होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या बाइबिल में मुहम्मद की आमद की ख़ुशख़बरी है ?
क़ुरआन बयान करता है कि मुहम्मद का ज़िक्र पुराने ग्रंथों में है : यह क़ुरआनी दलील है, ईमान की बुनियाद नहीं। बज़बत पहचानें (व्यवस्थाविवरण, यूहन्ना) मुसलमानों की क्लासिकी पढ़ाइयाँ हैं, बहस-ख़ीज़ और ग़ैर-ज़रूरी।
क़ुरआन ख़ुद बयान करता है : "तथा याद करो जब मरयम के पुत्र ईसा ने कहा : ऐ इसराईल की संतान! निःसंदेह मैं तुम्हारी ओर अल्लाह का रसूल हूँ, उस तौरात की पुष्टि करने वाला हूँ, जो मुझसे पहले आई है तथा एक रसूल की शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो मेरे बाद आएगा, जिसका नाम अहमद है।" (क़ुरआन 61:6), "जो लोग उस रसूल का अनुसरण करते हैं, जो उम्मी नबी है, जिसे वे अपने पास तौरात तथा इंजील में लिखा हुआ पाते हैं" (क़ुरआन 7:157), और "तथा निःसंदेह यह निश्चित रूप से पहले लोगों की पुस्तकों में मौजूद है।" (क़ुरआन 26:196)।
आज के बाइबिली नुस्ख़ों में बज़बत की गई पहचानें मुसलमानों की क्लासिकी पढ़ाइयाँ हैं, बहस-ख़ीज़, कभी ईमान का बुनियादी स्तंभ नहीं।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयबयान नुस से ही आता है, कम से कम तीन बार : ईसा की तरफ़ से आने वाले रसूल की ख़ुशख़बरी "जिसका नाम अहमद है" (क़ुरआन 61:6), पैग़ंबर "जो उम्मी नबी है, जिसे वे अपने पास तौरात तथा इंजील में लिखा हुआ पाते हैं" (क़ुरआन 7:157), और "पहले लोगों की पुस्तकों" पुस्तकों में ज़िक्र (क़ुरआन 26:196)। क़ुरआनी दलील एहले-किताब के उस इक़रार की तरफ़ है : तुम जो अपने नुस्ख़े जानते हो, तुम्हें मालूम है क्या ख़ुशख़बरी दी गई है : मंतक़ पैग़ंबरी सिलसिले की मोतसिलत का है, आयतों का शिकार नहीं।
मुसलमान उलमा ने पहचानें पेश की हैं : बनी इसराईल के भाइयों में से मूसा जैसा पैग़ंबर, जिसकी बातें उसके मुँह में डाल दी जाएँगी (व्यवस्थाविवरण 18:18) ; वह तसल्ली देने वाली हस्ती जिसका ईसा अपने शागिर्दों से वादा करता है (यूहन्ना 14 से 16), जिसका नाम "पेरिक्लितोस" (सिफ़त किया गया, अहमद नाम का तर्जुमा) पढ़ने से नुस्ख़ों के "पैराक्लीट" से क़रीबत पैदा होती है ; और कैदार का ख़िदमतगार, इस्माईल की औलाद, यशायाह 42 में।
ये पुरानी, दलील-मंद और इज़्ज़त-दार पढ़ाइयाँ हैं : ये पढ़ाइयाँ ही रहती हैं, दूसरी परंपराओं की मुख़ालफ़त का मवज़ू, और इस्लामी ईमान का कोई बुनियादी स्तंभ इन पर मोतबर नहीं। ख़ुशख़बरी का बयान क़ुरआन करता है, कोई अदबी मोहिम नहीं।
वह बहस का पुल है : क़ुरआन एहले-किताब को उस चीज़ के इक़रार की दावत देता है जो वे अपने नुस्ख़ों से पहले से जानते हैं, और इसी राह से इस्लाम अपनाने वालों की तारीख़ मौजूद है।
वह ईमान की बुनियाद नहीं : इस्लामी बुनियाद महफ़ूज़ नुस, आम रिवायत, और पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) की दस्तावेज़ी ज़िंदगी है, ये दस्तावेज़ क्या क़ुरआन में तब्दीली की गई है ? के पृष्ठ और क्या हदीसें गढ़ी गई हैं ? के पृष्ठ पर संभाले गए हैं। और नक़ल की बहस का उलटा रुख़ भी यह नहीं : क्या क़ुरआन बाइबिल से लिया गया है ? का पृष्ठ मुवाज़िना इलज़ाम संभालता है।
सबसे ज़्यादा ज़िक्र की जाने वाली : बनी इसराईल के भाइयों में से मूसा जैसे पैग़ंबर का वादा (व्यवस्थाविवरण 18:18), ईसा की घोषित तसल्ली देने वाली हस्ती (यूहन्ना 14-16, जिसे कुछ लोग "पैराक्लीट" के क़रीबी शक्ल "पेरिक्लितोस", सिफ़त किया गया, पढ़ते हैं), और कैदार के ख़िदमतगार (यशायाह 42)। ये दलील-मंद, पुरानी और इज़्ज़त-दार पढ़ाइयाँ हैं, मगर बहस-ख़ीज़ : इस्लामी ईमान इनमें से किसी पर भी नहीं टिका।
क्योंकि हर परंपरा वही नुस्ख़े अपनी-अपनी चाबियों से पढ़ती है : ईसाई पैराक्लीट को रूह-ए-क़ुद्स पढ़ता है, यहूदी व्यवस्थाविवरण के पैग़ंबर को यूशा पढ़ता है। इस क़िस्म की नुस्ख़ाई बहस पुरानी, इज़्ज़त-दार और बिना फ़ैसलाकुन नतीजे की है : यही वजह है कि क़ुरआन ख़ुद अपनी गवाही रखता है (क़ुरआन 61:6) और ईमान को अपनी अपनी दलीलों पर रखता है : नुस, उसकी याददाश्त, और पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की ज़िंदगी।
नहीं : ईमान महफ़ूज़ क़ुरआन, सुन्नत की आम रिवायत, और पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की दस्तावेज़ी ज़िंदगी पर टिका है। पुराने ग्रंथों की दलील इक बहस का पुल और दूसरी निशानियों में से इक है, जिसे क़ुरआन उन लोगों के ख़िलाफ़ दलील के तौर पर ज़िक्र करता है जो ग्रंथों को पहले से जानते थे : वह दस्तावेज़ मालामाल करता है, उसकी बुनियाद नहीं। <a href="/hi/खंडन/क्या-कुरआन-में-तब्दीली-की-गई-है.html">क्या क़ुरआन में तब्दीली की गई है ?</a> का पृष्ठ असली बुनियाद संभालता है।