जिहाद और आतंकवाद

होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > जिहाद और आतंकवाद

जिहाद का इस्लाम में एक सटीक मतलब है : अल्लाह की ख़ातिर प्रयास करना, नमाज़, ख़ैरात और क़ायदे में बंधे बचावी लड़ाई के ज़रिए। बेगुनाहों को मारने वाला आतंकवाद क़ुरआन के हुक्म का उल्टा है, और इस्लाम के आलिमों ने उसे इज्मा के साथ मुजरिम ठहराया है।

जिहाद का मतलब है "अल्लाह की राह में प्रयास" : उसके कई रूप हैं (अपने नफ़्स से लड़ना, ख़ैरात करना, भलाई की तालीम देना) और उसकी फ़ौजी सूरत सख़्ती से बचावी है और क़ुरआन के क़ायदे में बंधी है (क़ुरआन 22:39-40) : लड़ाई के बाहर किसी को न मारना, आम नागरिकों की हिफ़ाज़त, संधियों का एहतराम।

बेगुनाहों को मारने वाला आतंकवाद खुले आम हराम है (क़ुरआन 5:32) और इस्लाम के आलिमों ने उसे इज्मा के साथ मुजरिम ठहराया है। "इरहाब" (दहशत) का लफ़्ज़ जिसे आतंकवादी अपनी पहचान बताते हैं, वही लफ़्ज़ क़ुरआन उनके अमल को बयान करने के लिए इस्तेमाल करता है : "जिसके साथ तुम अल्लाह के दुश्मन और अपने दुश्मन को और उनके अलावा कुछ और लोगों को भयभीत करोगे" (क़ुरआन 8:60) फ़ौजी हतोत्साहन का नियम है, कभी आम नागरिक ज़िंदगी का नियम नहीं।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

📖 2 मिनट पढ़ने का समय

जिहाद के लफ़्ज़ का मतलब

"जिहाद" "जाहदा" से निकला है : प्रयास करना।

क़ुरआन यह लफ़्ज़ कई मायनों में इस्तेमाल करता है : अपने नफ़्स के ख़िलाफ़ प्रयास ("तथा जिन लोगों ने हमारी ख़ातिर भरपूर प्रयास किया, हम अवश्य ही उन्हें अपने मार्ग दिखा देंगे", क़ुरआन 29:69), ख़ैरात और इनसाफ़ के ज़रिए प्रयास, अच्छी दलील के ज़रिए पहुँचाने का प्रयास (क़ुरआन 16:125), और बिरादरी पर हमला होने पर फ़ौजी बचाव का प्रयास (क़ुरआन 22:39)। सो जिहाद यूरोपीय दौर-ए-वुस्ता के मायनों में "धर्मयुद्ध" नहीं है : वह इनसाफ़ के लिए लगातार प्रयास है, जिसकी फ़ौजी सूरत एक ख़ास सूरत है जो सख़्ती से क़ायदे में बंधी है।

जिहाद / आतंकवाद का फ़र्क़, इस्लाम के आलिमों के हिसाब से

शामेला की बेस में इसी फ़र्क़ पर एक मुकम्ल अकादमी किताब मौजूद है (अल-जुज़ूर अत-तारीख़िया, किताब 1129) जो इस्तिलाहात ठहराती है : आतंकवाद बेगुनाह लोगों के ख़िलाफ़ आक्रमण है (उनके ख़ून, उनके दीन, उनके माल में) डर पैदा करने के लिए, जबकि जायज़ जिहाद आक्रमण पलटने और मज़लूमों की हिफ़ाज़त को निशाना बनाता है।

किताब दुनिया की फ़िक़ह अकादमी (राबिता, 16वें इजलास) की परिभाषा उद्धृत करती है जो आतंकवाद को दीन के ख़ुद के ख़िलाफ़ जुर्म ठहराती है। पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने युद्ध में स्त्रियों, बच्चों और दीनी लोगों को मारने से रोका (अबू दाऊद से मरवी) : यही नियम हर आतंकवाद को जिहाद से बाहर ठहराने के लिए काफ़ी है, क्योंकि कोई आतंकवादी इन नियमों का पाबंद नहीं होता।

आतंकवादी जो नहीं समझते

अतिवादी गिरोह युद्ध की आयतों को उनके संदर्भ से बाहर उद्धृत करते हैं ("तलवार की आयतें" का पृष्ठ उन्हें एक-एक करके संभालता है) और क़ुरआन के आम नियम को नज़रअंदाज़ करते हैं : "निःसंदेह जिसने किसी प्राणी की किसी प्राणी के खून (के बदले) अथवा धरती में विद्रोह के बिना हत्या कर दी, तो मानो उसने सारे इनसानों की हत्या कर दी" (क़ुरआन 5:32 और 2:190)।

वे यह भी नज़रअंदाज़ करते हैं कि पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) 13 साल तक मक्के में रहे बिना हथियारबंद जवाबी कार्रवाई के, कि लड़ाई की पहली इजाज़त बचावी थी (क़ुरआन 22:39), और कि आज आतंकवाद के पहले शिकार ख़ुद मुसलमान हैं। इस्लाम के आलिमों का, सब मज़ाहिब का, फ़ैसला बेलबस है : आतंकवाद शिर्क के बाद सबसे गंभीर जुर्म है, क्योंकि वह एक ऐसे दीन के नाम पर बेगुनाहों को मारता है जो खुले आम उन्हें मारने से रोकता है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न जिहाद और आतंकवाद

क्या क़ुरआन में "इरहाब" का लफ़्ज़ आतंकवाद को जायज़ ठहराता है ?

नहीं : क़ुरआन "तुरहिबून" (8:60) दुश्मन सेना के मुक़ाबले फ़ौजी हतोत्साहन के वास्ते इस्तेमाल करता है, आम नागरिकों पर दहशत के वास्ते नहीं। वही आयत अमन की ओर मुड़ती है : "और यदि वे (शत्रु) संधि की ओर झुकें, तो आप भी उसकी ओर झुक जाएँ" (क़ुरआन 8:61)। समकालीन फ़िक़ह अकादमियों ने आतंकवाद को "इरहाब" (नाजायज़ आक्रमण) का जुर्म ठहराया : अरबी लफ़्ज़ जुर्म को बयान करता है, जायज़ हतोत्साहन को नहीं।

क्या इस्लाम फैलाने के लिए कोई "आक्रामक जिहाद" मौजूद है ?

क़ुरआन दीन में ज़ोर-ज़बरदस्ती को साफ़ रोकता है (क़ुरआन 2:256) और कहता है : "और यदि आपका पालनहार चाहता, तो निश्चय धरती में रहने वाले सभी लोग ईमान ले आते" (क़ुरआन 10:99)। लड़ाई की इजाज़त सिर्फ़ बचाव में और मज़लूमों की हिफ़ाज़त के लिए है (क़ुरआन 22:39-40)। दीन का फैलना दलील और अच्छे चाल-चलन से होता है (क़ुरआन 16:125), कभी तलवार से नहीं।

स्रोत: क़ुरआन 22:39-40 · क़ुरआन 5:32 · क़ुरआन 2:190 · क़ुरआन 8:60-61 · किताब 1129 (अल-जुज़ूर अत-तारीख़िया, परिभाषाएँ)

के लिए अन्य चरण खंडन : इस्लाम के ख़िलाफ़ इलज़ामों के जवाब

आगे पढ़ें जिहाद और आतंकवाद

بسم الله الرحمن الرحيم बुध 9 जुमादा अल-अव्वल
الأربعاء 9 جمادى الأولى
أحدب متزايد बढ़ता हुआ कूबड़ दिन 10.1 / 29.5
रोशनी 77%
5 दिनों में पूर्णिमा
لا حول ولا قوة إلا بالله अल्लाह के बिना कोई शक्ति और सामर्थ्य नहीं

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद