होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या क़ुरआन बाइबिल से लिया गया है ?
आम क़िस्से नक़ल के उलट क्यों साबित होते हैं : एक ही स्रोत का दावा, जानबूझकर की गई दीनी दोबारा-लिखाइयाँ, और अनपढ़ पैग़ंबर।
नहीं। क़ुरआन ख़ुद अपने क़िस्सों का पिछली किताबों से नाता मानता है, लेकिन एक आम स्रोत से, नक़ल से नहीं : "और यह क़ुरआन ऐसा नहीं है कि अल्लाह के अलावा किसी और द्वारा घड़ लिया जाए, बल्कि यह उसकी पुष्टि करता है, जो इससे पहले है" (क़ुरआन 10:37)।
बुनियादी फ़र्क़ (बछड़ा हारून नहीं, सामिरी ने गढ़ा, सूली पर न चढ़ाया जाना, मूल पाप की मौजूदगी नहीं) जानबूझकर की गई दीनी दोबारा-लिखाइयाँ हैं जो कोई नक़लची पेश नहीं करता। और मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) न पढ़ते थे न लिखते थे : "और आप इससे पहले न कोई पुस्तक पढ़ते थे और न उसे अपने दाहिने हाथ से लिखते थे।" (क़ुरआन 29:48)।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयइस्लाम अपने क़िस्सों का तौरात और इंजील के क़िस्सों से नाता छुपाता नहीं : वह उसे उसी पैग़ंबरी सिलसिले से ताल्लुक की दलील के तौर पर मानता है। "और यह क़ुरआन ऐसा नहीं है कि अल्लाह के अलावा किसी और द्वारा घड़ लिया जाए, बल्कि यह उसकी पुष्टि करता है, जो इससे पहले है और किताब का विवरण (अर्थात् हलाल एवं हराम तथा धर्म के नियमों की व्याख्या) है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सारे संसारों के पालनहार की ओर से है।" (क़ुरआन 10:37)।
नक़ल और तस्दीक़ एक चीज़ नहीं : नक़ल दोहराती है, तस्दीक़ तस्दीक़ करती है, इस्लाह करती है और फ़ैसला करती है। क़ुरआन ख़ुद को ठीक ऐसे ही पेश करता है : वह आख़िरी पैग़ाम जो सिलसिले को मुहर लगाता है, कोई उधार ली गई बात नहीं।
नक़लची उतारता है ; मूलिग़ मक़सद के साथ दोबारा लिखता है।
मिसालें बड़ी हैं। सुनहरा बछड़ा : क़ुरआन हारून को पाक करता है, जिन पर बाइबिल में बुत गढ़ने का इलज़ाम है, और गुनाह सामिरी पर ठहराता है (क़ुरआन 20:85-97), पैग़ंबरी को हर बुत-परस्ती से महफ़ूज़ रखते हुए।
सूली पर चढ़ाया जाना : क़ुरआन उस बात से इनकार करता है कि यहूदियों ने मसीह को मार डाला (क़ुरआन 4:157), ईसाई दीन के केंद्रीय नुक़्ते को पलटते हुए। मूल पाप : आदम और हव्वा साथ गिरे और साथ तौबा करते हैं (क़ुरआन 7:23), कोई विरासती गुनाह पीढ़ियों से नहीं गुज़रता।
नूह का बेटा : अपनी कुफ़्र की वजह से डूब गया, बाइबिल में बचा लिया गया। इन फ़र्क़ों में से हर एक दीनी तौर पर वज़नदार और तौहीद की ओर मुस्तर्शद है : यह मूलिग़ की मुहर है, तर्जुमान की नहीं।
मुहम्मद (उन पर सलाम हो) न पढ़ते थे न लिखते थे : क़ुरआन यह बयान करता है ("और आप इससे पहले न कोई पुस्तक पढ़ते थे और न उसे अपने दाहिने हाथ से लिखते थे। (यदि ऐसा होता) तो असत्यवादी अवश्य संदेह करते।" (क़ुरआन 29:48-49)) और तारीख़ उसकी तस्दीक़ करती है : 6वीं सदी का मक्की सौदागर, बिना स्कूल और लिखाई-खाने के, बिना लाइब्रेरी वाले शहर में।
उधार का इलज़ाम क़ुरैश का ही था : "ये पहले लोगों की कहानियाँ हैं, जिन्हें उसने लिखवा लिया है। तो वही उसके सामने सुबह और शाम पढ़ी जाती हैं।" (क़ुरआन 25:5)। किताब मोहतवा पर जवाब देती है : अरबी ज़बानी क़िस्से, वे टुकड़े जो मुसाफ़िर सुन सकते थे, न सामिरी रखते थे, न पैग़ंबरियों की क़ुरआनी बुनावट, न उस अंदाज़ को जो शायरी के उस्तादों को चुनौती देता था।
मुसलमान पिछली किताबों को हीन नहीं समझता : वह उन्हें असली रवायत के तौर पर इज़्ज़त देता है और क़ुरआन को उनकी मुहर के तौर पर पढ़ता है। क़ुरआन उन एहले-किताब की तारीफ़ करता है जो चिंतन करते और ईमान लाते हैं (क़ुरआन 3:113-114), तौरात और इंजील को गवाहों के तौर पर थामने की दावत देता है (क़ुरआन 5:47-48, अपने दौर के फ़र्ज़ में), और सिलसिले के जारी रहने का नियम ठहराता है : एक ही पैग़ाम, नया किया गया और आख़िरी।
चोरी की बहस वैसे भी अक़्ल उलटी करती है : अगर क़ुरआन 100% मैच करता, तो भी उसी तरह इलज़ाम लगता ;
और अगर वह हटता है, तो कहते हैं "बेढंगी नक़ल"। ईमानदार मापदंड कहीं और है : नुस्ख़े की अंदरूनी साज़गार और उसकी ज़बानी चुनौती, जो बे-जवाब रही। बाइबिल और क़ुरआन का पृष्ठ दोनों किताबों की तफ़्सील से मुवाज़ना करता है।
क़ुरआन तौरात और इंजील को इलाही रवायत मानता है और उन लोगों को डाँटता है जो नुस्ख़े को अपने हाथ से बदलते हैं या उसका मतलब टेढ़ा करते हैं (क़ुरआन 2:79, 4:46)। इस्लामी मोक़िफ़ इस तरह पहली रवायत, जो इज़्ज़त की हक़दार है, और तारीख़ी तब्दीलियों को अलग करता है : मुसलमान को इन किताबों को हीन नहीं समझना, उसे वह आख़िरी पैग़ाम पढ़ना है जो उन्हें तस्दीक़ करता है और उनका फ़ैसला करता है।
क्योंकि वह उनकी नक़ल नहीं करते : हर क़िस्सा तौहीद की दीनी बुनियाद के इर्द-गिर्द दोबारा बनाया गया है। हारून बछड़े के गुनाह से पाक ठहराए गए हैं (बछड़ा सामिरी ने गढ़ा), किसी पैग़ंबर पर भारी गुनाह नहीं, सूली पर मसीह की मौत से इनकार किया गया है (क़ुरआन 4:157), हव्वा अकेली मज़्नूबी नहीं। नक़लची शब्द-दर-शब्द चलता है ; मूलिग़ गढ़ता है : क़ुरआनी क़िस्सों की बुनावट जानबूझकर की गई इस्लाह की है।
हाँ : मक्का शाम से सौदागरी करता था, पूर्वजों के क़िस्से ज़बानी घूमते थे, और ख़दीजा के चचेरे भाई वरक़ा इब्न नौफ़ल ईसाई थे। क़ुरआन इलज़ाम को दर्ज करता है और उसी का जवाब देता है : "ये पहले लोगों की कहानियाँ हैं, जिन्हें उसने लिखवा लिया है।" (क़ुरआन 25:5), जवाब अनपढ़ होने से और क़िस्सों के मोहतवा से।