क्या इस्लाम ग़ैर-मुसलमानों से दोस्ती रोकता है ?

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आयत 5:51 जंग के सियाक़ में यहूदियों और ईसाइयों को हिफ़ाज़ती सरपरस्त (अवलिया) बनाने से रोकती है, उन्हें हमसाया, हमकार और दोस्त रखने से नहीं : वही क़ुरआन उनका खाना, उनकी स्त्रियों से निकाह, ख़ानदानी भलाई और इंसाफ़ जायज़ करता है।

नहीं : आयत 5:51 मदीना की जंगों के सियाक़ में उन गिरोहों को हिफ़ाज़ती सरपरस्त (अवलिया : मुआहदों और हिफ़ाज़त की ज़बान) बनाने से रोकती है जो जमाअत से लड़ रहे थे : "ऐ ईमान वालो! तुम यहूदियों तथा ईसाइयों को मित्र न बनाओ। वे परस्पर एक-दूसरे के मित्र हैं।" (क़ुरआन 5:51)।

उसी क़ुरआन ने उनका खाना और उनकी स्त्रियों से निकाह जायज़ किया (क़ुरआन 5:5), ग़ैर-मुसलमान माँ-बाप के साथ भलाई का हुक्म दिया : "उन दोनों की बात मत मान और दुनिया में उनके साथ सुचारु रूप से रह" (क़ुरआन 31:15), और क़ाइदा रखा : "अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों से अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला।" (क़ुरआन 60:8)।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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अवलिया का मअनी : मुआहदा, दोस्ती नहीं

अवलिया मुआहदों की ज़बान है : वली वह सरपरस्त है जो हिफ़ाज़त और सियासी ताल्लुक़ की ज़मानत देता है।

आयत 5:51 ईमानदारों को यह हिफ़ाज़ती वफ़ादारी उन यहूदी और ईसाई गिरोहों को देने से रोकती है जो 5वें साल की मदीना में आपस में मिलकर नववादा जमाअत के ख़िलाफ़ खड़े हो रहे थे : यह जंग के दौर का वफ़ादारी का क़ाइदा है, मिलने-जुलने की मना नहीं। क़ुरआन ख़ुद हद खींचता है : "अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मैत्री रखने से रोकता है, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध किया तथा तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला और तुम्हें निकालने में एक-दूसरे की सहायता की।" (क़ुरआन 60:9) : बज़बत मुहारिब, पूरा कोई धर्म नहीं।

जो उसी क़ुरआन जायज़ और फ़र्ज़ करता है

उसी नुस की मुज़ाहमत करने वाला सामाजिक और ख़ानदानी क़रीबत का दरजा ग़ौर-तलब है : एहले-किताब का खाना और उनकी स्त्रियों से निकाह : "और उन लोगों का खाना तुम्हारे लिए हलाल है जिन्हें किताब दी गई, और तुम्हारा खाना उनके लिए हलाल है, और ईमान वाली औरतों में से पाक-दामन औरतें तथा उन लोगों की पाक-दामन औरतें जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई" (क़ुरआन 5:5)।

और ग़ैर-मुसलमानों के साथ ख़ानदानी भलाई फ़र्ज़ है : अस्मा की बुत-परस्त माँ जो मिलने आईं उन्हें पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) का यह जवाब मिला : "अपनी माँ से रिश्ता जोड़े रखो" (बुख़ारी 2620 से मरवा)। आम क़ाइदा : "अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों से अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला।" (क़ुरआन 60:8)।

पोलेमिक्स वाली पढ़ाई और नुस की पढ़ाई

इलज़ाम 5:51 को इक लफ़्ज़ को तन्हा करके (सरपरस्त को "दोस्त" कर दिया) पढ़ता है और सियाक़ (जंग में लड़ने वाले गिरोह) और मुज़ाहम नुस (5:5, 60:8, 60:9, बुख़ारी 2620) मिटा देता है। नुस की पढ़ाई ढाँचा देती है : मुहारिबों की सियासी वफ़ादारी मेंदूद, सामाजिक और ख़ानदानी क़रीबत जायज़, तमाम ग़ैर-मुहारिबों के साथ इंसाफ़ और भलाई फ़र्ज़।

यह हर दौर के मुआहदों का क़ानून है, बचाव की जंग में इक जमाअत पर लागू, हमसाये से नफ़रत की किताब नहीं। क्या इस्लाम ग़ैर-मुसलमानों से नफ़रत करता है ? का पृष्ठ लोगों के सलूक संभालता है, और क्या सभी ग़ैर-मुसलमान जहन्नम में जाएँगे ? का पृष्ठ आख़िरत का मक़ाम।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न आयत 5:51 और ग़ैर-मुसलमानों से दोस्ती

क्या "अवलिया" का मअनी "दोस्त" है ?

नहीं : अवलिया हिफ़ाज़ती सरपरस्तों को कहते हैं, वह सरदार जो हिफ़ाज़त और सियासी ताल्लुक़ की ज़मानत देते हैं : यह क़बाइली मुआहदों और जंग की ज़बान है, सामाजिक दोस्ती की नहीं। क़ुरआन ख़ुद बयान करता है कि कौन मेंदूद है : "अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मैत्री रखने से रोकता है, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध किया तथा तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला और तुम्हें निकालने में एक-दूसरे की सहायता की।" (क़ुरआन 60:9) : मुहारिब, हमसाये नहीं।

क्या मैं ईसाई, यहूदी, नास्तिक दोस्त रख सकता हूँ ?

हाँ : क़ुरआन एहले-किताब का खाना और उनकी स्त्रियों से निकाह जायज़ करता है (क़ुरआन 5:5), दो बड़े सामाजिक और ख़ानदानी क़रीबत के दरजे, और ग़ैर-मुसलमान माँ-बाप के साथ भलाई का हुक्म देता है : जब अस्मा की बुत-परस्त माँ उनसे मिलने आईं तो पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने जवाब दिया : "अपनी माँ से रिश्ता जोड़े रखो" (बुख़ारी 2620 से मरवा)। ज़िंदगी का क़ाइदा इंसाफ़ और भलाई है हर उस शख़्स के साथ जो जंग नहीं करता (क़ुरआन 60:8) : सच्ची सामाजिक दोस्ती उसी में शामिल है।

क्या आयत 5:51 आज भी लागू है ?

वह अपने मवजू में लागू है : इक मुसलमान अपनी सियासी वफ़ादारी और फ़ौजी हिफ़ाज़त उन गिरोहों को नहीं देता जो उसकी जमाअत से जंग में हैं। इक ऐसे देश के इक शहरी मुसलमान के लिए जहाँ वह अमन में जीता है और क़ानून चलता है, लागू होने वाला क़ाइदा मुआहदे और शहरी वफ़ादारी का है : <a href="/hi/खंडन/क्या-इस्लाम-फतह-के-लिए-दुनिया-को-दो-खेमों-में-बाँटता-है.html">दुनिया की तक़सीम</a> का पृष्ठ और <a href="/hi/खंडन/क्या-इस्लाम-गैर-मुसलमानों-से-नफरत-करता-है.html">क्या इस्लाम ग़ैर-मुसलमानों से नफ़रत करता है ?</a> का पृष्ठ यही ढाँचा संभालते हैं।

स्रोत: क़ुरआन 5:51 (हिफ़ाज़ती सरपरस्त, जंग के सियाक़ में) · क़ुरआन 60:8 और 60:9 (जायज़ भलाई, मुअय्यन शुदा दुश्मन) · क़ुरआन 5:5 (एहले-किताब का खाना और निकाह) · बुख़ारी 2620 (अस्मा की बुत-परस्त माँ : अपनी माँ से रिश्ता जोड़े रखो)

के लिए अन्य चरण खंडन : इस्लाम के ख़िलाफ़ इलज़ामों के जवाब

आगे पढ़ें आयत 5:51 और ग़ैर-मुसलमानों से दोस्ती

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لا إله إلا الله अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद