होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या क़ुरआन में शैतानी आयतें हैं ?
"ग़रानीक़" वाली रवायात की जड़, हदीस के इल्म का उनका रद्द-ए-अमल, सूरते नज़्म के साथ अंदरूनी टकराव, और रश्दी ने क्या मशहूर किया।
नहीं : "शैतानी आयतों" की कहानी ऐसी रवायातों पर टिकी है जिनकी सनदें टूटी या गढ़ी हुई हैं, हदीस के माहिरीन ने उन्हें रद्द किया और वे सहीह संग्रहों में मौजूद नहीं। सूरते नज़्म की आयतों में कभी रखे गए नुसूस के सिवा कोई और नुसूस नहीं था : "ये (मूर्तियाँ) कुछ नामों के सिवा कुछ भी नहीं हैं, जो तुमने तथा तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं।" (क़ुरआन 53:23)। सलमान रश्दी के नॉवेल ने मामले का नाम मशहूर किया, उसकी दलील कभी नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयक़िस्सा यह दावा करता है कि मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो), अपने हमवतनों को क़ायल करने की ख़ातिर, कुछ वक़्त के लिए लात, उज़्ज़ा और मनात देवियों को सिफ़ारिशी मान लेते, फिर रुज़ू कर लेते।
सूरते नज़्म की आयतें इन तीन नामों का ज़िक्र करती हैं, लेकिन तोड़ने के लिए : "फिर क्या तुमने लात और उज़्ज़ा को देखा।" "तथा तीसरी एक और (मूर्ति) मनात को?" (क़ुरआन 53:19-20), उनके फ़ौरन बाद फ़ैसला है : "ये (मूर्तियाँ) कुछ नामों के सिवा कुछ भी नहीं हैं, जो तुमने तथा तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं। अल्लाह ने इनका कोई प्रमाण नहीं उतारा है।" (क़ुरआन 53:23)। सूरत की बाक़ी आयतें पूरे क़ुरआन की बुतों की सबसे सख़्त नफ़रत हैं : कहानी ऐसा समझौता मानती है जिसे नुसूस ख़ुद, अपनी पड़ोसी आयतों में, मना करता है।
"ग़रानीक़" वाली रवायात दोनों सहीह संग्रहों में मौजूद नहीं, न क़ानून की बुनियाद रखने वाले सुनन में : वह तशरीहों के देर संग्रहों में आती हैं, टूटी सनदों, ग़ैर-मालूम रवायों या बिना स्रोत क़िस्से घुसाने के मशहूल रावियों के साथ।
हदीस के इल्म ने, जिसने सनदों की जाँच से लाखों रवायात क़रार दिए, इन अख़बारों को रद्द किया : यह इल्म के उस्तादों का इत्तेफ़ाक़ है, और आज के माहिरीन जो उन्हें सहीह कोरपस में ढूँढ़ते हैं, उसका नामोनिशान नहीं पाते।
मामला मुख़ालिफ़ मक्का में नुसूस बदलने का दावा करता है : माद्दी तौर पर मुमकिन नहीं।
हर नज़ूल हुई आयत उसी वक़्त दर्जनों सहाबाओं की याददाश्त में थी और आम तौर पर पढ़ी जाती थी, ऐसे शहर में जिसके सरग़र्दा दुश्मन फ़रेब की दलील पर पैसे देते। मक्का के हिफ़ाज़ सूरते नज़्म वैसे की वैसी पढ़ते थे : क्या क़ुरआन में तब्दीली की गई है ? का पृष्ठ जमा हुई याददाश्त का तरीक़ा तफ़सील से देता है, और उस पर टिकने वाला वादा : "निःसंदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारी है और निःसंदेह हम ही इसकी अवश्य रक्षा करने वाले हैं।" (क़ुरआन 15:9)।
मामला संग्रहों में सोया हुआ था जब 19वीं सदी के ओरिएंटलिस्टों ने उसे थीसिस बनाया, और जब सलमान रश्दी के नॉवेल (1988) ने उसे उसका मशहूर नाम दिया। शोर ने फ़िक्शन को तारीख़ दिखा दिया : कोई क़ुरआनी मैनुस्क्रिप्ट, कोई याददाश्त वाली रवायत, कोई सहीह सनद हादसे को सहारा नहीं देती।
यह पुराने दुश्मनों की गढ़ी हुई दंतकथा है, नए विवाद छेड़ने वालों की दोबारा इस्तेमाल की गई, और इस्लामी मेथड की तरह पक्की तारीख़ी तनक़ीद की तरह रद्द है। क्या मुहम्मद ने झूठ बोला ? का पृष्ठ उनकी सच्चाई के ख़िलाफ़ बुनियादी इल्ज़ाम संभालता है।
एक मुफ़र्द क़िस्से से, जो दोनों सहीह संग्रहों में और किसी मुत्तसिल सनद में मौजूद नहीं, तशरीहों के देर के संग्रहों में लिया गया और फिर 19वीं सदी के ओरिएंटलिस्टों ने उसे दंतकथा बना दिया। हदीस के इल्म ने, जो हर क़िस्से को उसकी सनदों से सहीह या रद्द करता है, उसे बिना बुनियाद क़रार दिया : किसी सहाबी ने उसे क़ुरआनी नुसूस के तौर पर मरवी नहीं किया।
क्योंकि उसने उस कहानी को मशहूर नाम दिया जिसे इल्म पहले ही दफ़्न कर चुका था, और मीडिया के शोर ने फ़िक्शन को हक़ीक़त दिखा दिया। पक्की अकादमिक दुनिया, इस्लाम के दुश्मन समेत, ग़रानीक़ को मुक़र्रर हादसा नहीं मानती : वह इख़्तिलाफ़ अदबी और सियासी था, तारीख़ी नहीं।
नहीं : नुसूस नज़ूल के ही दौरान, आयत-दर-आयत, दर्जनों सहाबाओं की आम याददाश्त में था और मुख़ालिफ़ मक्का में पढ़ा जाता था, जहाँ वह फ़ौरन रद्द कर दिया जाता। आम नज़ूल के दरमियान तब्दीली माद्दी तौर पर मुमकिन नहीं : क़ुरआन की हिफ़ाज़त का पृष्ठ यह तरीक़ा तफ़सील से देता है।