِى يَنْهَىٰ ﴿9﴾

भला तुमने उस शख़्श को भी देखा

عَبْدًا إِذَا صَلَّىٰٓ ﴿10﴾

जो एक बन्दे को जब वह नमाज़ पढ़ता है तो वह रोकता है

أَرَءَيْتَ إِن كَانَ عَلَى ٱلْهُدَىٰٓ ﴿11﴾

भला देखो तो कि अगर ये राहे रास्त पर हो या परहेज़गारी का हुक्म करे

أَوْ أَمَرَ بِٱلتَّقْوَىٰٓ ﴿12﴾

(तो रोकना कैसा)

أَرَءَيْتَ إِن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰٓ ﴿13﴾

भला देखो तो कि अगर उसने (सच्चे को) झुठला दिया और (उसने) मुँह फेरा

أَلَمْ يَعْلَم بِأَنَّ ٱللَّهَ يَرَىٰ ﴿14﴾

(तो नतीजा क्या होगा) क्या उसको ये मालूम नहीं कि ख़ुदा यक़ीनन देख रहा है

كَلَّا لَئِن لَّمْ يَنتَهِ لَنَسْفَعًۢا بِٱلنَّاصِيَةِ ﴿15﴾

देखो अगर वह बाज़ न आएगा तो हम परेशानी के पट्टे पकड़ के घसीटेंगे

نَاصِيَةٍۢ كَـٰذِبَةٍ خَاطِئَةٍۢ ﴿16﴾

झूठे ख़तावार की पेशानी के पट्टे

فَلْيَدْعُ نَادِيَهُۥ ﴿17﴾

तो वह अपने याराने जलसा को बुलाए हम भी जल्लाद फ़रिश्ते को बुलाएँगे

سَنَدْعُ ٱلزَّبَانِيَةَ ﴿18﴾

(ऐ रसूल) देखो हरगिज़ उनका कहना न मानना

كَلَّا لَا تُطِعْهُ وَٱسْجُدْ وَٱقْتَرِب ۩ ﴿19﴾

और सजदे करते रहो और कुर्ब हासिल करो (19) (सजदा)

إِنَّآ أَنزَلْنَـٰهُ فِى لَيْلَةِ ٱلْقَدْرِ ﴿1﴾

हमने (इस कुरान) को शबे क़द्र में नाज़िल (करना शुरू) किया

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا لَيْلَةُ ٱلْقَدْرِ ﴿2﴾

और तुमको क्या मालूम शबे क़द्र क्या है

لَيْلَةُ ٱلْقَدْرِ خَيْرٌۭ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍۢ ﴿3﴾

शबे क़द्र (मरतबा और अमल में) हज़ार महीनो से बेहतर है

تَنَزَّلُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِم مِّن كُلِّ أَمْرٍۢ ﴿4﴾

इस (रात) में फ़रिश्ते और जिबरील (साल भर की) हर बात का हुक्म लेकर अपने परवरदिगार के हुक्म से नाज़िल होते हैं

سَلَـٰمٌ هِىَ حَتَّىٰ مَطْلَعِ ٱلْفَجْرِ ﴿5﴾

ये रात सुबह के तुलूअ होने तक (अज़सरतापा) सलामती है

لَمْ يَكُنِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ وَٱلْمُشْرِكِينَ مُنفَكِّينَ حَتَّىٰ تَأْتِيَهُمُ ٱلْبَيِّنَةُ ﴿1﴾

अहले किताब और मुशरिकों से जो लोग काफिर थे जब तक कि उनके पास खुली हुई दलीलें न पहुँचे वह (अपने कुफ्र से) बाज़ आने वाले न थे

رَسُولٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ يَتْلُوا۟ صُحُفًۭا مُّطَهَّرَةًۭ ﴿2﴾

(यानि) ख़ुदा के रसूल जो पाक औराक़ पढ़ते हैं (आए और)

فِيهَا كُتُبٌۭ قَيِّمَةٌۭ ﴿3﴾

उनमें (जो) पुरज़ोर और दरूस्त बातें लिखी हुई हैं (सुनाये)

وَمَا تَفَرَّقَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ إِلَّا مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَةُ ﴿4﴾

अहले किताब मुताफ़र्रिक़ हुए भी तो जब उनके पास खुली हुई दलील आ चुकी

وَمَآ أُمِرُوٓا۟ إِلَّا لِيَعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ حُنَفَآءَ وَيُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤْتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ۚ وَذَٰلِكَ دِينُ ٱلْقَيِّمَةِ ﴿5﴾

