होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > मुसलमान कार्टूनों पर प्रतिक्रिया क्यों देते हैं ?
ज़ख़्मी करने वाला कार्टून ईमान के एक रुक्न को छूता है : पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) से मोहब्बत। क़ुरआन ईमानदार की प्रतिक्रिया ठहराता है (इनकार, फ़ासला, सब्र) और सज़ा अकेले अल्लाह को देता है। हिंसा, उलटा, उन्हीं नुसूस की ख़िलाफ़वर्ज़ी है जिन्हें वह बदला लेने का दावा करती है।
क्योंकि पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) से मोहब्बत ईमान का हिस्सा है : "ईमान पूरा नहीं होता जब तक मैं उसे अपने बाप, उसकी औलाद और सारे लोगों से ज़्यादा प्यारा न हो जाऊँ" (बुख़ारी 15)। मरवी इस्लामी जवाब फ़ासला और इनकार है : "ऐसा करने वालों के साथ न बैठो, यहाँ तक कि वे दूसरी बात में लग जाएँ" (क़ुरआन 4:140), और तोहमत की सज़ा अकेले अल्लाह के हवाले (क़ुरआन 33:57)। कार्टूनों के नाम पर की गई हिंसा इन्हीं नुसूस की ख़िलाफ़वर्ज़ी है।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयकार्टूनों पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया एक बुनियादी नुसूस से समझ आती है : "ईमान पूरा नहीं होता जब तक मैं उसे अपने बाप, उसकी औलाद और सारे लोगों से ज़्यादा प्यारा न हो जाऊँ" (बुख़ारी 15 से मरवी), और ईमान की मीठी (हलावत) की तारीफ़ : "अल्लाह और उसका रसूल उसे हर उस चीज़ से ज़्यादा प्यारा हो जो मौजूद है" (बुख़ारी 16 से मरवी)।
पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) से मोहब्बत इख़्तियारी इबादत नहीं : वह ईमान का ही हिस्सा है। बदनाम करने वाला कार्टून किसी राय को नहीं छूता, करोड़ों ईमान वालों के अपने ईमान के हिस्से को छूता है : यही वजह है कि जकारता से डकार तक प्रतिक्रिया की इंतिसार आम है।
क़ुरआन दो रहनुमा आयतों में तरीक़ा देता है : "जब आप उन लोगों को देखें, जो हमारी आयतों के विषय में (उपहास के साथ) बात करते हैं, तो उनसे मुँह फेर लें, यहाँ तक कि वे उसके अलावा बात में लग जाएँ" (क़ुरआन 6:68), और "अल्लाह ने तुम्हारे लिए अपनी पुस्तक में (यह आदेश) अवतिरत किया है कि जब तुम सुनो कि अल्लाह की आयतों का इनकार किया जा रहा है तथा उनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है, तो ऐसा करने वालों के साथ न बैठो, यहाँ तक कि वे दूसरी बात में लग जाएँ। अन्यथा तुम भी उन्हीं जैसे हो जाओगे।" (क़ुरआन 4:140)।
तोहमत देने वाले की सज़ा ईमान वालों के हवाले नहीं : "निःसंदेह जो लोग अल्लाह तथा उसके रसूल को कष्ट पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन्हें दुनिया एवं आखिरत में धिक्कार दिया है और उनके लिए अपमानकारी यातना तैयार की है।" (क़ुरआन 33:57)। इस्लामी फ़ाइल साफ़ है : आम इनकार, फ़ासला, और सज़ा अल्लाह के हवाले।
सीरत मुतवक़्क़ा सब्र की पैमाइश देती है। ताइफ़ में, उस शहर में जिसने उन्हें ख़ून तक पथराव किया, पहाड़ों के फ़रिश्ते ने बस्तियों को दो पहाड़ों के बीच कुचलने की पेशकश की : उन्होंने मना किया, उम्मीद पर कि उनकी औलाद ईमान लाएगी (मुस्लिम 1795 से मरवी)।
पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) "सारे संसार के लिए रहमत" बनकर भेजे गए (और (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा है।, क़ुरआन 21:107), और उनकी मरवी ज़िंदगी माफ़ किए गए सतायर लिखने वाले, एक दहाई तक सबोतेज़ रहा मुख़ालिफ़ सरदार जिसे कभी नहीं छुआ, और मक्के की फ़तह पर माफ़ किए गए मुख़ालिफ़ दिखाती है। जिसे कार्टून ज़ख़्मी करते हैं, उसने अपनी ज़िंदगी में उससे बहुत बुरा माफ़ किया।
उन मुल्कों में जहाँ दीनी तंज़ ज़मानत में है, मुसलमान दोगुनी वफ़ादारी जीता है : उस तस्वीर को ज़मानत देने वाले मुल्क के सिविल क़ानून की पाबंदी, और इनकार जायज़ वसाइल से : क़ौल, शिकायत, ख़रीदने से इनकार, मदनी दबाव। जिस चीज़ को नुसूस बिल्कुल मना करते हैं वह हिंसा है : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) के नाम पर नक़्क़ाशों या बंदियों का क़त्ल उस शख़्स की याद को ज़ख़्मी करता है जो अपने ज़िंदा मुख़ालिफ़ों को माफ़ करता था, और उस क़ुरआनी नियम की सीधी ख़िलाफ़वर्ज़ी करता है जो सज़ा अल्लाह को देता है।
दुनिया भर के मुस्लिम इदारों की इन हत्याओं की मज़मत एक दूती इहतियात नहीं : वह नुसूस का ही इन्तिज़ाम है। क्या इस्लाम ईश-निंदकों की हत्या का आदेश देता है ? का पृष्ठ बुनियादी नियम देता है, और क्या मुहम्मद ने अपने आलोचकों को मरवाया ? तारीख़ी फ़ाइल।
बंदी रूह वाले मक़लूक़ात की तमसीली तस्वीरों को इबादत या तख़लीक़ के मुक़ाबले के मक़सद से निशाना बनाती है, तफ़सील पर मज़ाहब के इख़्तिलाफ़ के साथ ; उसने 14 सदियों से पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की सीरत को हर बुत से महफ़ूज़ रखा : उनकी तस्वीर से इबादत नहीं, हर तफ़सील में बयान शक्ल-ओ-सूरत वाली ज़िंदगी की पैरवी की जाती है। <a href="/hi/धर्म/खंडन/क्या-इस्लाम-चित्र-और-कला-को-रोकता-है.html">क्या इस्लाम चित्र और कला को रोकता है ?</a> का पृष्ठ आम सवाल संभालता है।
क़ुरआन प्रतिक्रिया का हुक्म देता है, लेकिन एक मुक़र्रर प्रतिक्रिया : आम इनकार और फ़ासला (क़ुरआन 4:140), तोहमत के सामने सब्र के साथ, जैसे पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने ताइफ़ में दिखाया, फ़रिश्ते की पेशकश की गई सज़ा ठुकरा कर (मुस्लिम 1795 से मरवी)। पूरा नज़रअंदाज़ करना नियम नहीं : इनकार ज़ाहिर करना, क़ौल और जायज़ वसाइल से पैग़ंबर की इज़्ज़त की हिफ़ाज़त, और सज़ा अल्लाह के हवाले, यही नुसूस का तरीक़ा है।
हाँ : इक़्तिसादी और मदनी दबाव इनकार के जायज़ वसाइल में है, और वही हमेशा कार्टूनों पर मुसलमानों का बहुत बड़ा जवाब रहा है, उन हिंसाओं से बहुत पहले जिन्हें मीडिया उठाता है। जो मुसलमान उस मुल्क में रहता है जहाँ दीनी तंज़ ज़मानत में है, वह सिविल क़ानून की पाबंदी करता है, इनकार जायज़ वसाइल से ज़ाहिर करता है, और हिंसा कभी इस्तेमाल नहीं कर सकता : कार्टूनों के नाम पर की गई हत्याओं की मज़मत इस्लामी नुसूस ख़ुद करते हैं।