होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या मुहम्मद जिन के प्रभाव में, पागल या कवि थे ?
मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) पर पहले इल्ज़ाम क़ुरआन में ख़ुद दर्ज हैं : पागल, दीवाना (जिन के प्रभाव में), कवि, काहिन (ग़ाइब बताने वाला), जादूगर। नुसूस उनका जवाब देने के लिए उन्हें मरवी करते हैं, और नज़ूल के गवाह ऐसे हालात बयान करते हैं जो इनमें से किसी जमात से नहीं मिलते।
नहीं : क़ुरआन ख़ुद ये इल्ज़ाम मरवी करता है ताकि उनका रद्द करे। "आप, अपने रब के अनुग्रह से हरगिज़ दीवाना नहीं हैं।" (क़ुरआन 68:2), और "और क्या उन्होंने विचार नहीं किया कि उनके साथी में कोई पागलपन नहीं है? वह तो केवल खुले रूप से सचेत करने वाला है।" (क़ुरआन 7:184)।
गवाह पूरी होशमंदी, सलामत याददाश्त और ज़बानी हुक्म-शुदा ख़िताब के हालात बयान करते हैं, 23 साल तक, बिना एक भी ग़फ़लत की निशानी। मिर्गी की मौजूदा थीसिस बिना एक भी दौरे की गवाही वाली नई तशकील है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयमक्का वालों के पास एक इल्ज़ाम नहीं, पूरा तशकील था : पागल, दीवाना, कवि, काहिन, जादूगर, जादू किया हुआ। क़ुरआन उन्हें एक-एक करके क़ौल करता है ताकि उन्हें तोड़े : "अतः आप नसीहत करें। क्योंकि अपने पालनहार के अनुग्रह से आप न तो काहिन हैं और न ही पागल।" (क़ुरआन 52:29), "कहते थे : क्या सचमुच हम अपने पूज्यों को एक दीवाने कवि के कारण छोड़ देने वाले हैं?" (क़ुरआन 37:36), "तुम्हारा साथी कोई दीवाना नहीं हैं।" (क़ुरआन 81:22)। नुसूस जो अपना बानी गढ़े, वह अपने दुश्मनों की बददुआएँ दर्ज नहीं करता : क़ुरआन उन्हें इस वजह से रखता है कि वे सार्वजनिक फ़ाइल का हिस्सा हैं।
क़ुरआनी जवाब दो तरह का है : सीधा इनकार और माद्दी का दलील। "हमने न उन्हें शे'र (काव्य) सिखाया है और न वह उनके योग्य है। वह तो सर्वथा उपदेश तथा स्पष्ट क़ुरआन के सिवा कुछ नहीं।" (क़ुरआन 36:69), "यह किसी कवि की वाणी नहीं है। तुम बहुत कम ईमान लाते हो।", "न किसी काहिन की वाणी है, तुम बहुत कम शिक्षा ग्रहण करते हो।" (क़ुरआन 69:41-42)।
दलील सीधी है : मक्का वाले काव्य ज़बानी जानते थे, वे उसके वज़न, उसके घिसे-पिटे मज़मून और उसकी शेर-शायरी की जंग पहचानते थे ; क़ुरआन उनकी किसी तहरीर से नहीं मिलता था, और किसी ने उसकी तरह की तहरीर कभी पैदा नहीं की।
पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने ख़ुद यह तजुर्बा बयान किया : "Ahyanan yatini mithla salsalati al-jarasi" : कभी-कभी घंटी की खनक की तरह, जो सबसे कठिन है और रुक जाती है जब वे हर लफ़्ज़ याद कर लेते, और कभी फ़रिश्ते के ज़रिए, जो मर्द की सूरत में आकर उनसे बात करता (बुख़ारी 2 से मरवी)। आइशा ज़ाहिर मेहनत बयान करती हैं जिससे ठंडे दिनों में भी पसीना रिसता था (मुस्लिम 1180 से मरवी)।
ख़दीजा, पहली गवाह, ने उन्हें लिबादे में छुपाया और फिर हिम्मत बंधाई : "kalta abshir, fa-wa-Allahi la yukhzi-ka Allahu abadan" : नहीं, ख़ुशख़बरी सुनो, अल्लाह की क़सम वह तुम्हें कभी रुसवा नहीं करेगा (बुख़ारी 4953 से मरवी)। पूरी होशमंदी, सलामत याददाश्त, कामों में फ़ौरन वापसी : ये क़िस्से किसी जिन के कब्ज़े से नहीं मिलते और न किसी दौरे से।
20वीं सदी में कुछ विवाद छेड़ने वालों ने टेम्पोरल लोब की मिर्गी, 19वीं सदी में क्लिनिकी तौर पर बयान की गई बीमारी, नज़ूल की तशरीह के लिए पेश की। थीसिस मुहम्मद (उन पर सलाम हो) के दौरे की किसी गवाही पर नहीं टिकती : वह नज़ूल के क़िस्सों को सिर्फ़ अपनी तशरीह से अलामतें दिखा देती है।
हालाँकि टेम्पोरल मिर्गी की क्लिनिकी निशानियाँ मरवी बातों का उलटा हैं : दौरे के बाद की उलझन, ख़राब होती याददाश्त, छोटे और बार-बार दौरे, शख़्सियत की तब्दीली। दस्तावेज़ उलटी बात बयान करता है : 23 साल की मुताहिक़ तहरीरें, खुले तौर पर पढ़ी गईं, सैकड़ों लोगों की याददाश्त में, बिना अंदाज़ की टूट और बिना अक़ीदे की टूट, और दौरों के दरमियान बिल्कुल मुकर्रर सामाजिक ज़िंदगी।
दीवाना या पागल इंसान वह नुसूस पैदा नहीं करता जिसे करोड़ों लोग पूरा ज़बानी रखते हैं और उसके सरग़र्दा दुश्मनों की मौजूदगी में खुले तौर पर पढ़ते हैं। वह 23 साल में पूरे मुआशरे को नहीं बदलता, सैकड़ों सियासी और क़ानूनी मुक़ाबले नहीं संभालता, और ऐसी जमात नहीं छोड़ता जो उसकी ज़िंदगी में उसे हर लफ़्ज़ पर माने और उसकी मौत के बाद उसका फ़ैसला करे। क्या मुहम्मद ने झूठ बोला ? का पृष्ठ उनकी शख़्सियत पर दूसरा बड़ा इल्ज़ाम संभालता है, और क्या क़ुरआन में तब्दीली की गई है ? का पृष्ठ उस नुसूस का हाल जो उन्होंने पहुँचाया।
क्योंकि वे मक्का की असली तारीख़ का हिस्सा हैं : पहले मुख़ालिफ़ों ने मुहम्मद (उन पर सलाम हो) को पागल, दीवाना, कवि और जादूगर कहा। क़ुरआन अपने मुख़ालिफ़ों के सही-सही लफ़्ज़ दर्ज करता है और फिर उनका जवाब देता है : यह दस्तावेज़ी फ़ाइल है, ऐसा प्रोपेगैंडा नहीं जो आलोचनाएँ छुपाए।
नहीं : ठहराव (फ़ातरा) छोटा था और सब्र की इम्तिहान की तरह गुज़रा, दोबारा शुरूआत की ख़ुशख़बरी सूरते मुद्दस्सिर (चादर में लिपटे) ने दी। नसों की बीमारी हुक्म से नहीं रुकती और एक मुताहिक़ पैग़ाम के साथ वापस नहीं आती जो उसी सिलसिले को बिना अंदाज़ की तब्दीली के आगे बढ़ाए।
वह 20वीं सदी में पैदा हुई, बिना एक भी उस दौर की दौरे की गवाही। नुसूस जो बयान करते हैं वह दौरे का उलटा है : सलामत होशमंदी, एक बार बताई गई लंबे जुमलों की बेदाग़ याददाश्त, हादसे के बाद की घबराहट का बिल्कुल न होना, और 23 साल की सुकून भरी सार्वजनिक ज़िंदगी। दिमाग़ के माहिरीन ख़ुद लिखते हैं कि जो बयान किया गया है उसमें कुछ भी मरवी बीमारी से नहीं मिलता।