होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > इस्लाम में ग़ुलामी
इस्लाम ने ग़ुलामी मुक़र्रर नहीं की : उसे उस दुनिया से मीरास में मिला जहाँ वह आम मालियात थी, और उसने दर्जनों ज़रूरी रिहाई के दरवाज़े खोदे, यहाँ तक कि अपने ही स्रोत बंद कर दिए। इतिहास, ग्रंथ और मौजूदा बंदी, बिना मुलायम अल्फ़ाज़ के।
इस्लाम ने ग़ुलामी नहीं बनाई : उसे 7वीं सदी की आम मुअश्शरे के तौर पर मीरास में मिला और एक अस्थायी शान में बदल दिया, जिसकी तय राह रिहाई थी : दर्जनों ज़रूरी कफ़्फ़ारे एक ग़ुलाम की आज़ादी से गुज़रते हैं (क़ुरआन 4:92, 5:89, 58:3), और पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने आज़ाद किए और यह फ़रमाया कि ग़ुलामों को वही खाना और वही लिबास दो जो ख़ुद खाते-पहनते हो (बुख़ारी 30)।
मौजूदा आलिम, हर मसलक, सिखाते हैं कि आज ग़ुलामी के स्रोत बंद हैं : यह मुअश्शरा अब क़ानूनी तौर पर मौजूद नहीं रह सकता, और रिहाई का दरवाज़ा अकेला खुला रहता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयग़ुलामी 7वीं सदी के तमाम बर्र-ए-अज़म, तमाम तहज़ीबों और तमाम मज़ाहब में मौजूद थी : दुनिया की मालियात का स्रोत, रूमी क़ानून का मुअश्शरा, फ़ारसी सल्तनतों, हिन्दुस्तान, चीन, अफ़्रीक़ा और इस्लाम से पहले के अरबस्तान का मुअश्शरा। इस्लाम उसी दुनिया में उभरा और उसके पास कोई एकतरफ़ा तुर्क-ए-ग़ुलामी का फ़रमान मौजूद नहीं था जो समाजी तबाही के बिना मुमकिन होता। उसकी तरीक़ा, अपनी पूरी तशरीअ की तरह, मुतदरिज रही : सख़्त तरतीब बाँधना, रिहाई के दरवाज़े फ़राख़ करना, और मालियात को उसके बंद होने की तरफ़ मोड़ना।
क़ुरआन ने आज़ादी को बड़े गुनाहों के कफ़्फ़ारे की राह बनाया : क़त्ल की भूल (क़ुरआन 4:92), ज़िहार (क़ुरआन 58:3), टूटी क़सम (क़ुरआन 5:89) : तीन गुनाह बिना एक ग़ुलाम आज़ाद किए कफ़्फ़ारा नहीं हो सकते थे।
और मर्ज़ी से रिहाई को सबसे बुलंद कामों में से एक बनाया : "फिर वह उन लोगों में से हो, जो ईमान लाए ... और एक-दूसरे को धैर्य रखने की सलाह दी और एक-दूसरे को दया करने की सलाह दी। यही लोग दाहिने हाथ वाले (सौभाग्यशाली) हैं।" : और सूरा बलद की क़सम (क़ुरआन 90:13) "गर्दन छुड़ाना" को नेकियों की चोटियों में गिनती है।
हदीसें ग़ुलामों के पूरे हक़ूक़ फ़रमाती हैं : "तुम्हारे भाई जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे हाथों तले रखा है : उन्हें वही खाना खिलाओ जो ख़ुद खाते हो, उन्हें वही लिबास पहनाओ जो ख़ुद पहनते हो" (बुख़ारी 30), उन्हें उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ देने और ग़र-ओ-बार बाँटकर बेचने की रोक।
ग़ुलामी के क्लासिकी स्रोत ग़ुलाम की औलाद थे (बंद : आज़ाद शुदा ग़ुलाम की औलाद आज़ाद होती है, और आज़ाद माँ की तरफ़ से तबादुली मुक़द्दम है) और युद्ध।
क्लासिकी इस्लामी रियासत ने दूसरे को मुआहदात और बड़े पैमाने की ख़रीदारी की रिवायत से घटाया ; मौजूदा फ़िक़ह अकादमियाँ इत्तेफ़ाक़ से सिखाती हैं कि क्लासिकी शराएत मौजूदा बैनुलअक़्वामी क़ानून में अब पूरी नहीं हो सकतीं : स्रोत बंद हैं, मुअश्शरा जायज़ तौर पर मौजूद नहीं रह सकता, और बहाली की हर कोशिश (चरमपंथी गिरोहों जैसी) आलिमों ने जुर्म और नामुज़ज़िम करार दी है।
क्या इस्लाम एक हिंसक धर्म है ? का पृष्ठ उसी तरीक़ा लागू करता है : ग्रंथों को उनके टेढ़े किए जाने से अलग करना, और इलज़ामों का जवाब उन्हीं स्रोतों से देना।
एक ही वक़्त में रोक, बिना रिहाई के प्लान के, लाखों ग़ुलामों को बेशान, बेहक़ूक़ और बेराह छोड़ देती, उस आम मालियात में जो उन्हीं पर टिकी थी। क़ुरआन की तरीक़ा मुतदरिज रही : स्रोतों को युद्ध तक महदूद करना, दर्जनों ज़रूरी आज़ादी के दरवाज़े खोलना, पूरे हक़ूक़ देना, और रिहाई को सबसे बड़ा नेकी का काम बनाना (क़ुरआन 90:13)। यही इतिहास की हर मुतदरिज तशरीअ का नमूना है।
नहीं। मौजूदा फ़िक़ह अकादमियाँ इत्तेफ़ाक़ से सिखाती हैं कि ग़ुलामी के जायज़ स्रोत मौजूदा दुनिया में बंद हैं : क्लासिकी शराएत अब पूरी नहीं हो सकतीं, और ग़ुलामी को "बहाल" करने की हर कोशिश (चरमपंथी गिरोहों की तरफ़ से) इस्लाम के आलिमों ने जुर्म और नाजायज़ करार दी है।