होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > मुहम्मद के सभी पुत्र क्यों मर गए ?
क़ासिम, अब्दुल्लाह और इब्राहीम : हक़ाइक़, आज़माइश का क़ुरआनी दायरा, जल्दी जाने वाले बच्चों की सिफ़ारिश, और वह सूर्यग्रहण जिसे लोग मातम का मोजिज़ा बनाना चाहते थे।
मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) के 3 बेटे, क़ासिम, अब्दुल्लाह और इब्राहीम, छोटी उम्र में गए, 7वीं सदी के बहुत से बच्चों की तरह : बच्चों की मौत उस दौर में हर घराने को छूती थी। क़ुरआन आज़माइश को दायरा देता है : "तथा निश्चय हम तुम्हें भय और भूख तथा धनों, प्राणों और फलों की कमी में से किसी न किसी चीज़ के साथ अवश्य आज़माएँगे। और (ऐ नबी!) सब्र करने वालों को शुभ समाचार सुना दें।" (क़ुरआन 2:155)। और इस्लाम इज़ाज़त की उम्र से पहले जाने वाले बच्चे को जन्नत का वादा करता है, उसकी सिफ़ारिश उसके माँ-बाप के लिए (नसई से मरवी)।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयमुहम्मद (उन पर सलाम हो) के ख़दीजा से 7 बच्चे और मारिया से 1 हुए : 3 लड़के (क़ासिम, अब्दुल्लाह, इब्राहीम) छोटी उम्र में गए, और 4 बेटियाँ जवानी को पहुँचीं (इब्न हिशाम की सीरत में दस्तावेज़ी)। 7वीं सदी की बच्चों की मौत आधी पैदाइशों को छूती थी, अरब के हर घराने में जैसे दुनिया के : नबवी घराने के बेटों का मातम उसके पूरे दौर का मुत्तहिद मातम है, अजीब मामला नहीं।
क़ुरआन मातम को दायरा देता है : "तथा निश्चय हम तुम्हें भय और भूख तथा धनों, प्राणों और फलों की कमी में से किसी न किसी चीज़ के साथ अवश्य आज़माएँगे। और (ऐ नबी!) सब्र करने वालों को शुभ समाचार सुना दें।" (क़ुरआन 2:155)। सुन्नत सिखाती है कि पैग़ंबर सबसे पहले आज़माए जाते हैं, और मुहम्मद (उन पर सलाम हो) ने इब्राहीम की मौत सहाबों के सामने रोते हुए कहा : दिल उदास होता है, आँख रोती है, और ज़बान सिर्फ़ रज़ामंदी से बोलती है (मजमूओं में मरवी)। ईमान दर्द मिटाता नहीं : वह उसे थामे रहता है।
इस्लाम मातम को वादा बना देता है : फ़र्ज़ की उम्र से पहले मरा बच्चा जन्नत में जाता है, और हदीस सिखाती है कि जो मुसलमान जोड़ा 3 बच्चे गँवाए बग़ैर इसके कि कोई अक़्ल की उम्र को पहुँचे, अल्लाह उन्हीं की वजह से अपनी रहमत से उन्हें जन्नत में दाख़िल कराता है (नसई से मरवी)। जल्दी जाने वाला बच्चा बददुआ नहीं : वह उसके माँ-बाप के सामने खुला दरवाज़ा है। क्या सभी ग़ैर-मुसलमान जहन्नम में जाएँगे ? का पृष्ठ उनका हाल संभालता है जिनसे कभी कुछ नहीं माँगा गया।
इब्राहीम की मौत के दिन सूरज ग्रहण हुआ, और लोगों ने कहा कि वह पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) के बेटे के लिए ग्रहण हो रहा है। उन्होंने आम जज़्बात को अपने दौर से पहले की इल्मी बहस से इस्लाह किया : सूरज और चाँद अल्लाह की दो निशानियाँ हैं, वे किसी की मौत के लिए नहीं ग्रहण होते ;
जब उन्हें देखो, नमाज़ पढ़ो (बुख़ारी से मरवी)। अपने ही मातम में यह इंसान ओहम ख़त्म कर रहा था : उसके बेटों की मौत से कोई पूजा, कोई ऐलान किया हुआ मोजिज़ा, कोई माँगा हुआ आसमानी निशान नहीं निकला। क्या मुहम्मद दौलतमंद होकर दुनिया से गए ? का पृष्ठ उनकी शख़्सियत पर गढ़े गए कलचरी इलज़ामों का दूसरा हिस्सा खोलता है।
हाँ : मुहम्मद (उन पर सलाम हो) की 4 बेटियाँ, ज़ैनब, रुक़ैय्या, उम्मे कुलसूम और फ़ातिमा, जवानी की उम्र को पहुँचीं, उनके निकाह हुए, और फ़ातिमा ने पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की नस्ल आगे बढ़ाई : मुसलमान दुनिया की सय्यिद लड़ियाँ उन्हीं की बेटी से चलती हैं। इलज़ाम ज़िंदा बेटियाँ भूल जाता है और सिर्फ़ मरे हुए गिनता है।
नहीं : उस दौर की बच्चों की मौत हर घराने को छूती थी, बिना फ़र्क़ के, और क़ुरआन बच्चे की मौत को इक आज़माइश ठहराता है जिसके सब्र का सवाब है। सुन्नत के हिसाब से पैग़ंबर सबसे पहले आज़माए जाते हैं, और पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) इब्राहीम पर रोए और फ़रमाया कि दिल उदास होता है और ज़बान सब्र करती है : ईमान बेहिस्सी नहीं।
जन्नत : फ़र्ज़ की उम्र से पहले मरा बच्चा अदा करने के लिए कोई गुनाह नहीं लाता, और हदीस वादा करती है कि वह अपने माँ-बाप को अल्लाह की रहमत में दाख़िल कराता है (नसई से मरवी)। मातम वहाँ दरवाज़ा बन जाता है : यही दिलासा है जो दीन मातमी माँ-बाप को देता है।