होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या इस्लाम फ़तह के लिए दुनिया को दो ख़ेमों में बाँटता है ?
इस्लाम की दुनिया / जंग की दुनिया वाली दो-ख़ेमा तक़सीम किसी बुनियादी नुसूस में नहीं : वह अपने दौर को बयान करने के लिए पुराने फ़ुक़हा की गढ़ी हुई क़िस्म है। मौजूदा फ़ुक़हा उसकी जगह अमन और महफ़ूज़ी वाले मुल्क की क़िस्म लेते हैं।
नहीं : यह तक़सीम किसी आयत या हदीस में नहीं : वह अपने दौर के इलाक़ों को तरतीब देने के लिए पुराने फ़ुक़हा (अबू हनीफ़ा, अल-मावरदी) की गढ़ी हुई क़िस्म है, कई मुक़ाबले करने वाली तक़सीमों के साथ। मौजूदा फ़ुक़हा जिन मुल्कों में मुसलमान आज़ाद और महफ़ूज़ जीता है उन्हें मुआहदे और अमन की ज़मीन बताते हैं, और क़ुरआन का हमेशा वाला नियम निभाए गए मुआहदों का है : "जिनसे तुमने संधि की, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ (संधि के पालन में) कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता की, तो उनके साथ उनकी संधि को उनकी अवधि तक पूरी करो।" (क़ुरआन 9:4)।
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयदारुल-इस्लाम और दारुल-हरब के लफ़्ज़ न क़ुरआन में आते हैं न हदीसों में : वह पहली सदियों के फ़ाक़िहों की सियासत की किताबों में पैदा हुए, जिन्हें एक बदलते सियासी नक़्शे के इलाक़ों को तरतीब देनी थी।
अबू हनीफ़ा और उनके शागिर्द, अल-मावरदी और दूसरों ने मुक़ाबले करने वाले ढाँचे पेश किए (मुसन्निफ़ीन के मुताबिक़ 2, 3, 5 तक़सीमें), अलग-अलग मायारों के साथ : यही बिखराव साबित करता है कि वह तहलील का आलात था, अक़ीदा नहीं।
बुनियादी नुसूस जो देते हैं वह नियम हैं : मुआहदा मुद्दत तक निभाना (क़ुरआन 9:4), बेईमानी की सूरत में खुले आम फ़ासले का इलान (क़ुरआन 8:58), मुमकिन होते ही अमन की दावत (क़ुरआन 8:61), ग़ैर-लड़ाकों के साथ अच्छा सलूक : "अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों से अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला।" (क़ुरआन 60:8)।
मौजूदा फ़ाक़िहों ने पुरानी दो-ख़ेमा तक़सीम को बड़ी हद तक उस क़िस्म से बदल दिया है जो हक़ीक़त से चिपकती है : मुआहदे और अमन की ज़मीन, जहाँ मुसलमान क़ानूनों की हिफ़ाज़त में जीता है। यूरोप या अमेरिका का एक मुसलमान मुआहदे की ज़मीन में जीता है : उसके फ़राएज़ में मदनी क़ानूनों की पाबंदी, मदनी एहद की वफ़ादारी, और अपने पड़ोसी के साथ इन्साफ़ शामिल है, क्योंकि ये मुल्क न उस के मुख़ालिफ़ लड़ाई में हैं न उसके दीन के दुश्मन।
पुरानी तक़सीम दोहराकर फ़तह का लफ़्ज़ उठाने वाली आवाज़ें एक बे-तारीख़ ढाँचे की बात करती हैं, इस्लामी फ़िक़्ह के किसी जीते हुए नियम की नहीं। क्या शरीयत पश्चिम पर थोपी जाना चाहती है ? और क़ुरआन एहले-किताब से लड़ने का आदेश क्यों देता है ? के पृष्ठे जुड़े सवाल संभालते हैं।
8वीं से 11वीं सदी के बीच लिखी गई मदनी हुकूमत की किताबों से, जो उस दौर के सियासी नक़्शे को बयान करती थीं : इस्लाम की हुकूमत वाली ज़मीनें, उस के मुख़ालिफ़ लड़ाई वाली ज़मीनें, और अमन वाली ज़मीनें। फ़ाक़िह ख़ुद मायारों और तक़सीमों की गिनती पर इख़्तिलाफ़ करते थे : यही सबूत है कि वह मौक़े की तहलील का ढाँचा था, कभी कोई इलान किया हुआ अक़ीदा नहीं : कोई आयत ये लफ़्ज़ इस्तेमाल नहीं करती।
मौजूदा फ़ुक़हा के मुताबिक़ नहीं : जिन मुल्कों में मुसलमान अपना दीन आज़ाद अदा करता है, क़ानून की हिफ़ाज़त में, वह मुआहदे और अमन की ज़मीनें हैं, जहाँ फ़राएज़ में मुल्क के क़ानूनों की पाबंदी शामिल है। यह बड़ी सुन्नी इदारों का मुक़ाम दहाइयों साल से है, और <a href="/hi/धर्म/खंडन/क्या-शरीयत-पश्चिम-पर-थोपी-जाना-चाहती-है.html">क्या शरीयत पश्चिम पर थोपी जाना चाहती है ?</a> का पृष्ठ यह ढाँचा तफ़सील से संभालता है।
वह ताक़त के ताल्लुक़ात बयान करती थी, कोई हुक्म नहीं देती थी : क़ुरआन जिस वक़्त दूसरा अमन की तरफ़ झुके अमन का हुक्म देता है (क़ुरआन 8:61), ग़ैर-लड़ाकों के साथ अच्छाई (क़ुरआन 60:8), और क़ाएद शुदा मुआहदों की वफ़ादारी (क़ुरआन 9:4)। इस्लामी तारीख़ दहाइयों के अमन और लंबे मुआहदे गुज़री है : क्लासिकी इस्लामी फ़िक़्ह दीर्घकालिक अमन जानता है, और "हमेशा वाली लड़ाई" मौजूदा दौर के नारों की चीज़ है, नुसूस की नहीं।