होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या मुहम्मद ज़हर से दुनिया से गए ?
इल्ज़ाम : ज़हर से मौत, तो झूठा पैग़ंबर। फ़ाइल : ख़ैबर में मरवी हमला, उसी क़िस्से में पैग़ंबरी जवाब, और 4 साल बाद बीमारी के बाद कुदरती मौत : पैग़ंबर मरते हैं, और क़ुरआन ने यह पहले ही बयान कर दिया था।
नहीं : ख़ैबर में एक ख़ातून ने ज़हर लिए हुए भेड़ का गोश्त पेश किया ;
पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने उसमें से खाया, हमला पकड़ा गया, और जब उस ख़ातून ने क़बूल किया "मैं तुम्हें मारना चाहती थी", तो जवाब दिया : "अल्लाह ने इस पर इख़्तियार कभी न दिया होता" (मुस्लिम 2190 से मरवी)। वह 4 साल बाद, क़रीब 2 हफ़्ते की बीमारी के बाद, अपने बिस्तर पर, अहल-ओ-अयाल के दरमियान दुनिया से गए : पैग़ंबर मरते हैं, और क़ुरआन ने यह ठहरा दिया था : "मुह़म्मद केवल एक रसूल हैं। उनसे पहले बहुत-से रसूल गुज़र चुके हैं। तो क्या यदि वह मर जाएँ अथवा मार दिए जाएँ, तो तुम अपनी एड़ियों के बल फिर जाओगे?" (क़ुरआन 3:144)।
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयक़िस्सा दो तरफ़ से सहीह है। बुख़ारी : एक यहूदी ख़ातून ने पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) को ज़हर लिए हुए भेड़ का गोश्त पेश किया ; उन्होंने उसमें से खाया, उसे लाया गया, पूछा गया : उसे नहीं मारते ?
उन्होंने कहा : नहीं (बुख़ारी 2617 से मरवी)। मुस्लिम मुकम्ल करता है : उन्होंने उससे पूछा, उसने क़बूल किया : मैं तुम्हें मारना चाहती थी ;
उन्होंने जवाब दिया : अल्लाह ने इस पर इख़्तियार कभी न दिया होता (मुस्लिम 2190 से मरवी)। हमला हक़ीक़ी है, जवाब नुसूस में है : न इंतिक़ाम, न शिकवा, एक माफ़ी और इब्तिला की थ्योलॉजी।
मरवी सीरत साफ़ है : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) 11वें साल में, 63 साल की उम्र में, क़रीब 2 हफ़्ते की बीमारी (बुख़ार और कमज़ोरी) के बाद, अपने घर में, आयशा के पास, अपनी आख़िरी सार्वजनिक वसियतें देते हुए दुनिया से गए : ख़ातूनों के साथ अच्छा सलूक, नमाज़, मुआहदे।
वह अपने बिस्तर पर मरे, अपने घर में दफ़्न हुए, अपनी पूरी उम्मत के दरमियान जो उनसे ज़िंदा रही : ज़हर की तीखी मौत की कोई निशानी नहीं (ज़हर घंटों या दिनों में मारते हैं, 4 साल की सार्वजनिक हुकूमत के बाद नहीं), और उनकी मौत को ख़ैबर के ज़हर से जोड़ने वाली देर की रिवायतें मुहद्दिसीन के हुक्म में बहस वाली गिनी गई हैं।
"ज़हर से मौत तो झूठा पैग़ंबर" वाला इल्ज़ाम एक ऐसे वादे पर खड़ा है जिसे नुसूस ने कभी किया ही नहीं : पैग़ंबर वह इंसान हैं जो मरते हैं, और क़ुरआन ने वाक़िया से पहले ही यह ठहरा दिया था : "मुह़म्मद केवल एक रसूल हैं। उनसे पहले बहुत-से रसूल गुज़र चुके हैं। तो क्या यदि वह मर जाएँ अथवा मार दिए जाएँ, तो तुम अपनी एड़ियों के बल फिर जाओगे?" (क़ुरआन 3:144)। पैग़ंबर बीमारियों से मरते हैं, बुढ़ापे से, और कुछ क़त्ल किए गए : यही इंसानी हालत का नियम है जिसे नुसूस ख़ुद एलान करते हैं।
फ़ाइल उलटा क्या दिखाती है : एक इंसान जिसे हमले की ख़बर दी गई, जिसने ज़हर देने वाली को माफ़ किया, और 4 साल बाद अपनी सार्वजनिक वसियत देते हुए दुनिया से गए। क्या मुहम्मद जिन के प्रभाव में, पागल या कवि थे ? उनकी शख़्सियत पर दूसरा इल्ज़ाम संभालता है, और ख़ैबर में क्या हुआ ? हमले का संदर्भ।
जवाब उसी क़िस्से में है : उस ख़ातून के जवाब में जिसने कहा कि अगर उनका पैग़ंबरी सच होता तो ज़हर उन्हें न छूता, उन्होंने बयान किया कि अल्लाह ने इस पर इख़्तियार कभी न दिया होता : इब्तिला का फ़ैसला अल्लाह करता है, और पैग़ंबर इब्तिलाएँ हर किसी से ज़्यादा झेलते हैं। उन्होंने ज़हर खाया, असर हुआ, और 4 साल और जिए : बहस एक ऐसे वादे पर खड़ी है जिसे किसी ने कभी किया ही नहीं, नुसूस ने तो बिल्कुल नहीं।
किताबों की देर की रिवायतें (अहमद का मुस्नद और दूसरे) बयान करती हैं कि ज़हर का एक निशान बाक़ी रह गया होगा : उन पर मुहद्दिसीन का बहस है और वह मुक़र्रर दलीलों में शामिल नहीं। जो मुक़र्रर है : 2 हफ़्ते क़रीब की आख़िरी बीमारी, आम इलाज, मदीना में बिस्तर पर मौत। न मक़ाम ज़हर की तीखी मौत जैसा है, न मुद्दत, न मंज़र।
क्योंकि पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने उन्हें माफ़ किया : बुख़ारी बयान करता है कि सहाबा ने उसे मारने की इजाज़त माँगी और उन्होंने मना किया (बुख़ारी 2617), और मुस्लिम उनकी क़बूली और उनका जवाब रिवायत करता है (मुस्लिम 2190)। यह अपनी जान के मुक़ाबले हमले की मरवी माफ़ी है, मौत से 4 साल पहले : फ़ाइल इल्ज़ाम को पूरी तरह उलट देती है।