होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या क़ुरआन में विरोधाभास हैं ?
क़ुरआन की चुनौती : "यदि वह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत-सा अंतर्विरोध (असंगति) पाते।" (क़ुरआन 4:82)। बताए गए "विरोधाभास" संदर्भ के फ़र्क़, इज़ाफ़े, या साफ़ नस्ख हैं।
क़ुरआन चुनौती देता है : "यदि वह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत-सा अंतर्विरोध (असंगति) पाते।" (क़ुरआन 4:82)। बताए गए "विरोधाभास" 3 क़िस्म के हैं : संदर्भ के फ़र्क़, इज़ाफ़े, और साफ़ नस्ख (क़ुरआन 2:106)। कोई भी अक़्ली ख़ुद-विरोध नहीं ठहरता।
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 1 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन मापदंड ठहराता है : "यदि वह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत-सा अंतर्विरोध (असंगति) पाते।" (क़ुरआन 4:82)। यह इम्तिहान ग़लत साबित किया जा सकता है : अगर क़ुरआन अपने आप से टकराता, तो उसका अल्लाह की ओर से होना रद्द हो जाता। चौदह सदियों की तहक़ीक़ ने कोई साबित अक़्ली विरोधाभास पेश नहीं किया।
3 श्रेणियाँ : संदर्भ के फ़र्क़ (मक्का और मदीना), इज़ाफ़े (एक आयत एक तफ़्सील देती है, दूसरी दूसरी), और साफ़ नस्ख (क़ुरआन 2:106)। यह विरोधाभास नहीं : यह मरहला-दर-मरहला तशरीअ है। क़ुरआन की हिफ़ाज़त ख़ुद एक मौजूदा हक़ीक़त है : "निःसंदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारी है और निःसंदेह हम ही इसकी अवश्य रक्षा करने वाले हैं।" (क़ुरआन 15:9)।
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