उन्होंने हदीसें लिखने से क्यों मना किया ?

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इक हदीस अपनी बातें लिखने की इक मना मरवा करती है, और मजमूआ लिखा हुआ है : ज़ाहिरी मुतज़ाद ख़ुद नुस्ख़ों में हल होता है : मना वही के दौरान नबवी बातों को क़ुरआन के साथ मिलाने से रोकना चाहती थी, और वह रफ़ा हो गई, वही के ही दौर से दस्तावेज़ी लिखावट के साथ।

मना मोतार्रज़ी और मोतलक़ है : वही के दौरान पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) की बातें अल्लाह की किताब के साथ न मिलाई जाएँ, एक ऐसा नुस जो अल्लाह की किताब से अलग हो (मुस्लिम से मरवा)। वह रफ़ा हो गई, और लिखावट वही के ही दौर से दस्तावेज़ी है : अब्दुल्लाह इब्ने अम्र सब कुछ जो सुनते लिखते थे (बुख़ारी 113 से मरवा), अली के पास इक लिखी हुई परचा महफ़ूज़ थी (बुख़ारी 111 से मरवा), और पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की बादशाहों और हुक्मरानों को लिखी गई ख़तें सरेआम लिखावटें हैं।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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मना : मोतलक़, मुआर्रख़, मोतार्रज़ी

मुस्लिम अबू सईद ख़ुदरी का वाक़िया मरवा करता है : कुछ सहाबा पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की बातें लिख रहे थे ; उन्होंने पूछा, यह सुना कि वे याद रखने के लिए लिखते हैं, और अपना इहतियात बयान किया : अल्लाह की किताब के सिवा इक और लिखावट, जब कि वही अभी उतर रही थी, कभी-कभी ऐसी इबारतों में जो उनकी अपनी बातों से क़रीब होतीं।

उन्होंने उनसे वह तन्हा लिखावट जमा कराके मिटाने को कहा। सियाक़ से दस्तावेज़ी वजह : वही के दौरान मिलावट न हो, इक ऐसे मुबारक नुस के लिखने वाले की इहतियात जो मुबाशरत उतर रहा था, उसकी सुन्नत की लिखावट के ख़िलाफ़ आबदी फ़रमान नहीं।

दस्तावेज़ी रफ़ा-होशी : वही के दौर की लिखावटें

वही मजमूआ ख़ुद पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) की ज़िंदगी में जायज़ और अमल-में-आई लिखावट दिखाता है : अब्दुल्लाह इब्ने अम्र इब्न आस जो कुछ सुनते लिखते थे, बुख़ारी द्वारा दस्तावेज़ी उनके मजमूआ के साथ, हद तक कि अबू हुरैरा, सबसे ज़्यादा मरवी करने वाले, ने कहा : मुझसे ज़्यादा इल्म मरवा नहीं करता कोई, सिवा अब्दुल्लाह इब्ने अम्र के, क्योंकि वे लिखते थे और मैं नहीं (बुख़ारी 113 से मरवा)। अली के पास सरेआम अहकाम की इक लिखी हुई परचा महफ़ूज़ थी (बुख़ारी 111 से मरवा)।

क़बाइलों से मुआहदे, फ़ारस और बिज़ेंटियम के बादशाहों को ख़तें, सदक़ात के काग़ज़ात : सब लिखा, मुआर्रख़ और मोहर-शुदा था। सुन्नत की लिखावट ने इस तरह क्लासिकी जमावट से पूरा इक सदी पहले शुरू की।

जमावट और उसका तरीक़ा

बड़े मरवी करने वालों की पीढ़ी के इंतक़ाल के बाद, और उन अहतलाफ़ जंगों के साथ जिन्होंने सनद की ज़रूरत पैदा की (मुहम्मद इब्ने सीरीन का क़िस्सा, मुस्लिम ने अपने सहीह के मुक़दमे में मरवा किया), जमाअत ने इस्नाद के तरीक़े से लिखकर जमा किया : हर क़िस्सा अपनी ज़मानत-देने वालों की सूची रखता था।

नतीजा वही मजमूआ है जिसे क्या हदीसें गढ़ी गई हैं ? का पृष्ठ बयान करता है : लाखों क़िस्से जो सनदों से छाने गए, कमज़ोर और गढ़े गए ख़ुद उलमा ने मोतालाइन करके रखे। शुरू की मोतार्रज़ी मना और बाद की दस्तावेज़ी आम लिखावट इक मोतज़ाम दस्तावेज़ बनाते हैं : इक मोबारक नुस की हिफ़ाज़त के लिए दफ़्तर की इहतियात, फिर दूसरे को महफ़ूज़ रखने के लिए तारीख़ का सबसे भारी इंतज़ाम।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न हदीसें लिखने की मोतार्रज़ी मना

शुरू में यह मना क्यों ?

उसी वजह से जिससे मूल की तरतीब के दौरान उसके हाशिये पर लिखने से मना है : क़ुरआन आयत-ब-आयत उतर रहा था, कभी-कभी ऐसी इबारतों में जो नबवी बातों से बहुत क़रीब होतीं, और उन्हीं वरक़ों में मिलावट का ख़तरा नए लिखने वालों की जमाअत के लिए असली था। इहतियात इलाही नुस की हिफ़ाज़त करता था, वह सुन्नत की लिखावट को ठुकराता नहीं था : जिस लम्हे फ़र्क़ पक्का हो गया, इजाज़त ने उसका पीछा किया।

मना कब रफ़ा हुई ?

नुस्ख़े तरक़्क़ी दिखाते हैं : अब्दुल्लाह इब्ने अम्र उनकी इजाज़त से पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) से जो सुनते लिखते थे, और उनका मजमूआ (सहीफ़ा-ए-सादिक़ा) बुख़ारी में दस्तावेज़ी है (113) ; अली के पास अहकाम की इक लिखी हुई परचा महफ़ूज़ थी (बुख़ारी 111 से मरवा) ; हुक्मरानों को ख़तें लिखी और मोहर लगाई गईं। वही के बाद जमाअत ने सब कुछ लिखा : क्लासिकी जमावट चली, अपनी सनदों के साथ, जैसा <a href="/hi/खंडन/क्या-हदीसें-गढी-गई-हैं.html">क्या हदीसें गढ़ी गई हैं ?</a> का पृष्ठ बयान करता है।

तो क्या ज़बानी याददाश्त भरोसेमंद नहीं थी ?

लिखावट और याददाश्त पहली पीढ़ी में साथ काम करती थीं : क़ुरआन के लिखने वाले हर आयत उसके उतरते ही लिखते थे, सरेआम ख़तें महफ़ूज़ की जाती थीं, और बड़ी याददाश्तें सुन्नत को सरेआम दोहराती थीं। लिखावट जोड़ सनदों से तस्दीक़ होने वाली याददाश्त बज़बत वही है जो मजमूआ को तस्दीक़-क़ाबिल बनाती है : मसला <a href="/hi/खंडन/क्या-हदीसें-गढी-गई-हैं.html">क्या हदीसें गढ़ी गई हैं ?</a> के पृष्ठ पर है।

स्रोत: मुस्लिम (मना : क़ुरआन के साथ न मिलाना) · बुख़ारी 113 (अब्दुल्लाह इब्ने अम्र लिखते थे, अबू हुरैरा नहीं) · बुख़ारी 111 (अली की लिखी हुई परचा) · पैग़ंबर की बादशाहों और हुक्मरानों को लिखी गई ख़तें

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निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

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