(तब) और उन्हें तो बस ये हुक्म दिया गया था कि निरा ख़ुरा उसी का एतक़ाद रख के बातिल से कतरा के ख़ुदा की इबादत करे और पाबन्दी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्चा दीन है

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ وَٱلْمُشْرِكِينَ فِى نَارِ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمْ شَرُّ ٱلْبَرِيَّةِ ﴿6﴾

बेशक अहले किताब और मुशरेकीन से जो लोग (अब तक) काफ़िर हैं वह दोज़ख़ की आग में (होंगे) हमेशा उसी में रहेंगे यही लोग बदतरीन ख़लाएक़ हैं

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمْ خَيْرُ ٱلْبَرِيَّةِ ﴿7﴾

बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे यही लोग बेहतरीन ख़लाएक़ हैं

جَزَآؤُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ جَنَّـٰتُ عَدْنٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۖ رَّضِىَ ٱللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا۟ عَنْهُ ۚ ذَٰلِكَ لِمَنْ خَشِىَ رَبَّهُۥ ﴿8﴾

उनकी जज़ा उनके परवरदिगार के यहाँ हमेशा रहने (सहने) के बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह आबादुल आबाद हमेशा उसी में रहेंगे ख़ुदा उनसे राज़ी और वह ख़ुदा से ख़ुश ये (जज़ा) ख़ास उस शख़्श की है जो अपने परवरदिगार से डरे

إِذَا زُلْزِلَتِ ٱلْأَرْضُ زِلْزَالَهَا ﴿1﴾

जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ ज़लज़ले में आ जाएगी

وَأَخْرَجَتِ ٱلْأَرْضُ أَثْقَالَهَا ﴿2﴾

और ज़मीन अपने अन्दर के बोझे (मादनयात मुर्दे वग़ैरह) निकाल डालेगी

وَقَالَ ٱلْإِنسَـٰنُ مَا لَهَا ﴿3﴾

और एक इन्सान कहेगा कि उसको क्या हो गया है

يَوْمَئِذٍۢ تُحَدِّثُ أَخْبَارَهَا ﴿4﴾

उस रोज़ वह अपने सब हालात बयान कर देगी

بِأَنَّ رَبَّكَ أَوْحَىٰ لَهَا ﴿5﴾

क्योंकि तुम्हारे परवरदिगार ने उसको हुक्म दिया होगा

يَوْمَئِذٍۢ يَصْدُرُ ٱلنَّاسُ أَشْتَاتًۭا لِّيُرَوْا۟ أَعْمَـٰلَهُمْ ﴿6﴾

उस दिन लोग गिरोह गिरोह (अपनी कब्रों से) निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देखे

فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًۭا يَرَهُۥ ﴿7﴾

तो जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर नेकी की वह उसे देख लेगा

وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍۢ شَرًّۭا يَرَهُۥ ﴿8﴾

और जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर बदी की है तो उसे देख लेगा

