होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या जिहाद माल-ए-ग़नीमत का सौदा था ?
ग़नीमत के दस्तूर (आम पाँचवाँ हिस्सा), लूट के ख़िलाफ़ अबू बक्र की तालीमें, पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) का हिसाबी बिलान, और अपने दीन में रह गए मग़लूब।
नहीं : ग़नीमत के क़ुरआनी दस्तूर पाँचवाँ हिस्सा ज़रूरतमंदों के लिए रियासत के हवाले करते हैं और बाक़ी मुक़र्रर पैमाने से बाँटते हैं (क़ुरआन 8:41), फ़ौजों को दी गई तालीमें लूट और आम इंसानों के क़त्ल को हराम ठहराती हैं (अबू दाऊद से मरवी), और पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) का हिसाबी बिलान इक ज़रह है जो इंतिक़ाल के वक़्त इक यहूदी के यहाँ गिरवी थी (बुख़ारी से मरवी)। फ़तूह जो मग़लूबों को उनके घरों में, उनके दीन में, अहदनामे के तहत छोड़ दें, वे लूट का कारोबार नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयइस्लाम में जंग की ग़नीमत पहले किसी की नहीं होती : क़ुरआन हर फ़तह से पहले मुआफ़ात ठहरा देता है।
पाँचवाँ हिस्सा ज़रूरतमंदों, यतीम और मुसाफ़िर के लिए रियासत को मिलता है (क़ुरआन 8:41), बाक़ी मुक़ातिलों के दरमियान आम पैमाने पर चलता है : यह शहरी फ़ौज की दस्तूर-बंद तनख़्वाह है, जिसे फ़ातेह के लूटने नहीं, वह़्य ने ठहराया। और नुस बाँटने से पहले रवैये को दायरे में रखता है : फ़ौजों को दी गई तालीमें (अबू दाऊद से मरवी) ख़ातूनों, बच्चों, बूढ़ों और राहबों के क़त्ल को, पेड़ काटने को, बग़ैर ज़रूरत तबाही को हराम ठहराती हैं : लूट तबाह करती है, इस्लामी दस्तूर हिफ़ाज़त करता है।
जिस इंसान ने अरब मुत्तहिद किया, वह अपनी ज़रह इक यहूदी के यहाँ 30 पैमाने जौ के बदले गिरवी रखकर गया (बुख़ारी से मरवी), बिना इक दीनार या दिरहम मरवाए : क्या मुहम्मद दौलतमंद होकर दुनिया से गए ? का पृष्ठ ख़ाली विरासत तफ़्सील से बयान करता है। उनके सबसे क़रीबी सहाबा, उभरती हुई सल्तनत के ख़ुलफ़ा, आम ख़ैरात पर गुज़ार करते थे : उमर, फ़ारस और शाम का मालिक, मस्जिद की ताड़ की चटाइयाँ ख़ुद जोड़ता था।
ग़नीमत का प्रोजेक्ट ख़ज़ांची पैदा करता है ; इस्लामी जिहाद ने ग़रीब होकर गए इंतिज़ामी पैदा किए, और यही तारीख़ी हक़ीक़त है जिसे पलटना सबसे मुश्किल है।
सबसे बड़ी दलील आबादी की है : अगर फ़तूह लूट की छापामारी होतीं, तो मग़लूब बाक़ी न रहते। हालाँकि मिस्र के क़िब्ती, शाम के ईसाई, अंदालुस और यमन के यहूदी सदियों तक मुसलमान हुकूमत में अपने घरों में रहे, अपनी ज़मीनों और गिरजों के मालिक।
यरुशलम में ख़लीफ़ा उमर का अहदनामा शख़्सों, माल-ओ-दौलत और इबादत गाहों की हिफ़ाज़त करता है ; सलीब छतों पर क़ायम रहा। इस्लाम में जज़िया का पृष्ठ अहदनामा तफ़्सील से बयान करता है, और क्या मुसलमान ज़बरदस्ती इस्लाम में लाते हैं ? का पृष्ठ दीनी पहलू।
उन्हें ग़नीमत का दस्तूर-बंद हिस्सा मिलता था, जैसे तारीख़ की हर फ़ौज को उसकी तनख़्वाह और इनाम मिलते थे : यह इक रियासत के दफ़ा की फ़ंडिंग है, मोतिव नहीं। वही दस्तूर आम पाँचवाँ हिस्सा यतीमों, ग़रीबों और मुसाफ़िर को बाँटते थे (क़ुरआन 8:41) : ग़नीमत की इक़्तिसाद दस्तूर-बंद मुआफ़ात थी, लूट नहीं।
क्योंकि वह जो उनके हाथों से गुज़रता था, आते ही बाँट देते थे, और उनका अपना हिस्सा भी उसी में चला जाता था : इंतिक़ाल के वक़्त इक यहूदी के यहाँ 30 पैमाने जौ के बदले गिरवी रखी ज़रह (बुख़ारी से मरवी) वही हिसाबी दस्तावेज़ है जो इलज़ाम बंद कर देती है। क्या मुहम्मद दौलतमंद होकर दुनिया से गए ? का पृष्ठ बिलान तफ़्सील से बयान करता है।
पहली फ़तूह के अहदनामे उलटी बात बयान करते हैं : यरुशलम में अहदनामा शख़्सों, गिरजों और माल-ओ-दौलत की हिफ़ाज़त करता है ; मिस्र, शाम और अंदालुस में आबादियाँ सदियों तक मालिक रहीं और अपनी इबादत करती रहीं। लूट की सल्तनत मग़लूबों को उनके घरों में नहीं छोड़ती : इस्लाम में जज़िया का पृष्ठ अहदनामा तफ़्सील से बयान करता है।