इस्लाम में जज़िया

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जिज़या पर यह इलज़ाम लगाया जाता है कि वह ग़ैर-मुसलमानों द्वारा अदा किया जाने वाला ज़िल्लत भरा ख़राज है। आयत उसके बारे में क्या कहती है, वह असल में क्या थी (फ़ौजी ख़िदमत से मुआफ़ी का टैक्स), उसकी मुआफ़ियाँ, और वह हिफ़ाज़त का इक़रारनामा जिसे वह मुहर लगाती थी।

जिज़या इस्लामी रियासत के समर्थ ग़ैर-मुसलमान मर्दों द्वारा अदा किया जाने वाला टैक्स था, दो चीज़ों के एवज़ में : फ़ौजी ख़िदमत से मुआफ़ी (जो मुसलमानों पर ज़रूरी है) और उनकी जान-माल की रियासत द्वारा हिफ़ाज़त। इसी से इक़रारनामे का नाम आता है : ज़िम्मा, "ज़िम्मेदारी का इक़रारनामा"। स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े, राहिब, ग़रीब और अपाहिज इससे मुआफ़ थे।

ख़लीफ़ा उमर ने अपनी वसीयत में सिखाया कि अल्लाह के सामने उनकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ख़ुद ख़लीफ़ा पर हो (अबू दाऊद से मरवी)।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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आयत क्या कहती है, अपने युद्ध के संदर्भ में

जिज़या की आयत (क़ुरआन 9:29) उन दो साम्राज्यों (बीज़ेंटाइन और फ़ारसी) के संदर्भ में आती है जो नवोदित राज्य के लिए ख़तरा थे, और वह इज्तिराब की सूरत में एहले-किताब के रियासतों को निशाना बनाती है, जिज़या की अदायगी तक, जो झड़पों के ख़त्म होने की मुहर लगाती थी।

लफ़्ज़ ख़ुद "जिज़्या" से है, यानी मुआवज़ा : यह समर्थ ग़ैर-मुसलमान मर्दों का हिस्सा है, दो हक़ों के एवज़ में : उनकी फ़ौजी ख़िदमत से मुआफ़ी और उनकी जानों, ग़र-ओ-बार और माल की रियासत की हथियारबंद हिफ़ाज़त। रिवायत में इक़रारनामे का नाम है : ज़िम्मा, अपने मुहाफ़िज़ों के हक़ में रियासत की ज़िम्मेदारी।

जो वह नहीं थी : वे मुआफ़ियाँ जो कार्टून को नाकाम करती हैं

"सफ़ाया" या "आम ज़िल्लत" वाला टैक्स हर शख़्स पर फ़र्ज़ होता : जिज़या बालिग़ और समर्थ मर्दों के सिवा किसी पर फ़र्ज़ नहीं थी।

इससे मुआफ़ थे : स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े, इबादत से गुज़ारा करने वाले राहिब और दीनी लोग, ग़रीब और अपाहिज : वे तबक़े जिन्हें कार्टून हमेशा नज़रअंदाज़ करता है। ख़लीफ़ा उमर ने अपनी वसीयत में, अपने जानशीन के नाम, ज़िम्मा को अल्लाह के सामने ज़िम्मेदारी बनाया : "मैं उस ख़लीफ़ा को जो मेरे बाद आएगा नसीहत करता हूँ कि वह अल्लाह और उसके रसूल की हिफ़ाज़त में लोगों के साथ अच्छा सलूक करे, उनके इक़रारनामे अदा करे और उनका बचाव करे" (अबू दाऊद से मरवी)।

और मुस्लिम मालियात का दस्तावेज़ी इतिहास एक मुतवाज़न और मुतदरिज जिज़या बयान करता है, जो अक़्सर मुसलमानों की ज़कात से कम होती थी।

ज़कात से मुवाज़ना : दो निज़ाम, एक ही मंतिक़

मुसलमान ज़कात अदा करता है (ज़रूरी, सालाना बचत का 2.5 प्रतिशत) और फ़ौजी ख़िदमत देता है ; समर्थ ग़ैर-मुसलमान जिज़या अदा करता है और उससे मुआफ़ होता है। दोनों टैक्स एक ही रियासत के काम आते हैं, उस तवाज़ुन के साथ जिसे मुआरिज़ छोड़ देते हैं : जिज़या से ख़रीदी गई हिफ़ाज़त पूरे बचाव का अहद था : इतिहास उन मुस्लिम कमांडरों को मरवी करता है जिन्होंने उन शहरों को जिज़या लौटा दी जिन्हें वे अब हिफ़ाज़त नहीं कर सकते थे।

इस्लाम में तौरात का पृष्ठ दिखाता है कि क़ुरआन एहले-किताब का वाजिब इन्साफ़ कैसे महदूद करता है (क़ुरआन 5:8 : सब के साथ इन्साफ़, उनसे भी जिन्हें पसंद नहीं करते), और वह नियम जो बना रहता है : "अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों से अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला।" (क़ुरआन 60:8)।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न इस्लाम में जिज़या

क्या जिज़या ज़िल्लत का टैक्स था?

आयत में "साग़िरून" (अपमानित) का लफ़्ज़ है, जिसे इलज़ाम-बाज़ी उठाकर दिखाती है ; मुस्लिम मालियात के मुअर्रिख़ उसे मुतवाज़न और मुतदरिज टैक्स बताते हैं, जो अक़्सर मुसलमानों की ज़कात से कम होता था और फ़ौजी मुआफ़ी के एवज़ में अदा किया जाता था। कुछ बाद की रीडिंग में गढ़ा गया "ज़िल्लत" संदर्भ की बात नहीं है : हिफ़ाज़त का इक़रारनामा ग़ैर-मुसलमान ज़िंदगियों की ज़िम्मेदारी अल्लाह के सामने रियासत पर डालता था।

जिज़या से कौन मुआफ़ था?

स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े, राहिब और दीनी लोग, ग़रीब, अपाहिज और बीमार : सिर्फ़ कमाई के क़ाबिल समर्थ मर्द ही अदा करते थे, उनकी फ़ौजी ख़िदमत से मुआफ़ी के एवज़ में : ग़ैर-मुसलमान रियासत का बचाव नहीं करते थे, लेकिन वही उनकी हिफ़ाज़त करती थी।

स्रोत: क़ुरआन 9:29 · अबू दाऊद से मरवी (ज़िम्मियों पर उमर की वसीयत)

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