क़ुरआन दोहराता क्यों है ?

होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क़ुरआन दोहराता क्यों है ?

अदबी इलज़ाम को दोहराए गए क़िस्से और एलान की गई इकरंबी नज़र आती है। क़ुरआन ख़ुद अपने आपको ऐसी किताब बताता है जिसकी आयतें मिलती-जुलतीं और बार-बार दोहराई जाने वाली हैं : दोहराव मंज़ूर-ए-शुदा है, कारवाई-मंद (याददाश्त, इसरार, इबादत), और हर दोहराया गया क़िस्सा रुख़ बदलता है।

क़ुरआन अपना दोहराव मंज़ूर करता है और ख़ुद उसे नाम देता है : "अल्लाह ने सबसे अच्छी बात (क़ुरआन) अवतरित की, ऐसी पुस्तक जो परस्पर मिलती-जुलती, (जिसकी आयतें) बार-बार दोहराई जाने वाली हैं।" (क़ुरआन 39:23)। दोहराव कारवाई-मंद है : इक ज़बानी नुस जो रोज़ 5 बार नमाज़ में याद और तिलावत किया जाए, गूँज से याद रखता है ; मशतरका क़िस्से हर बार उसी इबरत का दूसरा रुख़ बयान करते हैं ; और इलाही तालीम बुनियादों पर इसरार करती है जैसे उस्ताद अपनी बुनियादों पर करता है।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

📖 2 मिनट पढ़ने का समय

नुस ख़ुद नाम-बर-नाम किया गया दोहराव

क़ुरआन अपना दोहराव छुपाता नहीं : वह उसे अपनी ज़ीब की निशानी ठहराता है : "अल्लाह ने सबसे अच्छी बात (क़ुरआन) अवतरित की, ऐसी पुस्तक जो परस्पर मिलती-जुलती, (जिसकी आयतें) बार-बार दोहराई जाने वाली हैं।" : "इससे उन लोगों की खालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जो अपने पालनहार से डरते हैं। फिर उनकी खालें तथा उनके दिल अल्लाह के स्मरण की ओर कोमल हो जाते हैं।" (क़ुरआन 39:23)।

मुतशाबिह, आयतों की मिलती-जुलती शक्ल, सुनने के माजरे का जिस्म ही पेश की गई है : वह कान का नुस है, चुपचाप पढ़ने का नहीं, और अरबी ज़ीब, जो ब-सबब ज़बानी अदब है, गूँज और इसरार को अपनी सबसे बड़ी ख़ूबियाँ ठहराती है।

दोहराव के काम

ये नुस के इस्तेमाल ही से दस्तावेज़ी हैं : याददाश्त (लाखों हिफ़्ज़ नुस को उसकी दोहराने वाली संरचना की बदौलत रखते हैं), इबादत (रोज़ 5 बार नमाज़ में तिलावत, जहाँ बुनियादी गुज़रने वाले हिस्से तबई तौर पर लौटते हैं), तालीमी इसरार (अल्लाह की वहदानीयत, इंसाफ़, दोबारा जी उठना : बुनियादें उस्ताद की तरह लौटती हैं), और क़िस्से के रुख़ (मूसा का क़िस्सा दस बार के क़रीब लौटता है, कभी इक ही रुख़ पर नहीं : दावत, ज़ालिम, निशानियाँ, समंदर, क़ानून, बछड़ा : हर वर्ज़न उस लम्हे के सामने वालों की ज़रूरत की इबरत निकालता है)।

पोलेमिक्स वाला दोहराव (वही लफ़्ज़ बज़बत) कम है ; असली दोहराव (एक ही वाक़िया अलग-अलग रुख़ों से) नुस की क़िस्से-गोई का तरीक़ा है।

जो मॉडर्न तहक़ीक़ मक़बूल ठहराती है

मौजूदा लुग़वीयत और सामी इल्म ने क़ुरआन का ज़बानी-फ़रमाई अंदाज़ मक़बूल ठहराया : मुवाज़नतें, दोहराए जाने वाले नक़्शे, गोल-नुमा ढाँचे : यही तरतीब-शुदा ज़बानी नुस्ख़ों का ख़ास अदबी रंग है, जिसे बड़ी अफ़सानों के बाद से पढ़ा जाता है।

इकरंबी का इलज़ाम, जो 19वीं सदी की चुपचाप पढ़ने से पैदा हुआ, अपनी तकनीकी बुनियाद खो चुका है : ओराटोरियो को नवेल के मियारों से नहीं आँका जाता। बुनियाद मंज़ूर-ए-शुदा रहती है : क़ुरआन ख़ुद को ऐसी तिलावत पेश करता है जिसकी गूँजें उसकी क़ूवत की निशानी हैं, और क्या मुहम्मद जिन के प्रभाव में, पागल या कवि थे ? का पृष्ठ नज़दीकी अदबी इलज़ाम (नुस शाइरी नहीं) संभालता है, और क़ुरआन के वैज्ञानिक चमत्कार का पृष्ठ उसके मज़मून की बहस।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न क़ुरआन में दोहराव

क्या इलाही नुस को दोहराने की ज़रूरत होती है ?

सवाल चुपचाप पढ़ी जाने वाली किताब की फ़र्ज़ी राय रखता है : क़ुरआन इक तिलावत है, याददाश्त और रोज़ाना नमाज़ के लिए, जहाँ दोहराव रिवायत का मिज़ाज़ ही है। नुस ख़ुद अपने आपको दोहराने वाला बताता है (क़ुरआन 39:23) और उसी दोहराव को अपनी ज़ीब की निशानी बनाता है : क्लासिकी अरबी ज़ीब, जो ब-सबब ज़बानी अदब है, गूँज और इसरार को मक़बूल ठहराती है।

मूसा का क़िस्सा 12 बार क्यों लौटता है ?

हर मरवा इक रुख़ बयान करता है : पैग़ंबर की दावत, ज़ालिम का मुक़ाबला, नाकाम किया गया जादू, चीरा हुआ समंदर, मिला हुआ क़ानून, क़ौम की नाशुक्री : यह इक साग़ा है जिसमें हर सूरह उस लम्हे की इबरत निकालती है जिसकी अपनी जमाअत को वही के लम्हे में ज़रूरत थी। मज़मून का दोहराव नुस का दोहराव नहीं है : वर्ज़न कभी बज़बत इक से नहीं होते, और यही वह चीज़ है जिसे पोलेमिक्स वाला कभी ज़िक्र नहीं करता।

क्या मग़रिबी अदबी तनक़ीद का रुख़ बदल गया ?

क्लासिकी ओरिएंटलिस्ट (19वीं सदी के) इकरंबी की बात करते थे ; सामी इल्म और मॉडर्न लुग़वीयत ने क़ुरआन की ज़बानी-फ़रमाई संरचना (ज़बानी नुस का अंदाज़, मुवाज़नतें, दोहराए जाने वाले नक़्शे) को तरतीब-शुदा अदबी शक्ल के तौर पर मक़बूल ठहराया, जो मौजूदा तहक़ीक़ की पढ़ी हुई बड़ी ज़बानी अफ़सानों जैसी है। <a href="/hi/खंडन/क्या-मुहम्मद-जिन-के-प्रभाव-में-पागल-या-कवि-थे.html">क्या मुहम्मद जिन के प्रभाव में, पागल या कवि थे ?</a> का पृष्ठ शाइरी का अदबी इलज़ाम संभालता है, जो इसका हम-मामला है।

स्रोत: क़ुरआन 39:23 (दोहराव नाम-बर-नाम और मंज़ूर-ए-शुदा) · इबादती कारवाई (रोज़ाना नमाज़ में तिलावत) · दोहराए गए क़िस्सों की मुवाज़िनत (एक ही वाक़िया के अलग-अलग रुख़) · अरबी ज़बानी अदब (गूँज की ज़ीब)

के लिए अन्य चरण खंडन : इस्लाम के ख़िलाफ़ इलज़ामों के जवाब

आगे पढ़ें क़ुरआन में दोहराव

بسم الله الرحمن الرحيم बुध 9 जुमादा अल-अव्वल
الأربعاء 9 جمادى الأولى
أحدب متزايد बढ़ता हुआ कूबड़ दिन 10.1 / 29.5
रोशनी 77%
5 दिनों में पूर्णिमा
حسبنا الله ونعم الوكيل अल्लाह हमारे लिए काफी है, कितना अच्छा रक्षक है

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद