होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या इस्लाम ईश-निंदकों की हत्या का आदेश देता है ?
क़ुरआन तोहमत लगाने वालों का फ़ैसला अल्लाह के हवाले करता है, पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने मज़ाक उड़ाने वालों को सहा और माफ़ किया, और बहसों में गिनाई गई मौत के मामले जंगी ग़द्दारी के मामले हैं।
नहीं।
क़ुरआन दीन की इज़ा (ईश-निंदा) के लिए कोई दुनियावी सज़ा ठहराता नहीं : वह इज़ा देने वालों की मलामत अल्लाह के लिए छोड़ता है ("निःसंदेह जो लोग अल्लाह तथा उसके रसूल को कष्ट पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन्हें दुनिया एवं आखिरत में धिक्कार दिया है और उनके लिए अपमानकारी यातना तैयार की है।", क़ुरआन 33:57) और मयार वाला जवाब या सब्र की तालीम देता है : "और यदि तुम बदला लो, तो उतना ही बदला लो जितना तुम्हें कष्ट पहुँचाया गया है। और निःसंदेह यदि तुम सब्र करो तो निश्चय वह सब्र करने वालों के लिए बेहतर है।" (क़ुरआन 16:126)।
मुहम्मद (उन पर सलाम हो) ने 13 साल तोहमतें सहीं और एक भी मज़ाक उड़ाने वाले को कत्ल नहीं किया, मज़ाह (सतायर) लिखने वाले काब बिन ज़ुहैर को माफ़ किया और मस्जिद में पेशाब करने वाले बदू को हिफ़ाज़त में लिया।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन एक बार भी यह नहीं कहता : इज़ा देने वाले को सज़ा दो। वह काम बाँटता है : "निःसंदेह जो लोग अल्लाह तथा उसके रसूल को कष्ट पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन्हें दुनिया एवं आखिरत में धिक्कार दिया है और उनके लिए अपमानकारी यातना तैयार की है।" (क़ुरआन 33:57) : दीनी इज़ा की सज़ा इज़ा हुए मालिक की है, बंदों की नहीं।
और वह इज़ा खाए शहरी का उसूल ठहराता है : "और यदि तुम बदला लो, तो उतना ही बदला लो जितना तुम्हें कष्ट पहुँचाया गया है। और निःसंदेह यदि तुम सब्र करो तो निश्चय वह सब्र करने वालों के लिए बेहतर है।" (क़ुरआन 16:126)। सब्र को उसी नुस में बेहतर ठहराया गया है जो बराबर जवाब की इजाज़त देता है : यही छत है, और वह कत्ल से बहुत दूर है।
मक्के में मुहम्मद (उन पर सलाम हो) को जादूगर, पागल शायर, काहिन कहा गया और दुश्मनों ने उनके ख़िलाफ़ अशआर गढ़े : उन्होंने जवाब दावत से दिया, कभी कत्ल से नहीं। मदीना में मज़ाह लिखने वाले काब बिन ज़ुहैर, जिनके अशआर सख़्त थे, आए, इस्लाम लाए और अपना क़सीदा बानत सुआद पढ़ा : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने अपनी चोगा (रिदा) उन्हें इनाम में डाल दिया (सीरत में दस्तावेज़ी)।
और मस्जिद में पेशाब करने वाले बदू को गुस्साए सहाबा से हिफ़ाज़त में लिया गया, पेशाब धोया गया, आदमी को नरमी से समझाया गया (बुख़ारी से मरवी)। यही ईश-निंदा की सुन्नत है : मयार वाला जवाब, हमेशा खुला दरवाज़ा, फ़ैसला अल्लाह के लिए महफ़ूज़।
बहसें बिना पेश-मनज़र कत्लों की लड़ी लगाती हैं : दस्तावेज़ी मामले जंग के मामले हैं। काब बिन अशरफ़ बद्र के बदले मातम और इंतिक़ाम के अशआर गढ़ता और महासार में दुश्मन से राब्ता रखता था : वह मुख़ालिफ़ नहीं, चालू दुश्मन मुक़ातिल की तरह सुलझाया गया।
बाक़ी गिनाए गए मामले उसी ढाँचे में हैं : महासार के दौर में अहद की ख़ियानत, कत्ल की दावत, दुश्मन की तरफ़ फ़रारी। इस्लामी क़ानून का पैमाना जंगी अमल है, राय नहीं : बनू क़ुरैज़ा का पृष्ठ इनमें से सबसे बड़े मामले को सुलझाता है, और क्या पैग़ंबर ने आक्रमणकारी युद्ध किए ? का पृष्ठ आम ढाँचा बयान करता है।
ईश-निंदा के इलज़ाम पर भीड़ या फ़र्द के कत्ल इस्लाम की बड़ी उलमाई इंतिज़ामियों से मलामत किए जाते हैं, जो उसूल याद दिलाते हैं : सज़ा किसी फ़र्द के पास नहीं, दिलों का फ़ैसला अल्लाह का है, और इलज़ाम पर इंसान की ज़िंदगी नहीं ली जाती। तोहमत से ज़ख़्मी हुआ मुसलमान किताब के ठहराए हुए 3 क़दमों का प्रोग्राम रखता है : सब्र जो बेहतर ठहराया गया, हिकमत और अच्छी नसीहत से जवाब, और इज़ा देने वाले को बेहतर चीज़ की तरफ़ बुलावा।
मज़ाक उड़ाए गए के नाम पर कत्ल उसके तरीक़े की सबसे बड़ी ख़ियानत है। क्या इस्लाम ग़ैर-मुसलमानों से नफ़रत करता है ? का पृष्ठ आपसी जीवन की तस्वीर मुकम्मल करता है।
गिनाए गए मामले (जैसे काब बिन अशरफ़) जंग के दौर की ग़द्दारी के मामले हैं : बिरादरी के कत्ल की दावत, महासार में दुश्मन से राब्ता, अहद का टूटना। ये जंगी जुर्म हैं जो उसी तरह सुलझाए गए, पकड़ी गई राय नहीं : बनू क़ुरैज़ा का पृष्ठ इन मामलों की मेकानिक तफ़्सील से बयान करता है। जो शहरी कत्ल की दावत के बिना आलोचना करे, वह इनमें से किसी मामले में नहीं आता।
वे अलग-अलग मुल्कों के आधुनिक क़ानूनी निर्माण हैं, अपने औज़ारों के साथ (रियासती सज़ाएँ, तरीक़े), और मुसलमान उलमा भी उनकी आलोचना करते हैं जब दीन को हिसाब-किताबों की तरफ़ इस्तेमाल किया जाए। दीन जो ठहराता है, वह इज़ा देने वाले का अंजाम अल्लाह के हाथों में है और शहरी का उसूल : सब्र या बराबर जवाब, कभी कत्ल की निगरानी नहीं।
क़ुरआन के तरीक़े से : कार्टून को बात-चीत से ठुकराना, सिविली बहिश्क़ार (बॉयकॉट), जिस शख़्स की इज़ा की जाए उसकी मारिफ़त से जवाब, और वह सब्र जो बेहतर है। पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने तौबे करके आए मज़ाकीओं को माफ़ किया और कभी अपने अशआर पर किसी मज़ाकिये को कत्ल नहीं किया : मज़ाक उड़ाए गए के नाम पर कत्ल उसके तरीक़े की सबसे बड़ी ख़ियानत है।