होम > खंडन : इस्लाम पर लगाए गए इलज़ामों के जवाब > क्या दो स्त्रियों की गवाही एक पुरुष के बराबर है ?
आयत 2:282 एक ख़ास सूरत में एक पुरुष की जगह दो स्त्रियों को माँगती है : लिखी हुई क़र्ज़। नियम, उसकी वजह-ए-वजूद, वे सूरतें जिनमें अकेली स्त्री की गवाही अकेले ही काफ़ी होती है, और इलज़ाम का जवाब।
आयत 2:282 केवल एक ख़ास सूरत में एक पुरुष की जगह दो स्त्रियों को माँगती है : दो लोगों के दरमियान लिखी गई क़र्ज़ की गवाही, ताकि एक दूसरी को याद दिला दे अगर वह भूल जाए। यह सब गवाहियों के लिए आम नियम नहीं है : अकेली स्त्री हदीस पहुँचा सकती है (आलिम उसे क़बूल करते हैं), दूसरे मामलों में गवाही दे सकती है, और मज़ाहिब के हिसाब से कुछ सूरतों में उसकी गवाही एक पुरुष की गवाही के बराबर होती है।
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयआयत एक अनोखा मामला संभालती है : दो लोगों के दरमियान क़र्ज़ की लिखाई। वह माँगती है कि एक कातिब लिखे, क़र्ज़दार लिखवाए, दो मर्द गवाह मौजूद हों, और जोड़ती है : "तथा अपने पुरुषों में से दो गवाहों को गवाह बना लो। फिर यदि दो पुरुष न हों, तो एक पुरुष तथा दो स्त्रियाँ उन लोगों में से जिन्हें तुम गवाहों में से पसंद करते हो। (इसलिए) कि दोनों में से एक भूल जाए, तो उनमें से एक दूसरी को याद दिला दे।" (क़ुरआन 2:282)।
आयत के ख़ुद की बताई वजह याददाश्त है, न अक़्ल न भरोसेमंदी : क़ानून ने एक मामले (क़र्ज़ के आँकड़े) में भूलने के ख़तरे को पहले से पकड़ा था, जहाँ उस दौर का तजुर्बा दिखाता था कि स्त्रियाँ माली लेन-देन में कम शामिल होती थीं। यह संदर्भिया नियम है, स्त्री की गवाही की क़ीमत पर आम ऐलान नहीं।
मुसलमान फ़िक़ह बहुत से मामलों में अकेली स्त्री की गवाही मानता है : नवजात के नाम-ओ-निशान (जहाँ दाई काफ़ी है), माल के आइब (जहाँ माहिरा काफ़ी है), स्त्री के जिस्म से जुड़े निजी मामले (जहाँ आलिम तो स्त्रियों की ही गवाही माँगते हैं)।
और हदीस की रवायत में स्त्री पूरे हक़ की रावी मानी जाती है : हदीस का इल्म रवायत की भरोसेमंदी में मर्द और औरत में कोई फ़र्क़ नहीं करता : इसीलिए आयशा, हफ़्सा, असमा और सैकड़ों दूसरी स्त्रियाँ इस्लाम की सबसे बड़ी रावियों में गिनी जाती हैं। इस्लाम में स्त्रियों की विरासत का पृष्ठ माली हक़ूक़ पर समानांतर दूसरा इलज़ाम संभालता है।
मज़ाहिब में इख़्तिलाफ़ है : हनफ़ी मज़हब उसे हर मामले में इजाज़त देता है, बाक़ी मज़ाहिब उन्हीं सूरतों तक महदूद करते हैं जिनमें उसकी गवाही मानी जाती है। मुसलमान तारीख़ में स्त्रियाँ क़ाज़ी रही हैं और बहस खुली बनी हुई है।
नहीं : आयत अपनी वजह संभावित ग़फ़लत से बयान करती है (क़ुरआन 2:282 : "(इसलिए) कि दोनों में से एक भूल जाए, तो उनमें से एक दूसरी को याद दिला दे।"), ज़ेहनी नाक़ाबिलियत से नहीं। और क़ुरआन स्त्री को सबसे बेहतरीन दीनी याददाश्त का नमूना बनाता है : आयशा हदीस और फ़िक़ह में इस्लामी फ़िक़ह की पहली स्रोत हैं।