होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या क़ुरआन यहूदियों को बंदर और सूअर कहता है ?
3 आयतें बंदर बनने की तब्दीली का ज़िक्र करती हैं : सब शनिवार की पाबंदी तोड़ने के गुज़रे हुए अज़ाब को बयान करती हैं। क़ुरआन उसमें यहूदियों में परहेज़गारों की इज़्ज़त भी जोड़ता है : इबारत किसी क़ौम की तौसीफ़ नहीं करती, वह इक वाक़िया बयान करती है।
नहीं : तीनों आयतें वही तारीख़ी अज़ाब बयान करती हैं, शनिवार की पाबंदी तोड़ने वाले गिरोह का : "और निःसंदेह तुम उन लोगों को जान चुके हो, जो तुममें से शनिवार (के दिन) में सीमा से बढ़ गए। तो हमने उनसे कहा कि तुम अपमानित बंदर बन जाओ।" (क़ुरआन 2:65)।
मामला इक ख़ास गिरोह का तारीख़बंद अज़ाब है, यहूदी क़ौम की तौसीफ़ नहीं : वही क़ुरआन गवाही देता है कि "वे सभी समान नहीं हैं; किताब वालों में एक समूह (सत्य पर) स्थापित है, जो रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं और वे सजदे करते हैं।" (क़ुरआन 3:113)। यहूदी अदब ख़ुद अपने क़िस्सों में इसी तरह के अज़ाब जानती है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयतब्दीली वाली आयतें 3 हैं, और वे इक ही क़िस्सा बयान करती हैं : "और निःसंदेह तुम उन लोगों को जान चुके हो, जो तुममें से शनिवार (के दिन) में सीमा से बढ़ गए। तो हमने उनसे कहा कि तुम अपमानित बंदर बन जाओ।" (क़ुरआन 2:65), और सूरे 7 तफ़्सील देती है : "फिर जब वे उस काम में सीमा से आगे बढ़ गए, जिससे वे रोके गए थे, तो हमने उनसे कहा कि अपमानित बंदर बन जाओ।" (क़ुरआन 7:166)।
सियाक़ शनिवार का अज़ाब है : इक गिरोह जो मुक़द्दस दिन मछली पकड़ने की पाबंदी का बाय-पास करने के लिए एक रात पहले जाल लगाता था और अगले दिन उठा लेता था। यह तारीख़बंद अज़ाब है, हज़ारों साल पहले के इक ख़ास गिरोह पर नाज़िल हुआ, किसी क़ौम को हमेशा के लिए चिपकाया गया निशान नहीं।
तीसरी आयत मक्के वालों की इक शैतानी दावत का जवाब है, जो पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) को बदले में फ़ायदों के साथ अपने बुतों की पूजा की दावत दे रहे थे : "आप कह दें : क्या मैं तुम्हें अल्लाह के निकट इससे अधिक बुरा बदला वाले लोग बताऊँ, वे लोग जिनपर अल्लाह ने ला'नत की और जिनपर क्रोधित हुआ, और जिनमें से बंदर और सूअर बना दिए और जिन्होंने 'ताग़ूत' की पूजा की।" (क़ुरआन 5:60)।
लिस्ट उसी इबारत में बुत-परस्तों को शामिल करती है : मापदंड पैदाइश नहीं, अमल है।
पोलेमिकी किराअत पड़ोसी नुस के आगे ढेर हो जाती है : "वे सभी समान नहीं हैं; किताब वालों में एक समूह (सत्य पर) स्थापित है, जो रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं और वे सजदे करते हैं।" (क़ुरआन 3:113), और क़ीमत का क़ाइदा : "निःसंदेह अल्लाह के निकट तुममें सबसे अधिक सम्मान वाला वह है, जो तुममें सबसे अधिक तक़्वा वाला है।" (क़ुरआन 49:13)।
वह किताब जो यहूदियों में सिद्दीक़ों की गवाही देती है और परहेज़गारी को शरफ़ का इकलौता मापदंड बनाती है, किसी क़ौम से नफ़रत का दावा नहीं करती : वह अपने ही सरकशों की तारीख़ बयान करती है। क्या इस्लाम यहूदी-विरोधी है ? का पृष्ठ पूरा दस्तावेज़ जुटाता है।
वह इक ख़ास इशारा-ए-तनक़ुज़ का जवाब है : मक्के वालों ने पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) को उनकी बुत-परस्ती अपनाने की दावत दी थी, और आयत सवाल उलट देती है : सबसे बुरा मरतबा लानत-कर्दों का है, जिनमें से उसने बंदर और सूअर बना दिए, और ताग़ूत की पूजा करने वाले का। आयत उसी इबारत में बुत-परस्त काफ़िरों को भी जोड़ती है : मामला पैदाइश से किसी क़ौम का नहीं, उन लोगों का है जो ये अमल करते हैं।
इसलिए कि नुस का बयान करा शनिवार का जुर्म इक हिसाब-किताब वाली शरई सरकशी है : पाबंदी के दिन मछलियों के जाल लगाना। तब्दीली इक ऐसे इंसान के गिरने को बयान करती है जो जान-बूझकर उस चीज़ को पैमाल करता है जिसे वह मुक़द्दस जानता है। रब्बानी अदब में सज़ा-वार तब्दीलियों के क़िस्से ख़ुद मौजूद हैं : यह बात क़दीम क़िस्सों की मशतरका विरासत से है, किसी यहूदी-विरोधी इजाद नहीं।
नहीं : क़ुरआन किसी की हक़ारत नहीं करता (क़ुरआन 49:13 : क़ीमत परहेज़गारी है, क़ौमीयत नहीं), किताब वालों में सीधे लोगों की गवाही देता है (क़ुरआन 3:113), और इस्लामी फ़िक़ह ने हमेशा अज़दाद के क़िस्सों और ज़िंदा लोगों को अलग रखा। आज के किसी यहूदी के ख़िलाफ़ इस आयत का इस्तेमाल दोहरी गद्दारी है : नुस की और तरीक़े की। <a href="/hi/खंडन/क्या-इस्लाम-यहूदी-विरोधी-है.html">क्या इस्लाम यहूदी-विरोधी है ?</a> का पृष्ठ बुनियादी सवाल संभालता है।