मुसलमान ईद पर भेड़ की क़ुर्बानी क्यों करते हैं ?

होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > मुसलमान ईद पर भेड़ की क़ुर्बानी क्यों करते हैं ?

इबराहीम की याद (37:105-107), 3 में बाँटना (घरवाले, रिश्तेदार, ग़रीब), जानवर की नरमी वाले नुसूस, और मौजूदा दौर के नियमबद्ध क़त्लगाह।

ईद-उल-अज़हा की क़ुर्बानी इबराहीम की हरकत को दोहराती है : इताअत में अपने बेटे की क़ुर्बानी के लिए तैयार और अल्लाह की तरफ़ से छुड़ाए गए : "निश्चय तूने स्वप्न को सच कर दिखाया। हम सदाचारियों को इसी तरह बदला प्रदान करते हैं। निःसंदेह यही तो निश्चय खुला परीक्षण है। और हमने उसके फ़िदया (छुड़ौती) में एक बहुत बड़ा ज़बीहा दिया।" (क़ुरआन 37:105-107)।

गोश्त 3 हिस्सों में बाँटा जाता है (घरवाले, रिश्तेदार, ग़रीब) : यह दुनिया की सबसे बड़ी हमदर्दी वाली दावत है, जिसे जानवर के साथ नरमी के नुसूस बाँधते हैं : "जब तुम क़त्ल करो तो अच्छी तरह क़त्ल करो ; अपना चाकू तेज़ करो और जानवर को उसकी तकलीफ़ से बचाओ" (मुस्लिम से मरवी)।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

📖 2 मिनट पढ़ने का समय

इबराहीम की याद-ए-आज़म

ईद-उल-अज़हा इबराहीम की सीरत का सबसे सनसनीख़ेज़ लम्हा दोबारा जीती है : बेटे की क़ुर्बानी का हुक्म देने वाला सपना, बाप और बेटे की इताअत, और आख़िरी फ़िदया : "निश्चय तूने स्वप्न को सच कर दिखाया। हम सदाचारियों को इसी तरह बदला प्रदान करते हैं। निःसंदेह यही तो निश्चय खुला परीक्षण है। और हमने उसके फ़िदया (छुड़ौती) में एक बहुत बड़ा ज़बीहा दिया।" (क़ुरआन 37:105-107)।

ईद की भेड़ यही सालाना फ़िदया है : हर मुस्लिम घर वह मंज़र दोहराता है जहाँ रहमत क़ुर्बानी की जगह ले लेती है। क़ुरआन में मूसा का पृष्ठ और पैग़ंबरों की सीरीज़ एहले-किताब के साथ साझी यही याद दिखाते हैं।

3 में बाँटना : हमदर्दी की माआश

सुन्नत गोश्त को 3 हिस्सों में बाँटती है : घरवाले, रिश्तेदार और पड़ोसी, ग़रीब। दुनिया भर के हिसाब से ईद-उल-अज़हा इंसानियत की सबसे बड़ी गोश्त बाँटने की तहरीक़ है : करोड़ों ग़रीब घर उस दिन गोश्त खाते हैं सहतवानों की इबादती हरकत के सहारे, और मुस्लिम इदारे आज दौलतमंद मुल्कों की क़ुर्बानियाँ अकाल वाले इलाक़ों तक पहुँचाते हैं। दीनी सूरत एक सामाजिक माआश लिए हुए है : यही काम नुसूस के इबराहीम में उस रस्म का था, ईमान के सहारे अपनों को खिलाना।

नुसूस से मुकर्रर जानवरी नरमी

इबादती ज़बह नरमी के मरवी नुसूस से बँधा है : "जब तुम क़त्ल करो तो अच्छी तरह क़त्ल करो ; जब ज़बह करो तो अच्छी तरह ज़बह करो, चाकू तेज़ करो और जानवर को उसकी तकलीफ़ से बचाओ" (मुस्लिम से मरवी)। जानवर की नज़र से बाहर तेज़ किया गया चाकू, भूखा न रखा गया जानवर, दूसरे जानवरों के सामने ज़बह की मना, पूरी मौत का इंतिज़ार : फ़िक़ह वह सब तफ़सील से देता है जिसे मौजूदा जानवर हक़ूक़ की तहरीक़ नई खोजती है।

पश्चिमी मुल्कों में क़ुर्बानी नियमबद्ध क़त्लगाहों में होती है, और मुसलमान उस सिविल क़ानून की इताअत करता है जो हरकत को बाँधता है : क्या शरीयत पश्चिम पर थोपी जाना चाहती है ? का पृष्ठ यह मुआहदा तफ़सील से देता है। क्या इस्लाम कुत्तों को हराम करता है ? का पृष्ठ मॉड्यूल की जानवरी अख़लाक़ मुकम्ल करता है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न ईद-उल-अज़हा की क़ुर्बानी

क्या जानवर को क़त्ल करना बर्बरता है ?

इंसान पूरी दुनिया के हिसाब से गोश्त खाते हैं, और इबादती ज़बह और इंडस्ट्रियल क़त्लगाह में फ़र्क़ नापा जा सकता है : इस्लाम तेज़ चाकू फ़र्ज़ करता है, एक ही बार की साफ़ कटाई, जानवर को दूसरों की नज़र से दूर रखना, और बेवजह तकलीफ़ देना हराम करता है। क्या इस्लाम कुत्तों को हराम करता है ? का पृष्ठ वही जानवरी अख़लाक़ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाता है।

क्या भेड़ के बदले ग़रीबों को पैसा दे दिया जाए ?

इबादती क़ुर्बानी याद-ए-आज़म का अमल है जिसकी सूरत सुन्नत ने मुकर्रर की, और उसका फल पहले ही सामाजिक है : गोश्त का एक तिहाई ग़रीबों का होता है, और इदारे आज पश्चिम के मुसलमानों की क़ुर्बानियाँ अकाल वाले इलाक़ों में पहुँचाते हैं। हरकत की सूरत इबराहीम को याद रखती है ; उसकी माआश ग़रीबों को खिलाती है : दोनों नुसूस की वजूदी वजह हैं।

क्या क़ुर्बानी सब पर फ़र्ज़ है ?

वह उस पर फ़र्ज़ है जो उसे उठा सके (ईद के दिनों में क़ुर्बानी करने वाला सहतवान मुसलमान), और बाक़ी के लिए मुस्तहब : नुसूस हुनर (साधन) की पाबंदी रखते हैं। जो क़ुर्बानी नहीं कर सकता उस पर कोई दोष नहीं, और ख़ास मामलों के लिए फ़िक़ह में हज का रोज़ा या रियायत का इंतिज़ाम मौजूद है।

स्रोत: क़ुरआन 37:105-107 (इबराहीम की फ़िदया) · मुस्लिम (जब तुम क़त्ल करो तो अच्छी तरह क़त्ल करो) · बाँटने की सुन्नत (घरवाले, रिश्तेदार, ग़रीब) · सिविल क़ानून (नियमबद्ध क़त्लगाह)

के लिए अन्य चरण खंडन : इस्लाम के ख़िलाफ़ इलज़ामों के जवाब

आगे पढ़ें ईद-उल-अज़हा की क़ुर्बानी

بسم الله الرحمن الرحيم बुध 9 जुमादा अल-अव्वल
الأربعاء 9 جمادى الأولى
أحدب متزايد बढ़ता हुआ कूबड़ दिन 10.1 / 29.5
रोशनी 77%
5 दिनों में पूर्णिमा
لا إله إلا الله अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद