होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या मुहम्मद ने अपने आलोचकों को मरवाया ?
फ़ाइल आम तसव्वुर से ज़्यादा पेचीदा है : एक मरवी जंगी मामला (काब बिन अशरफ़, जो मदीना के मुक़ाबले फ़ौज भड़काता था), कवियों वाले क़िस्से जो सिर्फ़ एक देर स्रोत कमज़ोर सनद के साथ मरवी करता है, और मदीना की असली हक़ीक़त जहाँ ज़िंदा मज़ाक उड़ाने वाले आम नियम थे।
फ़ाइल दो जमातें अलग करती है। काब बिन अशरफ़ पूरी जंग के दरमियान क़त्ल किए गए, इसके बाद कि उन्होंने खुले तौर पर मदीना की तबाही की दावत दी और मदीना के मुक़ाबले महासार को दौलत दी : यह बुख़ारी (4037) में मरवी जंगी वाक़िया है, किसी अशआर का हिसाब-किताब नहीं।
असमा बिनत मरवान और अबू आफ़क वाले क़िस्से सिर्फ़ इब्न इसहाक़ से आते हैं, ऐसी सनदों के साथ जिन्हें इल्म-ए-हदीस कमज़ोर कहता है : वे दलील नहीं बनते। उलटी तरफ़, मदीना के ज़िंदा मज़ाक उड़ाने वाले और मुख़ालिफ़ कई थे और कभी छुए नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयकाब बिन अशरफ़ मदीना की नामवर शख़्सियत, कवि और दौलतमंद सौदाग़र थे, जो बद्र की लड़ाई के बाद हथियारबंद भड़काव में उतर गए : वह इंतिक़ाम के अशआर गढ़ते और मदीना के मुक़ाबले महासार गरमाने के लिए मक्का जाते। बुख़ारी बिसात (शुरुआती वजह) मरवी करता है : "Man li-Ka'b ibn al-Ashraf, fa-innahu qad adha Allaha wa-rasulah" : काब बिन अशरफ़ से मेरी मुक़्ती कौन करेगा? उसने अल्लाह और उसके रसूल को कष्ट पहुँचाया है।
मुहम्मद बिन मसलमा उठे और बोले : क्या आप चाहेंगे कि मैं उसे क़त्ल कर दूँ? जवाब मिला : हाँ (बुख़ारी 4037 से मरवी)। जंग का सरदार उसे बेअसर करता है जो उसके शहर की तबाही के लिए महासार खड़ा करे : यही जंग का हक़ है जैसी तरह सभी तहज़ीबों ने अमल किया, राय की सेंसरशिप नहीं।
पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा क़ौल किए जाने वाले दोनों क़िस्से एक अकेले स्रोत से आते हैं : इब्न इसहाक़ की सीरत (150 हिजरी में इंतक़ाल), जो उन्हें ऐसी सनदों के साथ मरवी करती है जिन्हें इल्म-ए-हदीस कमज़ोर कहता है, जिनमें एक अकेला रावी भी है जिसे इल्म-ए-रिजाल के नक़ाद तनक़ीद करते हैं। न बुख़ारी में वे हैं, न मुस्लिम में, न किसी सहीह मानी गई बड़ी किताब में। इस्लामी तारीख़ की मेथड कमज़ोर सनद वाले अख़बार पर इल्ज़ाम बनाने से मना करती है : ये क़िस्से बहस के मवजू तारीख़ी फ़ुक़हे रहते हैं, साबित दलीलें नहीं।
मदीना की मरवी हक़ीक़त ख़ूनी सेंसरशिप वाले आम तसव्वुर को झुठलाती है : मुनाफ़िक़ों का सरदार, अब्दुल्लाह बिन उबय, ने एक दहाई तक तबाही मचाया, मज़ाक उड़ाया और ग़द्दारी की, और वह अपने बिस्तर पर क़ुदरती मौत से दुनिया से गया।
सतायर लिखने वालों ने इस्लाम के मुक़ाबले अपने अशआर जारी रखे बिना छुए, और पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने ज़िंदा छोड़ दिए जिन तक जंगी इन्साफ़ नहीं पहुँचता था। ताइफ़ में, उस शहर जिसने उन्हें लहूलुहान कर दिया था, उन्होंने फ़रिश्ते की पेशकश ठुकरा दी कि दो पहाड़ों को बस्तियों पर ढहा दे, इस उम्मीद पर कि उनकी औलाद ईमान लाएगी (मुस्लिम 1795 से मरवी)।
क़ुरआन मज़ाक उड़ाने वालों के मुक़ाबले का रुख़ दो मेथड वाली आयतों में मुकर्रर करता है : "जब आप उन लोगों को देखें, जो हमारी आयतों के विषय में (उपहास के साथ) बात करते हैं, तो उनसे मुँह फेर लें, यहाँ तक कि वे उसके अलावा बात में लग जाएँ" (क़ुरआन 6:68), और "अल्लाह ने तुम्हारे लिए अपनी पुस्तक में (यह आदेश) अवतिरत किया है कि जब तुम सुनो कि अल्लाह की आयतों का इनकार किया जा रहा है तथा उनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है, तो ऐसा करने वालों के साथ न बैठो, यहाँ तक कि वे दूसरी बात में लग जाएँ। अन्यथा तुम भी उन्हीं जैसे हो जाओगे।" (क़ुरआन 4:140)।
कष्ट पहुँचाने की सज़ा लोगों के हवाले नहीं : "निःसंदेह जो लोग अल्लाह तथा उसके रसूल को कष्ट पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन्हें दुनिया एवं आखिरत में धिक्कार दिया है और उनके लिए अपमानकारी यातना तैयार की है।" (क़ुरआन 33:57)। क्या इस्लाम ईश-निंदकों की हत्या का आदेश देता है ? का पृष्ठ बुनियादी नियम देता है, और बनू क़ुरैज़ा सबसे ज़्यादा क़ौल किया जाने वाला जंगी मामला।
क़िस्सा सिर्फ़ इब्न इसहाक़ की सीरत में मौजूद है, ऐसी रवायत वाली सनद के साथ जिसे इल्म-ए-हदीस के उस्ताद कमज़ोर कहते हैं (अकेला और तनक़ीदशुदा रावी), और वह सहीह हदीस संग्रहों में मौजूद नहीं। हदीस के संजीदा माहिरीन इस अख़बार पर कोई नियम या इल्ज़ाम नहीं बनाते : उसकी असालत इतनी बहस का मवजू है कि कुछ शोधकर्ता शख़्स के वजूद पर तक शक करते हैं।
काब मदीना की यहूदी नामवर शख़्सियत थे जो हथियारबंद भड़काव में उतर गए : बद्र की लड़ाई के बाद वह मक्का के मरने वालों का इंतिक़ाम और मदीना पर कूच का ख़ुला अशआर गढ़ते और महासार को दौलत देने के लिए मक्का जाते। खुले हथियारबंद टकराव में शहर की तबाही की दावत जंगी अमल है : उसे "अपने ख़यालों पर क़त्ल किया गया आलोचक" कहना माहौल से मुँह मोड़ना है।
वे जीते रहे। मुनाफ़िक़ों का सरदार, जो ज़िंदगी भर तबाही मचाता और मज़ाक उड़ाता रहा, कभी नहीं छुआ और क़ुदरती मौत से दुनिया से गया ; सतायर लिखने वालों ने अपने अशआर जारी रखे और मदीना के शहरी बने रहे ; पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने ताइफ़ के लिए दुआ की, वही शहर जिसने उन्हें लहूलुहान कर दिया था। क़ुरआनी नियम मज़ाक उड़ाने वालों से दूरी का है, उनकी सज़ा-ए-मौत का नहीं : कष्ट पहुँचाने की सज़ा अल्लाह के हवाले है।