وَٱلْعَـٰدِيَـٰتِ ضَبْحًۭا ﴿1﴾

(ग़ाज़ियों के) सरपट दौड़ने वाले घोड़ो की क़सम

فَٱلْمُورِيَـٰتِ قَدْحًۭا ﴿2﴾

जो नथनों से फ़रराटे लेते हैं

فَٱلْمُغِيرَٰتِ صُبْحًۭا ﴿3﴾

फिर पत्थर पर टाप मारकर चिंगारियाँ निकालते हैं फिर सुबह को छापा मारते हैं

فَأَثَرْنَ بِهِۦ نَقْعًۭا ﴿4﴾

(तो दौड़ धूप से) बुलन्द कर देते हैं

فَوَسَطْنَ بِهِۦ جَمْعًا ﴿5﴾

फिर उस वक्त (दुश्मन के) दिल में घुस जाते हैं

إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لِرَبِّهِۦ لَكَنُودٌۭ ﴿6﴾

(ग़रज़ क़सम है) कि बेशक इन्सान अपने परवरदिगार का नाशुक्रा है

وَإِنَّهُۥ عَلَىٰ ذَٰلِكَ لَشَهِيدٌۭ ﴿7﴾

और यक़ीनी ख़ुदा भी उससे वाक़िफ़ है

وَإِنَّهُۥ لِحُبِّ ٱلْخَيْرِ لَشَدِيدٌ ﴿8﴾

और बेशक वह माल का सख्त हरीस है

۞ أَفَلَا يَعْلَمُ إِذَا بُعْثِرَ مَا فِى ٱلْقُبُورِ ﴿9﴾

तो क्या वह ये नहीं जानता कि जब मुर्दे क़ब्रों से निकाले जाएँगे

وَحُصِّلَ مَا فِى ٱلصُّدُورِ ﴿10﴾

और दिलों के भेद ज़ाहिर कर दिए जाएँगे

إِنَّ رَبَّهُم بِهِمْ يَوْمَئِذٍۢ لَّخَبِيرٌۢ ﴿11﴾

बेशक उस दिन उनका परवरदिगार उनसे ख़ूब वाक़िफ़ होगा

ٱلْقَارِعَةُ ﴿1﴾

खड़खड़ाने वाली

مَا ٱلْقَارِعَةُ ﴿2﴾

वह खड़खड़ाने वाली क्या है

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْقَارِعَةُ ﴿3﴾

और तुम को क्या मालूम कि वह खड़खड़ाने वाली क्या है

يَوْمَ يَكُونُ ٱلنَّاسُ كَٱلْفَرَاشِ ٱلْمَبْثُوثِ ﴿4﴾

जिस दिन लोग (मैदाने हश्र में) टिड्डियों की तरह फैले होंगे

وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ ٱلْمَنفُوشِ ﴿5﴾

और पहाड़ धुनकी हुई रूई के से हो जाएँगे

فَأَمَّا مَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ ﴿6﴾

तो जिसके (नेक आमाल) के पल्ले भारी होंगे

فَهُوَ فِى عِيشَةٍۢ رَّاضِيَةٍۢ ﴿7﴾

वह मन भाते ऐश में होंगे

وَأَمَّا مَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ ﴿8﴾

और जिनके आमाल के पल्ले हल्के होंगे

فَأُمُّهُۥ هَاوِيَةٌۭ ﴿9﴾

तो उनका ठिकाना न रहा

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا هِيَهْ ﴿10﴾

और तुमको क्या मालूम हाविया क्या है

نَارٌ حَامِيَةٌۢ ﴿11﴾

वह दहकती हुई आग है

أَلْهَىٰكُمُ ٱلتَّكَاثُرُ ﴿1﴾

कुल व माल की बहुतायत ने तुम लोगों को ग़ाफ़िल रखा

حَتَّىٰ زُرْتُمُ ٱلْمَقَابِرَ ﴿2﴾

यहाँ तक कि तुम लोगों ने कब्रें देखी (मर गए)

كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَ ﴿3﴾

देखो तुमको अनक़रीब ही मालुम हो जाएगा

ثُمَّ كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَ ﴿4﴾

फिर देखो तुम्हें अनक़रीब ही मालूम हो जाएगा

كَلَّا لَوْ تَعْلَمُونَ عِلْمَ ٱلْيَقِينِ ﴿5﴾

देखो अगर तुमको यक़ीनी तौर पर मालूम होता (तो हरगिज़ ग़ाफिल न होते)

لَتَرَوُنَّ ٱلْجَحِيمَ ﴿6﴾

तुम लोग ज़रूर दोज़ख़ को देखोगे

ثُمَّ لَتَرَوُنَّهَا عَيْنَ ٱلْيَقِينِ ﴿7﴾

फिर तुम लोग यक़ीनी देखना देखोगे

ثُمَّ لَتُسْـَٔلُنَّ يَوْمَئِذٍ عَنِ ٱلنَّعِيمِ ﴿8﴾

फिर तुमसे नेअमतों के बारें ज़रूर बाज़ पुर्स की जाएगी

وَٱلْعَصْرِ ﴿1﴾

नमाज़े अस्र की क़सम

إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لَفِى خُسْرٍ ﴿2﴾

बेशक इन्सान घाटे में है

إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْحَقِّ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ ﴿3﴾

मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे

وَيْلٌۭ لِّكُلِّ هُمَزَةٍۢ لُّمَزَةٍ ﴿1﴾

हर ताना देने वाले चुग़लख़ोर की ख़राबी है

ٱلَّذِى جَمَعَ مَالًۭا وَعَدَّدَهُۥ ﴿2﴾

जो माल को जमा करता है और गिन गिन कर रखता है

يَحْسَبُ أَنَّ مَالَهُۥٓ أَخْلَدَهُۥ ﴿3﴾

वह समझता है कि उसका माल उसे हमेशा ज़िन्दा बाक़ी रखेगा

كَلَّا ۖ لَيُنۢبَذَنَّ فِى ٱلْحُطَمَةِ ﴿4﴾

हरगिज़ नहीं वह तो ज़रूर हुतमा में डाला जाएगा

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْحُطَمَةُ ﴿5﴾

और तुमको क्या मालूम हतमा क्या है

نَارُ ٱللَّهِ ٱلْمُوقَدَةُ ﴿6﴾

वह ख़ुदा की भड़काई हुई आग है जो (तलवे से लगी तो) दिलों तक चढ़ जाएगी

ٱلَّتِى تَطَّلِعُ عَلَى ٱلْأَفْـِٔدَةِ ﴿7﴾

ये लोग आग के लम्बे सुतूनो

إِنَّهَا عَلَيْهِم مُّؤْصَدَةٌۭ ﴿8﴾

में डाल कर बन्द कर दिए

فِى عَمَدٍۢ مُّمَدَّدَةٍۭ ﴿9﴾

जाएँगे

أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِأَصْحَـٰبِ ٱلْفِيلِ ﴿1﴾

ऐ रसूल क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे परवरदिगार ने हाथी वालों के साथ क्या किया

أَلَمْ يَجْعَلْ كَيْدَهُمْ فِى تَضْلِيلٍۢ ﴿2﴾

क्या उसने उनकी तमाम तद्बीरें ग़लत नहीं कर दीं (ज़रूर)

وَأَرْسَلَ عَلَيْهِمْ طَيْرًا أَبَابِيلَ ﴿3﴾

और उन पर झुन्ड की झुन्ड चिड़ियाँ भेज दीं

تَرْمِيهِم بِحِجَارَةٍۢ مِّن سِجِّيلٍۢ ﴿4﴾

जो उन पर खरन्जों की कंकरियाँ फेकती थीं

فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍۢ مَّأْكُولٍۭ ﴿5﴾

तो उन्हें चबाए हुए भूस की (तबाह) कर दिया

لِإِيلَـٰفِ قُرَيْشٍ ﴿1﴾

चूँकि क़ुरैश को जाड़े और गर्मी के सफ़र से मानूस कर दिया है

إِۦلَـٰفِهِمْ رِحْلَةَ ٱلشِّتَآءِ وَٱلصَّيْفِ ﴿2﴾

तो उनको मानूस कर देने की वजह से

فَلْيَعْبُدُوا۟ رَبَّ هَـٰذَا ٱلْبَيْتِ ﴿3﴾

इस घर (काबा) के मालिक की इबादत करनी चाहिए

ٱلَّذِىٓ أَطْعَمَهُم مِّن جُوعٍۢ وَءَامَنَهُم مِّنْ خَوْفٍۭ ﴿4﴾

जिसने उनको भूख में खाना दिया और उनको खौफ़ से अमन अता किया

أَرَءَيْتَ ٱلَّذِى يُكَذِّبُ بِٱلدِّينِ ﴿1﴾

क्या तुमने उस शख़्श को भी देखा है जो रोज़ जज़ा को झुठलाता है

فَذَٰلِكَ ٱلَّذِى يَدُعُّ ٱلْيَتِيمَ ﴿2﴾

ये तो वही (कम्बख्त) है जो यतीम को धक्के देता है

وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ ﴿3﴾

और मोहताजों को खिलाने के लिए (लोगों को) आमादा नहीं करता

فَوَيْلٌۭ لِّلْمُصَلِّينَ ﴿4﴾

तो उन नमाज़ियों की तबाही है

ٱلَّذِينَ هُمْ عَن صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ ﴿5﴾

जो अपनी नमाज़ से ग़ाफिल रहते हैं

ٱلَّذِينَ هُمْ يُرَآءُونَ ﴿6﴾

जो दिखाने के वास्ते करते हैं

وَيَمْنَعُونَ ٱلْمَاعُونَ ﴿7﴾

और रोज़मर्रा की मालूली चीज़ें भी आरियत नहीं देते

إِنَّآ أَعْطَيْنَـٰكَ ٱلْكَوْثَرَ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) हमनें तुमको को कौसर अता किया,

فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَٱنْحَرْ ﴿2﴾

तो तुम अपने परवरदिगार की नमाज़ पढ़ा करो

إِنَّ شَانِئَكَ هُوَ ٱلْأَبْتَرُ ﴿3﴾

और क़ुर्बानी दिया करो बेशक तुम्हारा दुश्मन बे औलाद रहेगा

قُلْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْكَـٰفِرُونَ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ काफिरों

لَآ أَعْبُدُ مَا تَعْبُدُونَ ﴿2﴾

तुम जिन चीज़ों को पूजते हो, मैं उनको नहीं पूजता

وَلَآ أَنتُمْ عَـٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ ﴿3﴾

और जिस (ख़ुदा) की मैं इबादत करता हूँ उसकी तुम इबादत नहीं करते

وَلَآ أَنَا۠ عَابِدٌۭ مَّا عَبَدتُّمْ ﴿4﴾

और जिन्हें तुम पूजते हो मैं उनका पूजने वाला नहीं

وَلَآ أَنتُمْ عَـٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ ﴿5﴾

और जिसकी मैं इबादत करता हूँ उसकी तुम इबादत करने वाले नहीं

لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِىَ دِينِ ﴿6﴾

तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन

إِذَا جَآءَ نَصْرُ ٱللَّهِ وَٱلْفَتْحُ ﴿1﴾

ऐ रसूल जब ख़ुदा की मदद आ पहँचेगी

وَرَأَيْتَ ٱلنَّاسَ يَدْخُلُونَ فِى دِينِ ٱللَّهِ أَفْوَاجًۭا ﴿2﴾

और फतेह (मक्का) हो जाएगी और तुम लोगों को देखोगे कि गोल के गोल ख़ुदा के दीन में दाख़िल हो रहे हैं

فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَٱسْتَغْفِرْهُ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ تَوَّابًۢا ﴿3﴾

तो तुम अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तसबीह करना और उसी से मग़फेरत की दुआ माँगना वह बेशक बड़ा माफ़ करने वाला है

تَبَّتْ يَدَآ أَبِى لَهَبٍۢ وَتَبَّ ﴿1﴾

अबु लहब के हाथ टूट जाएँ और वह ख़ुद सत्यानास हो जाए

مَآ أَغْنَىٰ عَنْهُ مَالُهُۥ وَمَا كَسَبَ ﴿2﴾

(आख़िर) न उसका माल ही उसके हाथ आया और (न) उसने कमाया

سَيَصْلَىٰ نَارًۭا ذَاتَ لَهَبٍۢ ﴿3﴾

वह बहुत भड़कती हुई आग में दाख़िल होगा

وَٱمْرَأَتُهُۥ حَمَّالَةَ ٱلْحَطَبِ ﴿4﴾

और उसकी जोरू भी जो सर पर ईंधन उठाए फिरती है

فِى جِيدِهَا حَبْلٌۭ مِّن مَّسَدٍۭ ﴿5﴾

और उसके गले में बटी हुई रस्सी बँधी है

قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा एक है

ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ ﴿2﴾

ख़ुदा बरहक़ बेनियाज़ है

لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ﴿3﴾

न उसने किसी को जना न उसको किसी ने जना,

وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدٌۢ ﴿4﴾

और उसका कोई हमसर नहीं

قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक की

مِن شَرِّ مَا خَلَقَ ﴿2﴾

हर चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की पनाह माँगता हूँ

وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ ﴿3﴾

और अंधेरीरात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा जाए

وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّـٰثَـٰتِ فِى ٱلْعُقَدِ ﴿4﴾

और गन्डों पर फूँकने वालियों की बुराई से

وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ ﴿5﴾

(जब फूँके) और हसद करने वाले की बुराई से

قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ ﴿1﴾

(ऐ रसूल) तुम कह दो मैं लोगों के परवरदिगार

مَلِكِ ٱلنَّاسِ ﴿2﴾

लोगों के बादशाह

إِلَـٰهِ ٱلنَّاسِ ﴿3﴾

लोगों के माबूद की (शैतानी)

مِن شَرِّ ٱلْوَسْوَاسِ ٱلْخَنَّاسِ ﴿4﴾

वसवसे की बुराई से पनाह माँगता हूँ

ٱلَّذِى يُوَسْوِسُ فِى صُدُورِ ٱلنَّاسِ ﴿5﴾

जो (ख़ुदा के नाम से) पीछे हट जाता है जो लोगों के दिलों में वसवसे डाला करता है

مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ ﴿6﴾

जिन्नात में से ख्वाह आदमियों में से

بسم الله الرحمن الرحيم गुरु 4 रबी अल-सानी
الخميس 4 ربيع الآخر
هلال متزايد बढ़ता हुआ अर्धचंद्र दिन 5.5 / 29.5
रोशनी 30%
9 दिनों में पूर्णिमा
لا إله إلا الله अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं