होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या इस्लाम वैश्विक ख़िलाफ़त माँगता है ?
नुसूस ख़ुलफ़ा की ख़बर देते हैं और इंसाफ़ और शूरा माँगते हैं : वह न इकलौती रियासती शक्ल का फ़ैसला करते हैं न दुनिया की फ़तह। ख़िलाफ़त हुक्मरानी की तारीख़ है, ईमान का रुक्न नहीं।
ईमान के मुतालिक़ा के तौर पर नहीं : नुसूस हुक्मरानी के उसूल तय करते हैं (इंसाफ़, शूरा, क़ायम इख़्तियार की इताअत) बग़ैर इसके इकलौती रियासती शक्ल का फ़ैसला किए।
पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने ख़ुलफ़ा की ख़बर दी और उनके मंसूब होने का क़ाइदा दिया (बुख़ारी 3455), क़ुरआन "अपने में से अधिकार वालों (शासकों) का" की इताअत का हुक्म देता है (क़ुरआन 4:59) और शूरा : "और उनका काम आपस में परामर्श करना है" (क़ुरआन 42:38)। इस्लामी तारीख़ में ख़िलाफ़तें, इमारतें और सल्तनतें आईं : ईमान का कोई रुक्न इन पर मोतबर नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयमजमूआ ज़मानत की ख़बर देता है और उसका क़ाइदा देता है : "बनी इसराईल के अम्बिया उन पर हुक्मरानी करते थे : जब भी कोई नबी दुनिया से जाता, दूसरा उसकी जगह आता ; और मेरे बाद कोई नबी नहीं, लेकिन ख़ुलफ़ा होंगे, और वे क़ती होंगे" ; इस सवाल पर कि क्या करें, जवाब : पहले की बैअत थामो फिर अगले की, उन्हें उनके हक़ दो, क्योंकि अल्लाह उनसे उस अमानत के बारे में पूछेगा जो उन्होंने थाम रखी (बुख़ारी 3455 से मरवा)।
क़ुरआन उसूल तय करता है : "अपने में से अधिकार वालों (शासकों) का" की इताअत, इख़्तिलाफ़ की सूरत में वह़्य से फ़ैसले के साथ (क़ुरआन 4:59), और मुशतरका मामलों की शूरा (क़ुरआन 42:38)। दूसरी मरवी हुई हदीस पूरा तरीक़ा थामे हुए है : सुन्नत और महदी ख़ुलफ़ा की राह को थामे रहो (हाकिम 329 से मरवा)।
कोई आयत या हदीस इकलौती रियासती शक्ल, कोई सरहदी इलाक़ा या कोई शाही ख़ानदान नहीं ठहराती : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) किसी ख़ास ज़मानत का नाम लिए बग़ैर दुनिया से गए, उम्मत को इंतिख़ाब करने के लिए छोड़कर, जो उसने सकीफ़ा में शूरा से किया।
तारीख़ी शक्लें बदलती रहीं : चार ख़ुलफ़ा राशिदीन, हर एक दूसरे तरीक़े से इंतिख़ाब या मंसूब, फिर शाही ख़िलाफ़तें, इमारतें, सल्तनतें, बादशाहतें, आधुनिक जमहूरियतें : सदियों की सियासी फ़िक़ह ने हुक्मरानी को इंसाफ़ और मुशतरका मफ़ाद का मामला गिना, कभी ईमान की उस इबादत नहीं जो इक बार हमेशा के लिए तय हो।
इक इस्लामी रियासत का ख़याल जो पूरी दुनिया पर फैलनी चाहिए, 19वीं और 20वीं सदी की सियासी किराअत है, उन तहरीकों की गोद में जिन्होंने हुक्मरानी की तारीख़ को फ़तह के प्रोग्राम में बदल दिया।
नुसूस मक़्सद पर उलटी बात कहते हैं : जैसे ही दूसरा झुके सुलह पेश किया जाता है, "और यदि वे (शत्रु) संधि की ओर झुकें, तो आप भी उसकी ओर झुक जाएँ और अल्लाह पर भरोसा रखें।" (क़ुरआन 8:61), और क़ुरआन क़ौमों की तनव्वुअ को पहचान का मक़्सद बनाता है : "ऐ मनुष्यो! हमने तुम्हें एक नर और एक मादा से पैदा किया तथा हमने तुम्हें जातियों और क़बीलों में कर दिए, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।" (क़ुरआन 49:13)।
अपने घर में इंसाफ़ से हुक्मरानी करना फ़र्ज़ है ; "दुनिया पर ग़ालिब आना" इस्लाम के किसी रुक्न में मौजूद नहीं। इस्लाम तलवार के ज़ोर पर फैला का पृष्ठ फ़तह की तोहमत संभालता है, और जिहाद और आतंकवाद का पृष्ठ जिहाद के लफ़्ज़ के साथ हेरफेर।
आधुनिक रियासत के शहरी मुसलमान के लिए नुसूस का क़ाइदा सादा है : नमाज़, ईमानदारी, इंसाफ़, अपने गिरोह की ख़िदमत, और उस मुल्क के क़वाइद का इहतराम जो उसकी हिफ़ाज़त करता है, अपने फ़राइज़ और अपने हुक़ूक़ के साथ (क़ुरआन 4:59)।
ख़िलाफ़त की ग़ैर-मौजूदगी कोई दीनी फ़र्ज़ ख़त्म नहीं करती : नमाज़ पढ़ी जाती है, रोज़ा रखा जाता है, ज़कात दी जाती है, और ईमान किसी निज़ाम पर मोतबर नहीं। इस्लाम को रियासती प्रोजेक्ट में घटाना 20वीं सदी के कारकुनों की ग़लती है और उनके मुख़ालिफ़ों की भी, जो इक कैरिकेचर पर हम-राय हो जाते हैं : नुसूस तो इंसाफ़, शूरा और सुलह की बात करते हैं, क्या इस्लाम लोकतंत्र के साथ असंगत है ? का पृष्ठ सियासी आम चौखटा संभालता है।
नहीं : रुकन नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज और ईमान की शहादा हैं, और कोई कैनोनी लिस्ट रियासती शक्ल का ज़िक्र नहीं करती। क्लासिकी उलमा इंसाफ़-पसंद इख़्तियार को मुशतरका ज़रूरत गिनते हैं (फ़र्ज़ किफ़ाया : इक मुशरत जमाई फ़र्ज़), कोई अक़ीदा नहीं, और बड़े मज़ाहिब ने हुक्मरानी की हर तारीख़ी शक्ल देखी बग़ैर इसके कि इक भी मुसलमान का ईमान उस पर मोतबर होता।
वह क़ायम रियासत में मुसल्लह तफ़रक़े से तालुक़ रखती है : क़ायम इख़्तियार के ख़िलाफ़ बग़ावत न करना और जब तक इक इख़्तियार उम्मत को थामे हुए है रक़ाबी ताक़त न खड़ी करना। वह यह ठहराती नहीं कि पूरी दुनिया की इकलौती रियासत होनी चाहिए : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने ख़ुद मदीने से बाहर की बादशाहतें क़बूल कीं, और ख़ुलफ़ा वाली हदीस कहती है "वे क़ती होंगे", पहले की बैअत की वफ़ादारी के क़ाइदे के साथ, किसी वैश्विक साम्राज्य के बग़ैर।
अपना ईमान जीना, जिस मुल्क में रहता है उसके क़वाइद का इहतराम करना, और जहाँ है वहीं इंसाफ़ की ख़िदमत करना : यही इख़्तियार रखने वालों की इताअत वाला क़ुरआनी क़ाइदा (क़ुरआन 4:59) हर सियाक़ में लागू। बड़े सुन्नी इदारे इसे बग़ैर इतिराज़ सिखाते हैं : मुकम्ल हुक्मरानी ईमान की शर्त नहीं, और मुसलमान नमाज़ पढ़ने के लिए, ईमानदारी की माँग पर, अपने बच्चों की परवरिश और पड़ोसी के साथ इंसाफ़ के लिए किसी निज़ाम का इंतज़ार नहीं करता। <a href="/hi/खंडन/क्या-शरीयत-पश्चिम-पर-थोपी-जाना-चाहती-है.html">क्या शरीयत पश्चिम पर थोपी जाना चाहती है ?</a> का पृष्ठ यह चौखटा संभालता है।