होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या सभी ग़ैर-मुसलमान जहन्नम में जाएँगे ?
ईमानदार जवाब : क़ुरआन जन्नत का वादा उन लोगों से करता है जो ईमान लाएँ और अच्छे काम करें, जान-बूझकर इनकार करने वालों के फ़ैसले की ख़बर देता है, और हर शख़्स का मक़ाम सिर्फ़ अल्लाह के हवाले करता है, इक पक्के क़ाइदे के साथ : रसूल आने से पहले किसी क़ौम पर अज़ाब नहीं।
क़ुरआन इक ऐसा क़ाइदा तय करता है जिस पर कोई मुफ़स्सिर बहस नहीं करता : मुतअल्लिक़ क़ौम की तरफ़ रसूल भेजे बिना कोई अज़ाब नहीं (क़ुरआन 17:15)। आयत 2:62 पर मुफ़स्सिरीन दो किराअत मरवा करते हैं : क्लासिकी उलमा में ग़ालिब किराअत उसे उन लोगों तक महदूद करती है जो पैग़ंबर की नुबुव्वत से पहले ईमान लाए, या जिनके ईमान में पैग़ंबर शामिल था (पैग़ंबर के बाद क़ुरआन 3:85 दरवाज़ा बंद करता है) ;
इक नादिर किराअत उसे हर जमाअत की सच्चाई के लिए आम क़ाइदा पढ़ती है। और हर सूरत में, हर शख़्स का मक़ाम अल्लाह के फ़ैसले का है, मुसलमानों की ग़ैबना-गोई का कभी नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयनुस सच्चे ईमान और नेक अमल को अज्र का वादा करता है : "निःसंदेह जो लोग ईमान लाए, और जो यहूदी बने, तथा ईसाई और साबी, जो भी अल्लाह तथा अंतिम दिन पर ईमान लाएगा और अच्छे कर्म करेगा, तो उनके लिए उनका प्रतिफल उनके पालनहार के पास है और उनपर न कोई डर है और न वे शोकाकुल होंगे।" (क़ुरआन 2:62)।
मुफ़स्सिरीन उसके लागू होने पर हमेशा से बहस करते हैं : क्लासिकी उलमा में ग़ालिब किराअत (तबरी जो इब्ने अब्बास की रिवायत मरवा करते हैं, इब्ने कसीर और मुफ़स्सिरीन की सिलसिला) उसे उन लोगों तक महदूद करती है जो पैग़ंबर की नुबुव्वत से पहले ईमान लाए, या इक ऐसे ईमान पर जिसमें पैग़ंबर शामिल हो, क़ुरआन 3:85 के साथ जो उनके बाद किसी और धर्म के लिए दरवाज़ा बंद करता है ;
इक नादिर किराअत उसे हर जमाअत की सच्चाई के लिए आम क़ाइदा पढ़ती है। यह बहस क़दीम, दस्तावेज़ी और मंज़ूर-ए-शुदा है : जो यह पृष्ठ नहीं कर सकता वह उस्तादों की जगह फ़ैसला करना है।
जो बहस से बाहर है : ज़िम्मेदारी का क़ाइदा। "और हम (किसी को) यातना नहीं देते, जब तक कि कोई रसूल न भेज दें।" : अज़ाब को बज़बत पहुँचा हुआ पैग़ाम चाहिए। यही क़ाइदा पूरे सवाल की बुनियाद है : कोई इंसान उस पैग़ाम पर फ़ैसला नहीं होता जो उसे कभी मिला ही नहीं, और हर शख़्स की सच्चाई सिर्फ़ अल्लाह जानता है।
क़ुरआन मुसलमानों से दूसरों के मक़ाम की भविष्यवाणी का हक़ छीनता है : दिलों, सच्चाई और हर इंसान की असली मअलूमात का फ़ैसला इलाही मख़्सूस है।
इस्लामी तारीख़ ऐसे उलमा दस्तावेज़ करती है जो सवाल "यह इंसाफ़-पसंद ईसाई जहन्नम में जाएगा ?" का जवाब अल्लाह के फ़ैसले की तरफ़ इशारे से ज़्यादा कुछ देने से इनकार करते थे, और आज के बड़े सुन्नी इदारे वही ग़ुरेज़ सिखाते हैं : पैग़ाम पहुँचाओ, लोगों की इज़्ज़त करो, और मक़ाम क़यामत के दिन के हवाले करो।
जिंदगी का क़ाइदा वही रहता है जिससे जंग न करे उसके साथ इंसाफ़ और भलाई : "अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों से अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला।" (क़ुरआन 60:8)।
पूरा मामला इक वाज़िह ढाँचा बनता है : आलमगीर पैग़ाम की घोषणा (क़ुरआन 34:28), ईमान की पूरी आज़ादी (क़ुरआन 2:256), मअलूमात से मुशरत ज़िम्मेदारी (क़ुरआन 17:15), 2:62 के लागू होने पर मंज़ूर-ए-शुदा मुफ़स्सिरी बहस (क्लासिकी उसे महदूद करते हैं, इक नादिर आम पढ़ती है), जान-बूझकर इनकार की तहज़ीर, और आख़िरी फ़ैसला सिर्फ़ अल्लाह के लिए।
यह ढाँचा "मुसलमान सारे ग़ैर-मुसलमानों को जहन्नम में फेंकते हैं" वाले क्लिशे की उलटी बात है : यह संजीदा तौहीद है, अपनी गंभीरता और अपनी नम्रती के साथ। क्या इस्लाम ग़ैर-मुसलमानों से नफ़रत करता है ? का पृष्ठ लोगों के साथ सलूक संभालता है, और इस्लाम और धर्म की स्वतंत्रता का पृष्ठ ईमान की आज़ादी।
मुफ़स्सिरीन दो किराअत मरवा करते हैं। क्लासिकी उलमा में ग़ालिब किराअत उसे महदूद करती है : तबरी इब्ने अब्बास की रिवायत मरवा करते हैं "जिन्होंने उनसे पहले ईमान लाया", और इब्ने कसीर आयत के ईमान को तमाम अंबिया में ईमान, मुहम्मद समेत, तक महदूद करते हैं, क़ुरआन 3:85 के तअल्लुक़ से। इक दूसरी किराअत, नादिर, उसे हर जमाअत की सच्चाई के लिए आम क़ाइदा पढ़ती है जो उस जमाअत तक बज़बत पहुँचा हो। यह बहस क़दीम और मंज़ूर-ए-शुदा है। जो नहीं बदलता : अज्र सच्चे ईमान और अमल के साथ है, और उसका आख़िरी लागू होना अल्लाह का है।
क़ुरआनी क़ाइदा पक्का है : पहले रसूल भेजे बिना कोई अज़ाब नहीं (क़ुरआन 17:15)। उलमा ने इससे बे-पैग़ाम लोगों का मक़ाम निकाला (7वीं सदी के ग़ैर-इंजीली महाद्वीप, बिना मअलूम नबी के क़ौमें) : उनका फ़ैसला अल्लाह करेगा, उस हिसाब से कि उन तक बज़बत क्या पहुँचा और उनकी दाख़िली सच्चाई क्या थी। इस्लाम में किसी को हक़ नहीं कि वह इक लफ़्ज़ की बुनियाद पर अरबों इंसानों को जहन्नम में फेंक दे।
नहीं : दिलों का फ़ैसला इलाही मख़्सूस है। मुसलमान वही ऐलान करता है जो क़ुरआन करता है (ईमानदारों को वादा, मअलूमत के बाद जान-बूझकर इनकार को तहज़ीर), और किसी के मक़ाम की भविष्यवाणी से गुज़रता है : क़ुरआन तो उन लोगों को भी मलामत करता है जो अपने ही हम-मज़हबों को जहन्नमी कहते हैं। हर किसी के साथ मुसलमान का क़ाइदा : इंसाफ़ और भलाई (क़ुरआन 60:8), और बाक़ी क़यामत के दिन का है।