होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > इस्लाम और धर्म की स्वतंत्रता
क़ुरआन ऐलान करता है : "धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं।" (क़ुरआन 2:256) और ईमान लाने या न लाने की पूरी आज़ादी ठहराता है, आख़िरत के अंजाम के साथ। यह आयत क्या माँगती है, और बहसें क्या छोड़ देती हैं।
"धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। निःसंदेह सन्मार्ग, पथभ्रष्टता से स्पष्ट हो चुका है।" (क़ुरआन 2:256)। क़ुरआन किसी को ईमान पर या अपने ऐतक़ाद के इनकार पर ज़बरदस्ती करने को खुले आम रोकता है, और एहले-किताब से "सबसे उत्तम" तरीक़े से वाद-विवाद करने को कहता है (क़ुरआन 29:46)। जो एक चीज़ इस्लाम ज़मानत नहीं देता, वह आख़िरत में सज़ा से बचाव है : हर इख़्तियार की ज़िम्मेदारी अल्लाह के सामने क़ायम रहती है।
लेकिन ज़मीन पर ऐतक़ाद की आज़ादी पूरी है, क़ुरआन और पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) की अमली राह से हिफ़ाज़त-याफ़्ता।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समय"धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। निःसंदेह सन्मार्ग, पथभ्रष्टता से स्पष्ट हो चुका है।" (क़ुरआन 2:256, 18:29)। यह आयत मदीने में नाज़िल हुई, उस दौर में जब मुसलमान क़ूवत की हालत में थे : कुछ लोग इस्लाम में ज़बरदस्ती लाना चाहते थे, और क़ुरआन ने उन्हें इससे खुले आम रोक दिया।
ईमान लाने की आज़ादी इलाही हक़ है : अल्लाह के ख़ुद ने इंसान को इख़्तियार दिया, और वह कहता है "और यदि आपका पालनहार चाहता, तो निश्चय धरती में रहने वाले सभी लोग ईमान ले आते। तो क्या आप लोगों को बाध्य करेंगे कि वे मोमिन बन जाएँॽ" (क़ुरआन 10:99)। क़ुरआन का जवाब है नहीं : इंसान को इख़्तियार है, और वह उसका जवाबदेह है।
इस्लाम में धर्म की आज़ादी तीन मामलों को छूती है। पहला : कोई ईमान पर या उसके इनकार पर ज़बरदस्ती नहीं कर सकता : न रियासत, न ख़ानदान, न बिरादरी। दूसरा : ग़ैर-मुसलमानों को अपनी इबादत अदा करने का हक़ है, रियासत की हिफ़ाज़त में (क़ुरआन 22:40 : गिरजों और यहूदी पूजा स्थलों की हिफ़ाज़त जायज़ जिहाद का मक़सद है)।
तीसरा : वाद-विवाद "सबसे उत्तम" तरीक़े से होता है (क़ुरआन 29:46), सब ग़ैर-लड़ाकों के साथ इनसाफ़ और अच्छे बर्ताव के साथ (क़ुरआन 60:8) और "तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है।" (क़ुरआन 109:6)। धर्मत्याग का पृष्ठ सबसे ज़्यादा बहस वाला मामला संभालता है, और इस्लाम की नज़र में धर्म की प्रस्तुति हर धर्म को वैसे पेश करती है जैसे उसके मानने वाले उसे ठहराते हैं।
लड़ाई की आयतें बचावी हैं (22:39-40) : वे आक्रमण पलटने की इजाज़त देती हैं, ईमान पर ज़बरदस्ती की नहीं। तलवार की आयतों का पृष्ठ हर आयत का संदर्भ तफ़सील से देखता है।
क़ुरआन दीन बदलने पर कोई दुनियावी सज़ा नहीं ठहराता (18:29), और अंदरूनी ऐतक़ाद कभी सज़ा-योग्य नहीं। धर्मत्याग का पृष्ठ इस मसले को आलिमों की दोनों तफ़सीरों के साथ संभालता है।