होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > पैग़ंबर ने पेय में मक्खी डुबोने को क्यों कहा ?
वेब की सबसे मज़ाक उड़ाई गई हदीसों में से एक : पेय में गिरी मक्खी को डुबोना, क्योंकि उसके एक पर मरज़ है और दूसरे पर इलाज। नुस सहीह है और बुख़ारी में दो बार मरवा है। उसकी जगह नबवी तिब्ब में है : एक तवसिया, कोई क़ानून नहीं।
नुस सहीह है : "जब तुममें से किसी के पेय में मक्खी गिर जाए, तो वह उसे डुबोए फिर निकाल दे, क्योंकि उसके एक पर मरज़ है और दूसरे पर इलाज" (बुख़ारी 3320 और 5782 से मरवा)। यह नबवी तिब्ब से तालुक़ रखता है, एक सिह्हत की तवसिया, कोई दीनी तक़्सीर नहीं : जो मक्खी को बग़ैर डुबाए निकाल दे वह कोई गुनाह नहीं करता। और आधुनिक माइक्रोबायोलॉजी बिल्कुल वही हम-ज़मानी बयान करती है : कीड़े के जिस्म पर जरासिम, उसके परों पर जीवाणुरोधी मवाद।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयबुख़ारी नुस को दो बार मरवा करता है : "जब तुममें से किसी के पेय में मक्खी गिर जाए, तो वह उसे डुबोए फिर निकाल दे, क्योंकि उसके एक पर मरज़ है और दूसरे पर इलाज" (बुख़ारी 3320 से मरवा), और दूसरी रिवायत जोड़ती है "कि उसे मुकम्मल डुबो दे फिर निकाल दे" (बुख़ारी 5782 से मरवा)। सहीह होने पर इल्तिराफ़ नहीं : उसी सहीह के दो अबवाब में वही नुस, अलग-अलग सनदों से। जिस पर बहस होती है वह उसकी कैटेगरी है, और यहीं पोलेमिकिस्ट ग़लती करते हैं।
नववी और इब्न हजर ने इस नुस की शरह बाक़ी नबवी तिब्ब के नुसूस की तरह की : अपने सियाक़ में एक मुतेफ़िद सिह्हती हिदायत, न कोई दीनी तक़्सीर न कोई पाकीज़गी का क़ानून। पाकीज़गी का फ़िक़ह आयतों और बुज़ुर्ग नापाकी की हदीसों का ही रहता है, और ग़ैर-मुज़िर कीड़ा क़ानूनी माइने में पेय को नहीं मैला करता। इसीलिए 14 सदियों के इस्लाम में किसी ने मक्खी को बग़ैर डुबाए निकालने को कभी गुनाह नहीं ठहराया : तवसिया मौजूद है, ज़बरदस्ती नहीं।
आधुनिक रिसर्च ने दो हक़ाइक़ दस्तावेज़ किए हैं जो एक-दूसरे से मिलते हैं : मक्खी अपने जिस्म और टाँगों के बालों पर चिपके मरज़-जन जरासिम ले जाती है, और उसका ज़िस्म जीवाणुरोधी ताक़त वाले मवाद राज़ करता है, ख़ास तौर पर उसके परों पर मौजूद।
हदीस की इबारत, "उसके एक पर मरज़ थामे है, दूसरा इलाज", इस हम-ज़मानी को उस दक़ाई से बयान करती है जिसने माइक्रोबायोलॉजिस्टों को चौंकाया : एक ही कीड़ा मरज़-ए-पैदा-कुनंदा और उसका मुक़ाबला करने वाला माद्दा दोनों थामे है। नुस न इस्तेलाक़ का वादा करता है न इलाजी डोज़ का : वह एक मुवाज़ना बयान करता है और सियाक़ को फ़ैसला देता है।
वह नहीं कहती कि पेय मुक़द्दस हो जाए या मक्खी पाक साफ़ करती है : कोई शरई क़ानून इस हरकत पर मोहतमिल नहीं। वह यह भी नहीं कहती कि मक्खियाँ इलाज करती हैं : क्लासिकी मुस्लिम तिब्ब ने कीड़ों को कभी इलाज के तौर पर मरवा नहीं किया।
और वह आधुनिक हियज़-ए-सिह्हत को मना नहीं करती : वही रिवायत जो यह नुस मरवा करती है, बर्तन ढकने और हाथ धोने का हुक्म भी मरवा करती है। यह पोलेमिकी क़िराअत जो इस हदीस को ज़हानत की दलील बनाती है, भूल जाती है कि रिवायत उसे हमेशा से सिह्हती हिकमत में गिनती आई है, तऊन के ख़िलाफ़ तहफ़्फ़ुज़ और वबा के क़वाइद के पास। क्या इस्लाम आधुनिक चिकित्सा को ठुकराता है ? का पृष्ठ इस्लाम में सिह्हत का आम दायरा संभालता है।
नहीं : उलमा ने हमेशा इस नुस को नबवी तिब्ब में गिना है, यानी एक मुतेफ़िद तवसिया, कभी कोई तक़्सीर या सियासत-ए-पाकीज़गी का रुक्न नहीं। इस्लाम की तारीख़ में किसी को कभी मलामत नहीं हुई कि उसने गिलास से मक्खी को बग़ैर डुबाए निकाल लिया, और फ़िक़ह के सियासत-ए-पाकीज़गी इस हरकत पर मोहतमिल नहीं।
हदीस बिल्कुल यही हक़ीक़त बयान करती है : एक पर पर मरज़ है, दूसरे पर इलाज। माइक्रोबायोलॉजी की रिसर्च ने दिखाया है कि मक्खी अपने जिस्म पर बैक्टीरिया ले जाती है और जीवाणुरोधी ताक़त वाले मवाद भी राज़ करती है : एक ही कीड़े पर मरज़ और इलाज की यही हम-ज़मानी वह बात है जो नुस बयान करता है। यह न इस्तेलाक़ का वादा करता है न इम्मुनिटी का, और उलमा साफ़ करते हैं कि सियाक़ (डोज़, पेय, सिह्हत की हालत) ही फ़ैसला करता है।
यह उन नुसूस में से है जिन्हें मुहक्किक़ नबवी मजमूए की ग़ैर-मुतवक़्क़अ बयानियों में गिनते हैं, तऊन के ख़िलाफ़ तहफ़्फ़ुज़ के साथ जो उसके बयान होने से 14 सदियों पहले लागू थी। पुरसुकून मोक़िफ़ ख़ुद मुसलमान उलमा का है : नबवी तिब्ब का एक नुस, उसी तरह पढ़ा जाने वाला, जिसकी इल्मी बरकत कई निशानियों में से एक है, कभी दोक्तरीन की बुनियाद नहीं।