क़ुरआन की कई क़िराअत क्यों हैं ?

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मुनाज़िरे बाज़ क़ानूनी क़िराअतों को क़ुरआन के इतने "वर्ज़न" बताते हैं। फ़ाइल : 7 हर्फ़ों वाली हदीस, 10 क़ारियों की सनद, इख़्तिलाफ़ किस चीज़ को छूते हैं (और किसे नहीं), और कोई आक़ीदा इन पर क्यों टिका नहीं।

पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने ख़ुद क़िराअत के गुना-गुनापन की ख़बर दी : "क़ुरआन सात हर्फ़ों पर नाज़िल हुआ है" (तिर्मिज़ी 2942 से मरवी, जिन्होंने इसे हसन सहीह कहा)। 10 क़ानूनी क़िराअतें पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) से नामवर सनदों से पहुँची तलफ़्फ़ुज़ें हैं, जो अक़्सर-ओ-अक़सर अइमा (स्वर) और कभी-कभी एक ही मतलब वाला मतरादिफ़ लफ़्ज़ छूती हैं : नुसूस एक है, क़िराअतें उसकी रस्मी चेहरे हैं, और कोई आक़ीदा इन पर टिका नहीं।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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7 हर्फ़ों वाली हदीस

क़िराअत का गुना-गुनापन ख़त्तियों की खोज नहीं है : वह सहीह कॉर्पस में इलान है। "क़ुरआन सात हर्फ़ों पर नाज़िल हुआ है" (तिर्मिज़ी 2942 से मरवी, जिन्होंने लिखा : यह हदीस हसन सहीह है)।

उमर ने पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) के सामने हिशाम बिन हाकिम के साथ क़िराअत का इख़्तिलाफ़ रिवायत किया : हर एक एक ही सूरह को अलग-अलग पढ़ता था, और पैग़ंबर ने दोनों को मनज़ूर किया, इन लफ़्ज़ों के साथ : इसी तरह नाज़िल हुई है (तिर्मिज़ी 2943 से मरवी)। गुना-गुनापन चाहा हुआ और पहुँचाया गया हाल है, महफ़ूज़ की ग़लती नहीं।

10 क़ारियों की सनद

उसी शुरुआती गुना-गुनापन से फ़न ने रस्मी कॉर्पस निकाला : 10 क़ानूनी क़िराअतें, हर एक सहाबा तक जाती हुई नामवर माहिरीन की मुतवासिल सनद लिए, अपने उसूल (शातिबिय्या और दुर्रा की किताबें) के साथ कोडीफ़ाई। दुनिया का हर छपा मुसहफ़ इन्हीं 10 में से एक क़िराअत पर है : हफ़्स असम सबसे ज़्यादा फैली हुई, वर्श नाफ़े मग़रिब में ग़ालिब। जो रद्द हुई : बिना कसरत वाली सनद की क़िराअतें, बिल्कुल वैसे जैसे मज़बूत सनद के बिना हदीसें।

इख़्तिलाफ़ किसे छूते हैं, और किसे नहीं

असली फ़र्क़ : एक अइमा (स्वर), एक मद्द (खिंचाव), एक मिलान का तरीक़ा, कभी-कभी एक ही मतलब वाला मुतक़ारिब लफ़्ज़ (जो जल्दी करता है, जिससे जल्दी की गई)। कोई नमाज़ का नियम, कोई ईमानी बात, क़ुरआन की कोई तारीख़ इन पर टिकी नहीं : पुराने मुफ़स्सिरीन ने हर फ़र्क़ की शरह की और रिवायत ने उन्हें हमेशा उसी एक नज़ूल की दौलत पढ़ा। क्या क़ुरआन में तब्दीली की गई है ? का पृष्ठ हिफ़ाज़त के वादे और बड़ी याददाश्त संभालता है, और क्या क़ुरआन की कुछ आयतें खो गईं ? संगसार का मामला।

यह फ़ाइल उलटी क्या साबित करती है

नुसूस जो अपनी रस्मी तलफ़्फ़ुज़ों के साथ पहुँचे, नामवर, तारीख़शुदा और मुतवासिल, वह बदले हुए नुसूस का उलटा है : तब्दीली एक ही कर देती। दूसरी पुरानी नुसूसों की असली ख़त्तियों से मुक़ाबला, जहाँ फ़र्क़ पूरे इबारतों को बदल देते हैं, पूरी तारीख़ी तनक़ीद मरवी करती है। क़ुरआन वह अकेली फ़ाइल देता है जहाँ फ़र्क़ क़ानूनी, नापा जा सकने वाला छोटा, और आम सनदों से उसी पैग़ंबर से जुड़ा हुआ है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न क़ुरआन की क़िराअतें (पढ़ने के तरीक़े)

क्या हफ़्स और वर्श दो अलग-अलग क़ुरआन हैं ?

नहीं : ये तलफ़्फ़ुज़ की दो रिवायतें हैं (एक मग़रिब में ग़ालिब, दूसरी बाक़ी जगहों पर), जो उसी नुसूस की कुछ अइमा (स्वरों) और लिखावटों में फ़र्क़ रखती हैं। मिस्री और मग़रिबी मुसलमान सुनने के फ़र्क़ तक एक जैसे पन्ने पढ़ते हैं, बिना इसके कि कोई नियम, नमाज़ या ईमान बदले : यह क़ानूनी लहजे का फ़र्क़ है, नुसूस का नहीं।

सिर्फ़ 10 मान्यता प्राप्त क़िराअतें ही क्यों ?

क्योंकि तरीक़ा मुकम्ल, मालूम और कसरत वाली सनद माँगता है जो पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) तक जाती है : फ़न के माहिरीन ने इन्हीं माईयारों पर 10 क़िराअतें तस्दीक़ कीं और मज़बूत सनद के बिना क़िराअतें रद्द कीं। यह हदीस वाली तरक़ीक़ ही है : क़ुरआनी नुसूस पैग़ंबरी रिवायत की तरह, जाँची हुई सनदों से पहुँचता है।

क्या एक क़िराअत आयत का मतलब बदल सकती है ?

सबसे रौशन मामले सार्फ़ और मिलान छूते हैं, कोई आक़ीदा नहीं : कुल मतलब वही रहता है, कभी-कभी ज़्यादा अमीर लतीफ़ा के साथ। मुफ़स्सिरीन ने हर फ़र्क़ पर 14 सदियों से शरहें लिखीं और कोई ईमानी बात इन पर टिकी नहीं : दूसरी पुरानी नुसूसों की असली ख़त्ती फ़र्क़ात के मुक़ाबले, यह फ़र्क़ लहजे के दरजे का है।

स्रोत: तिर्मिज़ी 2942 (7 हर्फ़ों वाली हदीस, हसन सहीह कही गई) · तिर्मिज़ी 2943 (उमर : इसी तरह नाज़िल हुई है) · 10 क़ानूनी क़िराअतें (क़ारियों की नामवर सनदें)

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سبحان الله وبحمده अल्लाह की महिमा और स्तुति है

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद