क्या आयत 4:34 पत्नी को मारने की इजाज़त देती है ?

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क़ुरआन की सबसे ज़्यादा आपत्तियाँ खींचने वाली आयत : उसकी मुतदरिज तीन मरहलों वाली बनावट, "दरब" के लफ़्ज़ की बहस-याफ़्ता मानी, पैग़ंबर का अमल, जिन्होंने ज़िंदगी में कभी किसी स्त्री को नहीं मारा (सहीह मुस्लिम 2328), और शौहर-बीवी हिंसा पर आलिमों का मुक़ाम।

आयत 4:34 झगड़े के हल का एक मुतदरिज तरीक़ा बयान करती है (नसीहत, फिर बिस्तरों का अलगाव, फिर एक अलमाती इशारा जिस पर आलिमों की बहस है), और पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने अपनी ज़िंदगी में कभी किसी स्त्री या ख़िदमतगार को नहीं मारा (सहीह मुस्लिम 2328) : "तुम में से बेहतरीन वह हैं जो अपनी बीवियों के साथ बेहतर हैं" (तिर्मिज़ी 3895)।

शौहर-बीवी हिंसा एक जुर्म है जिस पर क़ानून सज़ा देता है, और इस्लाम के आलिम यही सिखाते हैं : आयत का अलमाती इशारा, अगर है, हिंसा की इजाज़त नहीं है।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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आयत का तीन मरहलों वाला तरीक़ा

आयत एक मुअय्यन मामले से सरोकार रखती है : नुशूज़, शौहर-बीवी में बग़ावत भरा रुख़ : एक बीवी का अपने शौहर के लिए ज़ाहिर दुश्मनी और बे-तवज्जोही, उस मुअाशरे में जहाँ ग़र-ओ-बार हिफ़ाज़त-शुदा रक़ाबा है। तरीक़ा मुतदरिज है : पहले नसीहत (दोनों का बातचीत, अल्लाह और अहद की याद दिलाना), फिर बिस्तरों का अलगाव (उसी बिस्तर में फ़ासला, वह दूरी जो शऊर दिलाती है), फिर तीसरा मरहल जिसके अरबी लफ़्ज़ "दरब" पर बहुत स्याही बही है। जो आयत नहीं है : हिंसा की इजाज़त।

जीता-जागता सबूत उसके अमल में है जिसे वह दी गई : आयशा (उन पर अल्लाह राज़ी हो), जो उनके घर के अंदर जीती थीं, गवाही देती हैं कि पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने "कभी अपने हाथ से किसी चीज़ को नहीं मारा : न किसी स्त्री को, न किसी ख़िदमतगार को" (सहीह मुस्लिम 2328)।

तीसरे मरहल की बहस-याफ़्ता मानी

क्लासिकी आलिमों ने आख़िरी "दरब" को सख़्ती से बेदर्द अलमाती इशारे तक महदूद किया : तबरी, इब्न अब्बास से "बेदर्द मार" ("ग़ैर मुहर्रिस") मरवी करता है, जिसकी रिवायत में मिसवाक के इशारे से तुलना दी गई : एक संजीदा ख़बरदारी का संकेत, जिस्मानी सज़ा नहीं।

मौजूदा आलिम सिखाते हैं कि पहले दो मरहल आयत की असल बात हैं, कि तीसरा मरहल उस रियासती ढाँचे में संकट का आख़िरी संकेत था जहाँ हिफ़ाज़त-शुदा ग़र-ओ-बार को आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता था, और यह कि असली शौहर-बीवी हिंसा क़ानून की सज़ा देने वाला जुर्म है : अपनी बीवी को मारने वाला मुसलमान अल्लाह और इन्साफ़ दोनों के सामने जवाबदेह है।

क़ुरआन पूरे बाब को पिछले नियम से महदूद करता है : "तथा उनके साथ भली-भाँति जीवन व्यतीत करो" (क़ुरआन 4:19), और हदीस से : "तुम में से बेहतरीन वह हैं जो अपनी बीवियों के साथ बेहतर हैं, और मैं तुम में से अपनी बीवियों के साथ सबसे बेहतर हूँ" (तिर्मिज़ी 3895)।

जो आयत नहीं कहती

वह यह नहीं कहती कि मर्द अपनी मर्ज़ी से कभी भी अपनी बीवी को मार सकता है : तरीक़ा सिर्फ़ ज़ाहिर नुशूज़ पर लागू होता है (उसी ऐलानी दुश्मनी भरी बे-तवज्जोही पर), एक फ़र्ज़ तरतीब में, उन मरहलों के साथ जो हफ़्तों की गुंजाइश देते हैं, सुलह की मंतिक़ में, सज़ा की नहीं : और क़ुरआन मौक़े को उसी उम्मीद वाले नतीजे पर ख़त्म करता है : "यदि दोनों (मध्यस्थ) सुधार करना चाहेंगे, तो अल्लाह दोनों (पति-पत्नी) के बीच मेल का रास्ता निकाल देगा" (क़ुरआन 4:35), हर तरफ़ से एक सुलह कराने वाले की सिफ़ारिश के साथ।

वह मुसलमान जो शौहर-बीवी हिंसा पर अपने दीन का मुक़ाम जानना चाहे, उसे पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) के अमल में पढ़ता है : एक भी मार नहीं, ऐलानी रहमत, और शौहर-बीवी हिंसा का सबसे बुरे अख़लाक़ में गिना जाना। स्त्री मुसलमान कैसे बने और स्त्रियों की विरासत के पृष्ठ इस्लाम में स्त्रियों के मुक़ाम पर बाक़ी इलज़ाम संभालते हैं।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न आयत 4:34

क्या पैग़ंबर ने कभी किसी स्त्री को मारा?

नहीं। आयशा (उन पर अल्लाह राज़ी हो) गवाही देती हैं : "पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने कभी अपने हाथ से किसी चीज़ को नहीं मारा, न किसी स्त्री को, न किसी ख़िदमतगार को" (सहीह मुस्लिम 2328)। उनका अमल क़ुरआन की जीती-जागती तफ़सीर है : आयत का आख़िरी चारा उस शख़्स ने कभी लागू नहीं किया जिसे वह दी गई थी।

इस आयत में "दरब" के लफ़्ज़ का मतलब क्या है?

अरबी फ़ेल "दरब" के ख़ुद क़ुरआन में तक़रीबन बीस मानी हैं। क्लासिकी आलिमों ने (तबरी, इब्न अब्बास से मरवी) उसे बेदर्द अलमाती इशारे तक महदूद किया, और मौजूदा आलिम सिखाते हैं कि आयत की असल बात पहले दो मरहलों में है : नसीहत और बिस्तरों का अलगाव।

स्रोत: क़ुरआन 4:34 · क़ुरआन 4:19 · सहीह मुस्लिम 2328 · तिर्मिज़ी 3895

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निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद