होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > अल्लाह अपनी तारीफ़ क्यों चाहता है ?
इलज़ाम सिफ़तों का भूखा इक माबूद की तस्वीर खींचता है। क़ुरआन नुस से जवाब देता है : अल्लाह हर चीज़ से बेनियाज़ है, सिफ़त और शुक्र उसे अदा करने वाले को बुलंद करती हैं, और मोमिन की सिफ़त सच्चाई और आज़मत की मशक़ है, कभी ख़िराज नहीं।
वह उसके लिए नहीं माँगता : "तथा जो आभार प्रकट करता है, वह अपने ही (लाभ के) लिए आभार प्रकट करता है, और जो कृतघ्नता दिखाए, तो निश्चय अल्लाह बेनियाज़, सराहनीय है।" (क़ुरआन 31:12)। सिफ़त और शुक्र उस इंसान के लिए मुनाफ़िअत-मंद ऐलान किए गए हैं जो उन्हें अदा करता है, और अल्लाह ख़ुद उनसे बेनियाज़ ऐलान करता है : मोमिन अपने अल्लाह को नहीं पालता, वह अपने दिल को सच्चाई, शुक्र और आज़मत की मशक़ देता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन इलज़ाम को शुक्र की उसी आयत में जवाब देता है : "तथा जो आभार प्रकट करता है, वह अपने ही (लाभ के) लिए आभार प्रकट करता है, और जो कृतघ्नता दिखाए, तो निश्चय अल्लाह बेनियाज़, सराहनीय है।" (क़ुरआन 31:12)। ढाँचा वाज़िह है : शुक्र-गुज़ार अपने आप को नफ़ा देता है, नाशुक्र अपना नुक़सान करता है, और अल्लाह, ख़ुद, न कुछ जीतता है न कुछ हारता है। आयत 35:15 दोहराती है : अल्लाह बहुत बेनियाज़ है, इंसान मुहताज हैं : कोई इबादत अल्लाह को नहीं पालती, कोई सिफ़त उसे मालामाल नहीं करती।
इस्लामी सिफ़त सच्चाई और रुख़ की मशक़ है : सच्ची बात को नाम देना (अल्लाह की रहमत, इंसाफ़, हिकमत) मोमिन को ज़िंदा शुक्र और आज़मत की तरफ़ वापस लाता है, वे दो ख़ूबियाँ जिन्हें ग़फ़लत मिटा देती है। रोज़ाना याद (ज़िक्र) का अपना ऐलान-शुदा काम है : दिलों को सुकून देना, दिन को ढाँचा देना, शुक्र को फ़ाल रखना।
शुक्र का मौजूदा मनोविज्ञान दर्ज करता है जो परंपरा 14 सदियों से अमल में लाती है : जो ब-तारतीब शुक्र-अदा करता है वह बेहतर, ज़्यादा पुरसुकून और ज़्यादा इंसाफ़-मंद जीता है। सिफ़त इलाही इतराज़ को दिया गया ख़िराज नहीं : वह इंसान की अंदरूनी मशक़ है, और नुस इसे नुस से ऐलान करता है।
मजमूआ दस्तावेज़ करता है : "अल्लाह ख़ूबसूरत है और वह ख़ूबसूरती से प्रेम करता है" (मुस्लिम और अल-हाकिम 70 से मरवा) : इस्लाम इक ऐसी ज़ीब की बुनियाद रखता है जहाँ ख़ूबसूरती अपने लिए मोहब्बत की जाती है, और सिफ़त उन कमालात को बयान करती है (रहमत, इंसाफ़, हिकमत) जिन्हें मोमिन अपनी ज़िंदगी में झलकाना चाहता है। कहीं नुस उसे तहज़ीर नहीं करता जो सिफ़त नहीं करता : नाशुक्र ख़ुद को महरूम करता है, और अल्लाह बेनियाज़ रहता है।
क़दीम मिथोलॉजी के भूखे माबूदों से मुवाज़िनत, जिन्हें ग़ज़ब से पहले पालना और सिफ़त करना ज़रूरी था, फ़र्क़ रोशन करती है : क़ुरआन का अल्लाह ख़ुद को हर मुहताजी से आज़ाद ऐलान करता है, और उसकी इबादत इक इनाम है जो इंसान अपने आप को देता है। क्या इस्लाम हर सुख को हराम करता है ? का पृष्ठ ख़ुशी का दुश्मन माबूद वाला हम-मामला इलज़ाम संभालता है।
क़ुरआन मुहताजी को नुस से निकाल देता है : "निश्चय अल्लाह बेनियाज़, सराहनीय है।" (क़ुरआन 31:12), और आयत 35:15 बग़ैर घेरे-बंदे कहती है : अल्लाह बेनियाज़ है, तुम मुहताज हो। सिफ़त अल्लाह में कुछ नहीं जोड़ती और कुछ नहीं निकालती : वह उसे बदल देती है जो उसे कहता है, उस चीज़ के मंबे से जोड़कर जिसकी वह सिफ़त करता है। इक बादशाह जो अपनी रईयत को साँस लेने का हुक्म दे, उनकी साँस को मुहताज नहीं : हुक्म उन्हीं के लिए है।
क़ुरआन काम बताता है : "अल्लाह की याद ही से दिलों को संतुष्टि मिलती है" : रोज़ाना सिफ़त (जो असल में इक याद और शुक्र है) मोमिन की अंदरूनी ज़िंदगी को ढाँचा देती है, शुक्र को ज़िंदा और आज़मत को फ़ाल रखती है। शुक्र पर मौजूदा मनोविज्ञान की पढ़ाइयाँ दर्ज करती हैं जो परंपरा 14 सदियों से अमल में लाती है : जो रोज़ाना शुक्र-अदा करता है वह उससे बेहतर जीता है जो कभी शुक्र नहीं करता।
हदीस दस्तावेज़ करती है : "अल्लाह ख़ूबसूरत है और वह ख़ूबसूरती से प्रेम करता है" (मुस्लिम और अल-हाकिम 70 से मरवा) : ख़ूबसूरती से प्रेम करना और उसकी सिफ़त करना इतराज़ नहीं, वह इलाही ज़ीब की तअरीफ़ है जिसे मोमिन हिस्सेदार बनाता है। इस्लामी सिफ़त वह बताती है जो अल्लाह है (रहम करने वाला, इंसाफ़ वाला, हिकमत वाला) ताकि मोमिन उससे रंग जाए : सिफ़त की गई ख़ूबी मंज़ूर-ए-शुदा ख़ूबी बन जाती है।