होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या इस्लाम क़यामत जल्दी आने की भविष्यवाणी करता है ?
क़यामत का इल्म अल्लाह के हवाले, निशानियाँ और उनका संतुलित पढ़ना, तारीख़ बताने वालों की मलामत, और बोया जाने वाले पौधे की नीति।
इस्लाम सिखाता है कि अंत मौजूद है, मगर उसकी तारीख़ सिर्फ़ अल्लाह के पास है : "उसका ज्ञान तो मेरे पालनहार ही के पास है। उसे उसके समय पर वही प्रकट करेगा।" (क़ुरआन 7:187)। पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने कोई तारीख़ नहीं ठहराई और उलटी नीति सिखाई : "अगर क़यामत आ जाए और तुममें से किसी के हाथ में एक पौधा हो, तो उसे बो दो, अगर बो सको" (अहमद से मरवी)। किसी साल के लिए क़यामत का ऐलान नुस से लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ टकराता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन मसले को बंद कर देता है : "वे आपसे क़ियामत के विषय में पूछते हैं कि वह कब घटित होगी? कह दें कि उसका ज्ञान तो मेरे पालनहार ही के पास है। उसे उसके समय पर वही प्रकट करेगा।" (क़ुरआन 7:187)। पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) हज़ार बार पूछे जाने पर हमेशा इसी दायरे में जवाब देते थे : वे निशानियाँ बयान करते थे, तारीख़ कभी नहीं। हर गिनती वाली पेशगोई, कल हो या आज, इसी आयत से टकराती है : जो 2030 के लिए क़यामत बताए, वह वह़्य से ज़्यादा जानने का दावा करता है, और यही इख़्तिलाफ़ उसकी मलामत के लिए काफ़ी है।
इशरात का मजमूआ छोटी निशानियाँ (अख़लाक़ी, समाजी) और बड़ी निशानियाँ (दज्जाल, ईसा का लौटना, सूरज का मग़रिब से निकलना) बयान करता है, बिना किसी समय-पैमाने के। 8वीं सदी से हर मुसलमान नस्ल ने अपना दौर उनमें पहचाना : इसलिए कि अख़लाक़ी निशानियाँ दौर-दौर में लौटती हैं और तारीख़-बंद वाक़ियात मौजूद नहीं। तालीम का सबक़ हमेशा की होशियारी है, ख़ौफ़-अंगेज़ी नहीं : क्या ईसा दोबारा आएँगे ? का पृष्ठ सबसे दस्तावेज़ी बड़ी निशानी संभालता है।
क़यामत के जुनून का नबवी जवाब एक खेती वाला अमल है : "अगर क़यामत आ जाए और तुममें से किसी के हाथ में एक पौधा हो, तो उसे बो दो, अगर बो सको" (अहमद से मरवी)। मुसलमान अपनी आख़िरी साँस तक दुनिया बनाता है : बोना, सिखाना, खिलाना, तामीर करना।
जिस दीन की आख़िरी तालीम हिसाब के लम्हे पर बोया गया पेड़ हो, वह अंत की पूजा नहीं : वह मतलब की पूजा है, जो अंत को देखती है और कभी काम करना नहीं छोड़ती। क्या सभी ग़ैर-मुसलमान जहन्नम में जाएँगे ? का पृष्ठ ख़ुद हिसाब संभालता है, और आख़िरी वादा : "उस दिन कई चेहरे तरो-ताज़ा होंगे। अपने पालनहार की ओर देख रहे होंगे।" (क़ुरआन 75:22-23)।
निशानियों का मजमूआ मौजूद है (अख़लाक़ी और वाक़ियाती), और हर नस्ल ने ख़ुद को उनमें पहचाना : यही वजह है कि कोई निशानी तारीख़-बंद नहीं। तालीम मौजूदा ख़बरों के पढ़ने की बजाय हमेशा की होशियारी सिखाती है : कल मरने जैसी तैयारी करो, और दुनिया क़ायम रहने जैसा काम करो।
ज़्यादा जोश या सुनने वालों को लुभाने की वजह से : उनकी तारीख़ें गुज़र जाती हैं, उनका जमावड़ा मुँह फेर लेता है, और तालीम बाक़ी रहती है। हर तारीख़-बंद पेशगोई 7:187 की आयत से टकराती है जो इल्म अल्लाह के हवाले करती है : नुस का पैरवी करने वाला मुसलमान उसमें कुछ जोड़ने से इंकार करता है।
बड़ी निशानियाँ (दज्जाल, ईसा का लौटना, सूरज का मग़रिब से निकलना) हाश्र, हिसाब और दो ठिकानों से पहले आती हैं : ईसा के लौटने का पृष्ठ इनमें से एक संभालता है। मुसलमान क़यामत तबाही का अपोकलिप्स नहीं : वह हिसाब की तरफ़ गुज़रना है, जहाँ अल्लाह की रहमत बंदों के अमल से मिलती है।