होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या क़ुरआन यूनानी विज्ञान की नकल करता है ?
नामुमकिन वक़्त (ग़ालिन का वह़्य के बाद तर्जुमा होना), मज़मून के इख़्तिलाफ़ (हैज़ के ख़ून के ख़िलाफ़ दोनों पानी), और पैग़ंबर का अनपढ़ होना।
नहीं : इलज़ाम वक़्त और मज़मून, दोनों से टकराता है।
ग़ालिन और यूनानी तबीबों का अरबी में तर्जुमा वह़्य के सदियों बाद हुआ (हिकमत के घर के दौर में), और 7वीं सदी के मक्के में लिखी हुई कोई अरबी तबीबी किताब मौजूद नहीं थी। और मज़मून अलग है : जहाँ यूनानी चिकित्सा सिखाती थी कि जनिन नर वीर्य से बनता है जो हैज़ के ख़ून में जम जाता है, क़ुरआन इनसान की पैदाइश इक मिले-जुले माद्दे से बयान करता है : "निःसंदेह हमने इनसान को मिश्रित वीर्य से पैदा किया" (क़ुरआन 76:2), इक नारी हिस्सा जिसे यूनानी विज्ञान झुठलाता था।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयतारीख़ी हक़ीक़त सादी और तारीख़-बंद है : ग़ालिन और यूनानी चिकित्सा की किताबों का अरबी तर्जुमा 9वीं सदी में हुआ, बग़दाद की इल्मी तहरीक में, यानी वह़्य के तक़रीबन दो सदियों बाद। उससे पहले कोई अरबी तर्जुमा मौजूद नहीं, और 7वीं सदी के मक्के में न किताबख़ाना था, न तबीबी अदारा, न लिखा हुआ इल्मी साहित्य : यह मुकम्मल दस्तावेज़ी ख़ालीपन है। नक़ल को इक राह चाहिए, और राह न सही मक़ाम पर है न सही वक़्त पर।
जहाँ यूनानी जिस्मियत सिखाती थी कि जनिन नर वीर्य से बनता है जो नारी ख़ून में जम जाता है, क़ुरआन इनसान की पैदाइश दोनों हिस्सों से निकले पानी से बयान करता है : "तथा वही है, जिसने पानी (वीर्य) से एक मनुष्य को पैदा किया। फिर उसके ख़ानदानी तथा ससुरालाी संबंध बना दिए।" (क़ुरआन 25:54), और आयत 76:2 "मिश्रित वीर्य" बयान करती है, क्लासिकी तफ़्सीर के हिसाब से दोनों माद्दों का मेल।
औरत का नसबी हिस्सा, जिसे ग़ालिन झुठलाता था, नुस में मौजूद है : उस ठीक नुक़्ते पर जहाँ इलज़ाम नक़ल ढूँढ़ता है, क़ुरआन मफ़रूज़ा सरचश्मा को इस्लाह करता है। क्या क़ुरआन बाइबिल से लिया गया है ? का पृष्ठ क़िस्सों के लिए वही इलज़ाम खोलता है, वही नतीजा।
नुस का रसूल न पढ़ते थे न लिखते थे : "और आप इससे पहले न कोई पुस्तक पढ़ते थे और न उसे अपने दाहिने हाथ से लिखते थे।" (क़ुरआन 29:48), पूरी सीरत की गवाही। बिना स्कूल के मक्की सौदागर की पहुँच में न यूनानी नुस्ख़े थे (बिना तर्जुमा), न तबीबी पेपिरी (अरब में ग़ैर-मौजूद)।
और किताब की ज़बान ग़ालिन के मुख़्तसर की ज़बान नहीं : क़ुरआनी जनिन-मुहावरा (नुत्फ़, अलक़, मुद़ग़ा) अरबी है, मोटा, बिना यूनानी नक़ल के। क्या इस्लाम विज्ञान के ख़िलाफ़ है ? का पृष्ठ दिखाता है कि तहज़ीब ने आगे क्या पैदा किया : अरबों ने ग़ालिन का तर्जुमा दो सदियों बाद किया, इल्म की भूख से, और उससे आगे निकल गए।
मज़मून की मिलती-जुलती बातें (इनसान मराहिल से बनता है) मौजूद हैं, और तफ़्सीलें अलग हैं : क़ुरआनी मुहावरा (नुत्फ़, अलक़, मुद़ग़ा) का यूनानी नुसूस में कोई बिल्कुल मिलता-जुलता लफ़्ज़ नहीं, और दोनों माँ-बाप के हिस्से का बयान यूनानी नज़रिये, सिर्फ़ हैज़ के ख़ून, से टकराता है। मुवाफ़िक़ नुक़्तों पर क़ुरआन ग़ालिन से ज़्यादा संतुलित है : वह दिखे हुए मराहिल बयान करता है, ओहम वाली जिस्मानी तफ़्सील कभी नहीं घुसाता।
वह पहुँचा ही नहीं : ग़ालिन का अरबी तर्जुमा 9वीं सदी में हुआ, बग़दाद के हिकमत के घर की तहरीक में, यानी वह़्य के दो सदियों बाद। 7वीं सदी के मक्के में न तबीबी अदारा था, न किताबख़ाना, न लिखा हुआ इल्मी साहित्य : क्या क़ुरआन बाइबिल से लिया गया है ? का पृष्ठ क़िस्सों के लिए वही दलील संभालता है।
नहीं : वह ख़ुद को अख़लाक़ी नसीहत बताता है जो मख़लूक़ात को देखने की दावत देती है (क्या इस्लाम विज्ञान के ख़िलाफ़ है ? का पृष्ठ तफ़्सील बयान करता है), और उसकी चंद क़ुदरती आयतें दिखे हुए की इंसानी ज़बान बोलती हैं। न यूनानी रिसाला, न आधुनिक किताब : संतुलित पढ़ने का तरीक़ा दोनों हम-किबर इलज़ामों पर लागू होता है (यूनानी नक़ल, इल्मी मोजिज़ा)।