होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या इस्लाम आधुनिक चिकित्सा को ठुकराता है ?
दवा की हदीस, ताऊन के ख़िलाफ़ नबवी क़रंतीन, दुआ-साथ-इलाज का उसूल, और वैक्सीन पर उलमाई मोक़िफ़।
नहीं : चिकित्सा सुन्नत है। पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने फ़रमाया : "इलाज करवाओ, अल्लाह के बंदो, क्योंकि अल्लाह ने कोई बीमारी पैदा नहीं की बग़ैर उसकी दवा पैदा किए" (बुख़ारी से मरवी), ताऊन के ख़िलाफ़ क़रंतीन 13 सदी पहले क़ायम की, और आज के उलमा इलाज और वैक्सीनेशन को जायज़ और अक़्सर तरगीब दी जाने वाली चीज़ सिखाते हैं। अल्लाह पर भरोसा इलाज की जगह नहीं लेता : वह उसे ढाँचा देता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयबुनियादी नुस साफ़ है : "इलाज करवाओ, अल्लाह के बंदो, क्योंकि अल्लाह ने कोई बीमारी पैदा नहीं की बग़ैर उसकी दवा पैदा किए" (बुख़ारी से मरवी, समानांतर रूख़ बैहक़ी में)।
इस जुमले में इलज़ाम से उलटी 2 अकीदें मौजूद हैं : बीमारी चुपचाप झेली जाने वाली सज़ा नहीं है, और दवा तलाशना ईमान का अमल है, क्योंकि दवा उसी अल्लाह ने पैदा की जिसने बीमारी पैदा की। पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) इलाज करवाते थे, कराते थे, शहद, हिजामा (रक्तदान) और अपने दौर के तरीक़ों की तरग़ीब देते थे : डॉक्टर के पास जाने वाला मुसलमान सुन्नत की पैरवी करता है, उसकी ख़ियानत नहीं करता।
ताऊन के ख़िलाफ़ पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने वह अमल क़ायम किया जिसे चिकित्सा ने बाद में क़रंतीन कहा : "अगर तुम्हें किसी मुल्क में ताऊन की ख़बर सुनाई दे, तो वहाँ दाख़िल मत हो ; और अगर वह उस मुल्क में फूटे जहाँ तुम हो, तो वहाँ से न निकलो" (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवी)।
उसूल में आधुनिक एपिडेमियोलॉजी का बीज मौजूद है : मुतासिर इलाक़ों का क़ैद, फ़ैलाव की रोकथाम, बिरादरी की ज़िम्मेदारी। प्रोटोकॉल से 13 सदी पहले सुन्नत ने सेहत का इंतिज़ाम ठहरा दिया था : क्या इस्लाम विज्ञान के ख़िलाफ़ है ? का पृष्ठ यह दस्तावेज़ मुकम्मल करता है।
एक शख़्स ने पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) से पूछा कि वह अपने ऊँट को बाँधे या अल्लाह पर छोड़े : जवाब : "ऊँट को बाँध दो और अल्लाह पर भरोसा करो" (तिर्मिज़ी से मरवी)।
यही पूरी मुसलमान चिकित्सा का मादर उसूल है : जायज़ हर वसीला सख़्ती से लो, फिर वसाइल के मालिक के हवाले कर दो। आज के उलमा इससे वैक्सीन का मोक़िफ़ निकालते हैं : रोकथाम वाली जायज़ दवा, जिसकी तरगीब तब होती है जब वह फ़र्द और बिरादरी की ज़िंदगी हिफ़ाज़त करे, और हाल के महामारियों में बड़े कौंसिलों का इत्तेफ़ाक़ तरगीब की तस्दीक़ करता है।
इलज़ाम 2 प्लान को उलझा देता है जिन्हें इस्लाम ईमानदारी से अलग रखता है : असर करने वाली वजह (अल्लाह शिफ़ा देता है) और दूसरी वजहें (डॉक्टर, दवा) जिन्हें क़ुरआन इस्तेमाल करने का हुक्म देता है। अल्लाह को सौंपने के दावे पर इलाज ठुकराना वह ओहम (वहम) है जिसे सुन्नत सुधारती है ;
डॉक्टर बग़ैर अल्लाह के शिफ़ा देता है कहना वह घमंड है जिसे दुआ सुधारती है। दोनों के दरमियान बीमार मुसलमान की ज़िंदगी सादी है : मुआयना करवाओ, पैरवी करो, दुआ करो, उम्मीद रखो। क्या सभी ग़ैर-मुसलमान जहन्नम में जाएँगे ? का पृष्ठ इलाही इंसाफ़ संभालता है, और यह अमली रहमत : जो इस्लाम इलाज का हुक्म देता है, वह बहस करने वालों का इस्लाम नहीं।
नहीं : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने उस शख़्स को समझाया जिसने पूछा था कि ऊँट को बिना बाँधे छोड़ना काफ़ी है : ऊँट को बाँध दो और अल्लाह पर भरोसा करो (तिर्मिज़ी से मरवी)। उसूल यही है : जायज़ हर वसीला लो, फिर नतीजा अल्लाह को सौंप दो। ईमान के नाम पर इलाज ठुकराना ईमान नहीं, नबवी तरीक़े का आधा हिस्सा छोड़ना है।
आज की बड़ी उलमाई इंतिज़ामियाँ उन्हें जायज़ ठहराती हैं, और तरगीब देती हैं जब वे बिरादरी की ज़िंदगी हिफ़ाज़त करती हैं : वैक्सीन रोकथाम वाली दवा है, और रोकथाम सुन्नत के हुक्म दिए गए इलाज का हिस्सा है। सेहत की तकनीकी बहसें अकीदे का मामला नहीं : मुसलमान अपने मुल्क की तबीबी सलाह मानता है जैसे वह अपना इलाज मानता है।
वह जगह नहीं लेती, उससे पहले आती है : शहद, हिजामा, नैसर्गिक तरीक़े और भी वसीलों में से जायज़ वसीले हैं, एक ऐसे मजमूए में जो मुख़्लिस तरीक़ा सिखाता है (हर बीमारी की दवा है, उसे ढूँढ़ो)। मुसलमान नबवी तरीक़े और आधुनिक इलाज साथ इस्तेमाल कर सकता है : ये इक ही इलाही इजाज़त के दो दरवाज़े हैं।