क्या मुसलमानों को झूठ बोलने का हक़ है ?

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आधुनिक तोहमत "तक़िया" को मुब़ालग़े भरा छुपा हुआ उसूल बना देती है। दस्तावेज़ : झूठ को क़ुरआन मलामत करता है, इकलौती दस्तावेज़ी इस्तिस्ना ज़बरदस्ती है (क़ुरआन 16:106), और पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) ने अज़ाब के तहत अपनी सच्चाई थामे रखी, इंकार नहीं किया।

नहीं : झूठ ज़ातन मलामत-कर्दा है : "झूठ तो वही लोग गढ़ते हैं, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं रखते और वही लोग झूठे हैं।" (क़ुरआन 16:105)।

इकलौती दस्तावेज़ी इस्तिस्ना ज़बरदस्ती है : "सिवाय उसके जो इसके लिए विवश कर दिया गया हो और उसका दिल ईमान से संतुष्ट हो," (क़ुरआन 16:106), आयत इक ऐसे सहाबी के लिए उतरी जिसे अज़ाब दिया गया था और उसने अपने अज़ाब देने वालों के लफ़्ज़ कह दिए थे। "तक़िया" फ़िक़ह की इस ख़ास मामले के लिए इस्तिलाह है, कभी आम झूठ की इजाज़त नहीं : क़ुरआन का क़ाइदा सच है, अपने दुश्मनों के सामने भी।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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क़ुरआन झूठ के बारे में क्या कहता है

झूठ का क़ुरआन में कोई मुजब्त मरतबा नहीं : वह काफ़िरों का काम है : "झूठ तो वही लोग गढ़ते हैं, जो अल्लाह की आयतों पर ईमान नहीं रखते और वही लोग झूठे हैं।" (क़ुरआन 16:105), और मोमिन की बात अहद है : "ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो तथा सही और सच्ची बात कहो।" (क़ुरआन 33:70)।

पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) अपनी नुबुव्वत से पहले "अल-अमीन", भरोसेमंद, के नाम से माशहूर थे, यह नाम उनके दुश्मनों ने ख़ुद दिया था : सच्चाई की शोहरत नबवी फ़ज़ाइल की पहली है, और कोई नुस उसकी मुआत्तली की इजाज़त नहीं देता।

इकलौती इस्तिस्ना : ज़बरदस्ती

इकलौता दस्तावेज़ी मामला अज़ाब का है। आयत 16:106 अम्मार इब्न यासिर के लिए उतरी, जिन्हें मक्के वालों ने उनसे माँगे गए लफ़्ज़ कहने तक अज़ाब दिया : आयत ने उन्हें मुआफ़ किया, "सिवाय उसके जो इसके लिए विवश कर दिया गया हो और उसका दिल ईमान से संतुष्ट हो," : ईमान सालिम रहता है, अज़ाब के तहत कहे गए लफ़्ज़ गिनते नहीं।

फ़क़ीहों ने इस मामले और उसकी महदूदियों को नाम दिया : यह मज़लूम का हक़ है, कभी मुख़्तार की स्ट्रैटेजी नहीं। पूरी आधुनिक तोहमत इस इस्तिस्ने को मुसलमानों की आम ज़िंदगी तक ग़ैर-जायज़ तमदीद देने पर टिकी है।

तारीख़ क्या दिखाती है

तारीख़ी दस्तावेज़ साफ़ है : पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) और उनके सहाबा ने बग़ैर लफ़्ज़ कहे मक्की अज़ाब झेले, अपने मुहिमों के प्लान सरेआम ऐलान किए, मुनासिब-ब-मुनासिब मुआहदे दस्तख़्त किए और दूसरी तरफ़ के तोड़ तक उन्हें पाला, और क़ुरआन ने कुछ सहाबों की अपने जुर्म सरेआम करने में हिचक पर भी मलामत की (क़ुरआन 24:11 : आयशा के ख़िलाफ़ झूठ का मामला)।

वह निज़ाम जो उसूल से झूठ बोलता है अपने दुश्मनों को अपनी सवानिह लिखने नहीं देता, और इस्लाम ने अपने दुश्मनों को पूरी पोलेमिकी अदब लिखने दी : यह झूठ की दोक्तरीन के सलूक की उलटी बात है। क्या मुहम्मद ने झूठ बोला ? का पृष्ठ उनकी ज़ात पर बुनियादी तोहमत संभालता है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न तक़िया की तोहमत (इस्लाम के लिए झूठ बोलना)

क्या तक़िया इस्लाम का छुपा हुआ उसूल है ?

नहीं : लफ़्ज़ फ़िक़ह में जानी ख़तरे के तहत अपने ईमान की इम्तिना बयान करता है, और वह ज़्यादा तौर पर शीया मज़ाहिब में दस्तावेज़ी है जिन्होंने मुख़ालिफ़ हुकूमतों के तहत इसका अमल किया। सुन्नी इसे आयत 16:106 के मामले तक महदूद करते हैं : अज़ाब-दीदा मुसलमान जो माँगे गए लफ़्ज़ बग़ैर ईमान के कह दे, काफ़िर नहीं हो जाता। कोई नुस मौजूद नहीं जो मुसलमान को अपने आम मामलों में झूठ बोलने की इजाज़त दे, न मुसलमानों के सामने, न दूसरों के सामने।

और हुदैबिया का मुआहदा : क्या वह धोखा नहीं था ?

नहीं : हुदैबिया का मुआहदा सरेआम मुआहदा था, दस्तख़्त-शुदा और दूसरी तरफ़ के तोड़ तक पाला गया : यह मुनासिब-ब-मुनासिब ईमानदार मुआहदे की मिसाल है। मुआहदों पर क़ुरआनी क़ाइदा खुला है : जब गद्दारी का ख़ौफ़ हो, तोड़ अमल से पहले ऐलान होता है : "यदि कभी आपको किसी जाति की ओर से किसी विश्वासघात का भय हो, तो समानता के आधार पर उनका वचन उन पर फेंक दें" (क़ुरआन 8:58) : यह झूठ की उलटी बात है।

क्या मुसलमान ज़ुल्म की सूरत में अपना ईमान छुपा सकता है ?

हाँ, और आयत 16:106 उसकी ज़मानत देती है : सहाबी अम्मार, जिन्हें उनके ज़ालिमों के लफ़्ज़ कहने तक अज़ाब दिया गया, आयत ने उन्हें बहाल कर दिया। यह अज़ाब के तहत मज़लूम की हिफ़ाज़त है, आधुनिक हुक़ूक़ की ख़ुद-मुलज़्म करने से इंकार के हक़ की तरह। आम क़ाइदा वही रहता है : "ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो तथा सही और सच्ची बात कहो।" (क़ुरआन 33:70)।

स्रोत: क़ुरआन 16:105 (ईमान न रखने वालों का गढ़ा झूठ) · क़ुरआन 16:106 (इकलौती इस्तिस्ना : ज़बरदस्ती) · क़ुरआन 33:70 (सच्ची बात कहो) · पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) की ज़िंदगी : बग़ैर इंकार के मक्की अज़ाब

के लिए अन्य चरण खंडन : इस्लाम के ख़िलाफ़ इलज़ामों के जवाब

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سبحان الله अल्लाह की पवित्रता है

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद