होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या मुहम्मद दौलतमंद होकर दुनिया से गए ?
पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) की मीरास का हाल : एक ज़रह 30 पैमाने जौ के बदले गिरवी रखी, ज़िंदगी में ज़मीनें ख़ैरात में दे दी गईं, और कोई माल वारिसों को नहीं मिला।
नहीं : मुहम्मद (उन पर सलाम हो) उस हाल में दुनिया से गए कि उनकी ज़रह एक यहूदी के यहाँ 30 पैमाने जौ के बदले गिरवी रखी थी (बुख़ारी से मरवी), वारिसों को देने वाला एक दीनार या दिरहम नहीं था। उनके हाथों से गुज़रने वाली आमदनी (ग़नीमतें, तोहफ़े, ख़ैबर और फ़दक की ज़मीनें) ज़िंदगी में ही सरकारी ख़र्चों और ख़ैरात में बाँट दी गईं, और उनकी बेटी फ़ातिमा को उन्हीं की फ़रमाबर्द के मुताबिक़ कोई विरासत नहीं दी गई : हम कोई विरासत नहीं छोड़ते। जो इंसान पूरी अरब का सरदार बनकर गया, वह अपनी मरज़ी से ग़रीब रहकर गया।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयपैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की दौलत पर सबसे साफ़ दस्तावेज़ उनका आख़िरी ज़िंदगी का बिलान है : "पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) उस हाल में दुनिया से गए कि उनकी ज़रह एक यहूदी के यहाँ 30 पैमाने जौ के बदले गिरवी रखी थी" (बुख़ारी से मरवी)। एक मुत्तहिद रियासत का सरदार, फ़ातेह फ़ौज का कमांडर, वह इंसान जिसकी तरफ़ पूरी अरब के तोहफ़े बहते थे, अपनी ज़रह पर जौ के क़र्ज़ के साथ गया। तारीख़ का कोई मुताबिक़ फ़ातेह करने वाला ऐसे बिलान पर नहीं गया : इलज़ाम का जवाब एक साहूकार के यहाँ रखी चीज़ में मौजूद है।
हुदैबिया की सुलह और फिर फ़तह के बाद बहती आमदनी बहुत बड़ी हो गई : मुनज़्ज़म ग़नीमतें (रियासत का पाँचवाँ हिस्सा, इस्लाम में युद्ध-बंदियाँ का पृष्ठ उनकी तफ़्सील बयान करता है), हुक़्मरानों के तोहफ़े (मिस्र, फ़ारस), ख़ैबर और फ़दक की ज़मीनों की आमदनी जिन्हें उन्होंने ज़िंदगी में ही वफ़ादार बिरादरियों के सफ़र और मुक़ातिलों के ख़ानदानों के लिए मख़्सूस किया।
सब कुछ आते-जाते बाँटा गया : नबवी इंतिज़ाम बहते पानी की नहर की तरह चलता था, तिजोरी (ख़ज़ाना) की तरह नहीं। उनके दुनिया से जाने पर ज़ाती तिजोरी ख़ाली थी, और उनका घराना अगले महीनों में सहाबा की मदद से गुज़ार करता रहा।
मामला उनकी बेटी फ़ातिमा के साथ बंद होता है, जो ज़मीनों का अपना हिस्सा माँगने आईं : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने जवाब दिया कि पैग़ंबर कोई विरासत नहीं छोड़ते, जो बचता है वह ख़ैरात है (बुख़ारी से मरवी), और उन्होंने मान लिया। अबू बक्र, उनके जानशीन, ने मरने वाले के घराने के मामले में वही उसूल लागू किया।
यह उसूल बाक़ी सब के साथ मुताबिक़ है : जो इंसान कहता था कि सबसे बेहतर इंसान वह है जो दूसरों की ख़िदमत करे (किताबों में मरवी), उसने अपनों के लिए मोक़ा नहीं बनाया। नबवी विरासत वापस लाने की कुछ लोगों की कोशिशें ख़ुद ख़ुलफ़ा ने नाकाम कीं।
पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की परहेज़गारी सदाबहार मुख़्तार की गई थी, उनके अपने घर के दस्तावेज़ी : आयशा लगातार महीने बयान करती हैं जब चूल्हा नहीं जला, घराना पानी और खजूर पर रहा (मुस्लिम से मरवी), और बिस्तर की बुनी हुई चटाई जो उठने पर जिस्म पर निशान छोड़ देती थी। उमर ने, उन्हें जिस्म पर निशान छोड़ने वाली चटाइयों पर नमाज़ पढ़ते देखा, उनसे कहा कि फ़ारस और रूम के बादशाहों को जिन्हें उन्होंने हराया बराबर करो ;
जवाब हुआ : उन्होंने दुनिया मुख़्तार की, हमने आख़िरत मुख़्तार की (किताबों में मरवी)। दौलत का इलज़ाम हक़ाइक़ पर गिर जाता है : जिस इंसान ने 10 साल में अरब मुत्तहिद किया, वह गिरवी रखी ज़रह लेकर गया, और उसने ऐसा होना ही मुख़्तार किया। क्या मुहम्मद ने झूठ बोला ? का पृष्ठ उनकी अमानतदारी पर जवाब देता है, यह उनके हिसाब के बाक़ी पर।
संभालते थे, और यही उलटी दलील है : ग़नीमतें और बादशाहों के तोहफ़े उनके हाथों से गुज़रते थे और वह जैसे-जैसे आते थे बाँट देते थे (शहीदों के घराने, ग़रीब, वफ़ादार बिरादरियाँ, आज़ाद किए जाने वाले ग़ुलाम)। जो इंतिज़ामी अपने दुनिया से जाने पर ख़ाली हिसाब लौटाए वह दौलत जमाने वाला नहीं : वह वही ख़ज़ांची है जिसने सब कुछ दौरे में डाल दिया।
क्योंकि ख़ैबर और फ़दक की ज़मीनें उनकी ज़िंदगी में ही सरकारी ख़र्चों (वफ़ादार बिरादरियों के सफ़र, मुक़ातिलों के ख़ानदान) के लिए मख़्सूस हो चुकी थीं, जैसा पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने अपना हिस्सा माँगने आई बेटी से बयान किया : हम कोई विरासत नहीं छोड़ते, जो हम छोड़ें वह ख़ैरात है (बुख़ारी से मरवी)। फ़ातिमा ने मान लिया : उसूल हर पैग़ंबर के लिए एक जैसा था।
सख़्त ज़रूरत के हिसाब से, मुख़्तार से : आयशा लगातार महीने बयान करती हैं जब घर में चूल्हा नहीं जला (मुस्लिम से मरवी), नींद में जिस्म पर निशान छोड़ने वाली चटाई, पानी और खजूर आम गुज़ारा। मुत्तहिद अरब का सरदार अपने बहुत से सहाबा से नीचे के दरजे में गुज़ार करता था।