होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या हदीसें गढ़ी गई हैं ?
कुछ हदीसें सचमुच गढ़ी गईं, और इस्लामी मेथड ही वह आलात है जिसने उन्हें मरवी किया और रद्द किया : पैग़ंबर ख़ुद की दी हुई तहज़ीर, छानने के लिए पैदा हुआ इसनाद, माहिरीन के कैटलॉग किए हुए हज़ारों गढ़े हुए अख़बार। बहुत बड़ी कसरत से पहुँचाया गया मरक़ज़, वह, गढ़ा हुआ होना मुमकिन ही नहीं।
कुछ गढ़ी गईं, और इस्लामी जवाब वह मेथड है जिसने उन्हें पकड़ा। पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने ख़ुद होशियार किया : "जो भी मुझ पर जान-बूझकर झूठ बोले, वह अपनी जगह जहन्नम में बना ले" (बुख़ारी 110)।
सनदों (इसनाद) का इल्म रिवायतों को उनके नामवर पहुँचाने वालों से छानने के लिए पैदा हुआ, मुसन्निफ़ीन ने हर रिवायत को दरजा दिया (सहीह, हसन, ज़ईफ़, मौजूअ), और गढ़े हुए अख़बारों की पूरी किताबें मुस्लिम आलिम ख़ुद छापते रहे। दर्जनों अलग-अलग सनदों से बहुत बड़ी कसरत से पहुँचाया गया मरक़ज़, वह, गढ़ना मवाद्दी तौर पर मुमकिन ही नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयशुरुआत पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की अपनी तहज़ीर से होती है, बुख़ारी से मरवी : "जो भी मुझ पर जान-बूझकर झूठ बोले, वह अपनी जगह जहन्नम में बना ले" (बुख़ारी 110), और कहीं और मज़ीद : "मुझ पर झूठ बोलना किसी और पर झूठ बोलने की तरह नहीं है" (बुख़ारी 1291 से मरवी)।
रिवायत ने गढ़ने का ख़तरा कभी इनकार नहीं किया : उसने उसे बुनियादी मवाद्दा माना और नुसूस की तारीख़ का सबसे भारी तस्दीक़ी आलात खड़ा किया : नामवर सनद, यानी इसनाद, जिसमें हर रिवायत अपने ज़मानतों की फ़ेहरिस्त लिए होती है, गिनती-दर-गिनती।
मुस्लिम अपनी सहीह की मुक़द्दमा में पहली सदी के आलिम मुहम्मद बिन सीरीन का क़ौल रिवायत करता है : पहले मुसलमान सनदें नहीं पूछते थे ; जब गृहयुद्ध (फ़ितना) भड़का, उन्होंने कहा : हमें अपने मर्द नाम करके सुनाओ, और वे देखते थे कौन क्या रिवायत करता है, ईमानदार लोगों की रिवायतों को बिदअत वालों की रिवायतों से अलग करने के लिए।
इसनाद यहीं पैदा हुआ : बिखरता मुआशरा क़ौलों की ट्रेसेबिलिटी खड़ा करता है। किसी दूसरी दीनी रिवायत ने नामवर, तारीख़शुदा और एक-एक करके फ़ैसला लिए गए पहुँचाने वालों से तस्दीक़ का यह निज़ाम नहीं बनाया।
नतीजा नापा जा सकता है : क्लासिकी मुसन्निफ़ीन ने चलने वाली लाखों रिवायतें छानीं और सहीह किताबों में सिर्फ़ छोटा हिस्सा रखा : बुख़ारी और मुस्लिम की दोनों सहीह में तक़रीबन 7000 रिवायतें हैं, दोहराव समेत।
और मन्फ़ी काम छपा हुआ है : गढ़े हुए अख़बारों की पूरी किताबें मुस्लिम आलिम ख़ुद लिखते रहे, इब्न अल-ज़वज़ी की मौजूआत से शुरू, और यह फ़न आज के बाहेस्तों तक जारी रहा। गढ़ने वाली रिवायत अपने झूठों की फ़ेहरिस्त नहीं छापती : इसने छापी, इसलिए मौजूदा बाहेस्त को पहले से तयशुदा फ़ाइल मिलती है।
बहुत बड़ी कसरत से पहुँचाया गया मरक़ज़ (मुतवातिर) गढ़ा हुआ नहीं हो सकता : उसकी तफ़सीलों में नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज, बड़े मनहिज़ात, पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की आम सीरत, दर्जनों और सैकड़ों अलग-अलग सनदों लिए हैं, दूर-दूर के शहरों में, उन गिनतियों में जो पहली ही मुख़ालफ़त पर एक-दूसरे का रद्द कर देतीं।
झूठ जो दर्जनों हज़ार लोगों, उनके इस्लाम के मुख़ालिफ़ों समेत जिन्होंने दलील की क़ीमत चुकाने को तैयार रहना था, की ख़ामोश हमदर्दी माँगता हो, झूठ नहीं होता : वह मवाद्दी नामुमकिन है। यही मक़ानिज़्म आयशा ने किस उम्र में पैग़ंबर से निकाह किया ? के पृष्ठ पर मरवी है : कॉर्पस की सबसे ज़्यादा हमला होने वाली रिवायत की सनदें सबसे ज़्यादा हैं।
नियम माहिरीन वाला ही है : ईमान लाने और पहुँचाने से पहले स्रोत की तहक़ीक़। बिना किताब, बिना नंबर और बिना दरजे नेटवर्क पर चलने वाली रिवायत हवाला नहीं है, चाहे हज़ार सुलेखी पन्नों से मुहर लगी हो।
यह साइट हर बार किताब और नंबर गिनती है, और मनाज़िर वाली रिवायत का दरजा : यही 8वीं सदी का तरीक़ा है, आज भी इकलौता काम करने वाला। क्या क़ुरआन में तब्दीली की गई है ? का पृष्ठ क़ुरआनी नुसूस की हिफ़ाज़त संभालता है, इमारत का रुक्न।
क्योंकि मुसन्निफ़ीन ने हर चलने वाली चीज़ दर्ज की, हर सनद के सतहत के दरजे के साथ, जैसे अदालत रद्द की गई गवाहियों को भी महफ़ूज़ रखे। कमज़ोर रिवायतों का आम चलन दीनी सक़ाफ़त का हाल है, आक़ीदे का नहीं : फ़क़ीह और मुहद्दिस इन्हें हमेशा से अलग करते आए हैं, और यही आम दरजाबंदी ही तस्दीक़ मुमकिन करती है।
अक़ाएद और अहक़ाम में : नहीं, फ़ुक़हा का क्लासिकी नियम उसे हलाल-हराम की बात में निकाल देता है। फ़ज़ाएल और नसीहत में, आलिम की अक्सरियत शर्तों के साथ क़बूल करती है। यह दरजाबंदी तमाम मज़ाहब में पढ़ाई जाती है : हदीस का दरजा उसकी शख़्सियत का हिस्सा है, इतना कि यह साइट हर मनाज़िर वाली रिवायत का दरजा गिनती है।
स्रोत से : किताब, नंबर, हदीस के माहिरीन की दरजाबंदी, और फ़ुक़हा की शरहें। बिना मालूम किताब, बिना छपी सनद और बिना दरजे वाली रिवायत इस्लामी हवाला नहीं है, चाहे नेटवर्क पर कितनी ही बार चले। 8वीं सदी का तरीक़ा आज भी वही तरीक़ा है : पूछो किसने रिवायत की, किससे, और माहिरीन ने क्या फ़ैसला लिखा।